हल्कू Nov21

हल्कू

  हल्कू मेरे जैसा ही रहा होगा ! आम जिन्दगी में कुछ भी नही बदला है, सिर्फ वक़्त और तारीख़ बदला है | वो दौर प्रेमचंद का था जहाँ पूस की सर्द रात में कपकपाती हाड़ लेकर कोई एक कुत्ते के सहारे मचान के नीचें राख़ पर रात गुज़ार लेता था | आज का दौर चेतन भगत का है, मौसम फ़िल्मी हो गया है, कहीं रातें...

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