उलझन Jan08

उलझन

फिर से वही उलझन, वही उधेड़बुन किंकर्तव्यविमूढ़ अपने कर्तब्य पथ पर | मस्तिष्क में हलचल, मन विस्मित ‘लेकिन…किन्तु…परन्तु’ मैं अग्रसर जनक आपके अनुभव और वक्तव्य पर | मूल्यहीन समाज मूक-बधिर अर्थ विचार, अर्थ व्यव्हार, अहम् युद्ध, विकृत संस्कार | मैं अबोध अज्ञान निस्वार्थ अभिमन्यु, ये कौरव...

इश्क Jan05

इश्क

  तूने इतना जो कहा, “सैय्याँ तू कमाल का, बातें भी कमाल का…” देख मैंने कितनी बातें कह दी…   “इश्क़ में शहादत को तेरी मुस्कुराहट ही काफ़ी थी कातिल… यूँ बेपरवाह गले लगाने की जरुरत क्या है ?” “रंजिश-ए-इश्क़ में यूँही बरबाद हुआ बेपरवाह कसूर फ़क़त इतना सा था- फिक्र हिज्र में...

तजुर्बे की स्याही में कुछ श्वेत-श्याम शब्द संयोजन Jan03

तजुर्बे की स्याही मे...

तजुर्बे की स्याही में कुछ श्वेत-श्याम शब्द संयोजन जिन्दगी की झंझावातों में अक्सर हमारे सपने काँच की टुकरों की तरह बिखर जाते हैं, तूफान उठता है तो जूते के नीचें की गर्द आँखों तक चली आती है | और जब आँखें बंद होती है और सैलाब आता है तो हम ऐसे बह जाते हैं की जब कभी कहीं किसी पत्थर से टकराकर...

खलिहान से लाइव…- किसानी डायलाग Jan02

खलिहान से लाइव…...

प्रश्न:- चाचा आपने कितनी पढाई लिखाई की है ? उत्तर: बेटा पढ़े लिखे होते क्या किसान होते ? प्रश्न:- चाचा आपके बच्चे लोग क्या करते हैं ? कहाँ रहते हैं? वो लोग खेती में आपका हाथ नहीं बटाते हैं ? उत्तर: सब बच्चे बाहर दिल्ली बम्बई में कमाते-खटाते हैं, यहाँ क्यों रहेंगे ? भगवान ऐसा दिन ना करें की...

नव वर्ष की शुभकामनाएं Jan01

नव वर्ष की शुभकामनाए...

हर साल की भांति एक 12 महीने का पूरा वर्ष खत्म हो रहा है और कुछ पल ही में एक नया साल आनेवाला है | ये नया इसलिए है हमारी उम्मीदे नयी है……तो क्यों ना अपनी उम्मीदों में हम थोड़ा पंख लगा दें | जो अभी तक अधूरा रहा उसको पूरा कर लें | अभी तक अगर अपने लिए सिर्फ जिए हैं थोड़ा नीचें झुककर कुछ...

Home Page