ईश्क Mar31

ईश्क

मुझे यकीन है कि एक दिन ईश्क जरूर होगा मुझे भी, तुम्हें भी किसी से कहीं पर बेपरवाह बेपनाह...

एक फूल Mar26

एक फूल

एक बाग, हज़ार माली खिला एक फूल जो, सैकड़ों पुजारी ! इस शहर में मंदिरें बहुत है, दरगाह भी है, कब्र भी है | जुड़ा संवारती नवयौवना भी है, इजहारे-इश्क में मशगूल प्रेमी जोड़े भी है | मंत्री भी है, संतरी भी है, शैतानों की की एक वस्ती भी है | भवरें भी हैं, प्यासा बादल भी है, हवा की नज़र भी कुछ अच्छी नही...

फाल्गुन मास और बसंती बयार Mar20

फाल्गुन मास और बसंती बयार...

खलिहान से लाइव आकाश में लालिमा कोई तस्वीर को सुर्ख रंगों से भर रही है, अरहर की झुरमुटों में अभी भी अँधेरा है | मैं खेत-पथार घूमने निकला हूँ | आम-लीची के मज्जर और सरसों-पलास-सेमल-कचनार के रंग-बिरंगे फूलों की पुष्प वर्षा में नव पल्लव की सेज पर कामदेव पुत्र ऋतुराज बसंत, महुआ की मादक गंध की बयार में कामातुर दीख रहा है, पंछियों की कलरव धुन पर कोयलिया के राग-बसंत में पूरा प्रकृति काम-संगीत में डूबा नज़र आ रहा है | गेहूँ-मकई-अरहर की यौवनावस्था चरम पर है, सब झूम-झूम कर इठलाती हुई नाच रही है | मैं गाम की पगडंडियों पर सर में गमछा बांधे गर्दन पर बांस की लाठी से दोनों हाथ फ़साये फगुआ का गीत गुनगुनाता जा रहा हूँ | उधर अरहर की झुरमुटों में कोई जोड़ा उत्सव...

हे मानव ! तुम इतने विचित्र क्यों हो? Mar16

हे मानव ! तुम इतने व...

खलिहान से लाइव “मैं कई दशकों ये यहाँ खड़ा हूँ…सामने की गाँव की कई पुश्तों को मैंने राख होते देखा है…पिछले पांच दशक से मैं इस बाट से गुजरने वाले हर पथिक से पूछता हूँ- ‘हे मानव ! तुम इतने विचित्र क्यों हो?’” मैं पुराने ‘नन्हे सम्राट’ के शहजादा सलीम की तरह स्तब्ध महुआ की बातों को सुन...

’गाँव-गरीब-दलित-महादलित-किसान-मजदूर-अल्पसंख्यक-हिन्दू-मुसलमान’ Mar03

’गाँव-गरीब-दलित-महाद...

“किडनी पर ज्यादा लोड मत लो राजू…..मैंने पहले ही समझाया था….शहर छोड़कर गाँव मत आओ…जब-तक सूट-बूट में हो तभी तक सरकार है, हमारी तरह लुंगी-गंजी-कुदाल से पहचान होगी तो सिर्फ सरकारी जुबान में रहोगे…’गाँव-गरीब-दलित-महादलित-किसान-मजदूर-अल्पसंख्यक-हिन्दू-मुसलमान’….पर तुमने...

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