काशी- यात्रावृतांत...

अभी काशी से विदा भी नहीं हुआ था कि कूची मष्तिष्क के अंतरपटल पर हर्ष की स्याही से क्षणों को दकीचे जा रहा था । पेट से माथे तक बबंडर उठा हुआ था । लेखक मन व्याकुल था, बार-बार कोशिस करता था और शब्द अव्यवस्थित हो रहे थे । मैं हर क्षण को शब्दों की चादर में छुपाकर आप तक सहेजकर कर लाना चाहता था । हम...

दिवाली Oct30

दिवाली

​ गाम की दिवाली अब नसीब नहीं होती….और शहर की यह चाइनीज दिवाली रास नहीं आती । बस यादों में सिमट कर रह गयी है । दादीमाँ मिट्टी की दिवारी (दीया) बनाती थी, हम बाँस के खोपलैया को ताड़ में गूँथ कर हुक्कालोली बनाते थे । बाद में दर्जी के यहाँ गेनी (कपड़े के टुकड़ो को बॉल की तरह बनाकर लोहे के ताड़...

सत्य बकर Sep14

सत्य बकर...

​सत्य बकर आज भादव का तेरस है, आज के दिन गांव के लोग महादेव मंदिर में जलाभिषेक करते हैं । मैं पकरी दयाल में हूँ और यहां पिछले एक महीने से तैयारी हो रही थी । सुबह 3 बजे से 1500-2000 महिला-पुरुष-बच्चे 3 घंटे प्रतिदिन टहलते थे । पर आज सोमेश्वर महादेव को जल चढाते ही यह दृढ़-निश्चय ख़त्म हो जाएगा ।...

अधूरा प्रेम Sep10

अधूरा प्रेम...

​ कल रात एक कविता लिख रहा था, “चाँद लिपटा सो रहा बादलों की चादर में । आधी रात बाकी है, घड़ी भी रूठी है। आज फिर तेरी याद में रतजगा है ।” कविता पूरी नहीं हुई, मैं पुराने वक़्त में खो गया । और कमाल तो देखो आज पूरे 1051 दिन बाद सुबह-सुबह मेरी दुआ कबूल हो गयी ।...

जवानी  Sep07

जवानी 

​माथे की नस दुख जाती है जवानी की गुत्थियाँ सुलझाने में । वो बचपन की मौज कहाँ अब, गांव की पगडंडी और खेत की हरियाली दोपहरिया का कच्चा आम-अमरुद, और पोखर-भिंड पर गाछी में कंचे का खेल ! यहां अब राह पथरीली है, कभी गर्द है, कभी सर्द है, कभी लू में झुलसा देह का दर्द है । यहां अब वक़्त गुजर जाता है,...

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