#BeatPlasticPollution विश्व पर्यावरण दिवस 2018

आज वर्ल्ड एनवायरनमेंट डे अर्थात विश्व पर्यावरण दिवस है और इस वर्ष का थीम है, “BEAT PLASTIC POLLUTION” |

ये पर्यावरण क्या है ?

पर्यावरण एक परिस्थिति है जिससे आपका अस्तित्व है | अब सवाल ये है कि अपना अस्तित्व खुद बचाया जाय या किसी को ठेकेदार बनाएं !

पर्यावरण की आज की वर्तमान स्थिति क्या है इससे कोई अनजान नहीं हैं | पर बड़ा सवाल ये है कि सब जानकर भी लोग वास्तविकता से परे होकर कैसे शेखी बघाड़ रहे हैं ? ये जो आज ‘अधजल गगरी छलकत जाय’ को अक्षरशः चरितार्थ करते हुए मनुष्य अपने आध्यात्मिक परंपरा, संस्कृति के उपहास में अट्टहास करते हुए उछ्रिन्कलता पूर्वक भौतिकता को सम्यक आचरण बता रहा है उन्हें कौन समझाएगा ? ये कौन समझाएगा कि ये ललक ये भौतिकवादी विचारधारा टिकाऊ नहीं हैं, ये मृगतृष्णा है जिसकी कीमत अकाल मृत्यु है |

एक दशक पहले तक हमारे यहाँ पुराने कपड़े का झोला बनाया जाता था जो साक-सब्जी खरीदने के लिए व्यवहार किया जाता है | पोथी-पतरा के लिए लम्बी सी कपड़े वाली या जूट का झोला होता था | पर दिखावे या यूँ कहिये आधुनिकता की परिभाषा गढ़ने में हम बड़े तहजीब से बोलते हैं, “carry bag please !!” | और दूकानदार प्लास्टिक का एक थैला पकड़ा देता है | पिछले एक दशक में हम पलास्टिक पर ऐसे निर्भर हो चले हैं कि एक वर्ष में तक़रीबन एक ख़रब प्लास्टिक बैग घर ले आते हैं जिसको कहीं 100 साल से अधिक लग जायेंगे नस्ट होने में | तक़रीबन तेरह लाख टन प्लास्टिक हर साल नदियों-नालों-नहरों से होकर समंदर पहुँच रहा है और एक लाख से अधिक जलीय जिव के मृत्यु का कारण बन रहा है | आंकड़ों पर संदेह हो तो अपने घर के सामने बह रहे नाले पर एक नजर डालिए | कभी अपने घर के कूड़ेदान पर गौर किया है ? पूरे कचड़े का दस प्रतिशत तो पलास्टिक ही होता है |

ये जो आज हर देश में प्राकृतिक त्रासदी हो रहा है, ये बिल्कुल भी अस्वाभाविक नहीं है | ये पर्यावरण असंतुलन है |

बचपन में सुनते थे, “क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा, पञ्च रचित यह अधम शरीरा” | इन्हीं पांच तत्वों से शरीर का निर्माण होता है | पर क्या इनके संयोजन में अगर संतुलन नहीं रहेगा तो एक स्वस्थ शरीर का निर्माण हो सकेगा ? और स्वस्थ शरीर ही नहीं होगा तो स्वस्थ मस्तिष्क कैसे होगा !

हम खुद को काबिल बताने के लिए पूर्वजों को, रीति-रिवाजों को ढकोसला, अन्धविश्वास, ओल्ड फैशंड बोल देते हैं पर क्या हम सचमुच काबिल हैं ? ऐसी क्या काबिलियत हमारे तौर तरीकों में है ? हमारे पूर्वज काबिल थे, वो कहते थे पीपल लगाओ, नीम लगाओ….वृक्ष लगाओ, स्वर्ग मिलेगा | वह स्वर्ग यहीं था जो जीते जी उन्हें मिलता था | आप जो हनीमून मनाने जाते हो और कहते हो यही स्वर्ग है तो वो स्वर्ग आपके आँगन में क्यूँ नहीं है ? आपके शहर का एक कोना भी उस स्वर्ग जैसा क्यूँ नहीं है ? वैसा सुकून क्यूँ नहीं मिलता आपको ? जरा सोचिये |

एक वृक्ष को दस पुत्र से तुलना की गयी है | हमारी संस्कृति ने हमें प्रकृति का सम्मान करना सिखाया है और इस विरासत के साथ ही हस्तांतरित हुई है एक जिम्मेदारी इसके संरक्षण की, इसके संतुलन की |

पर्यावरण संरक्षण का यही उपाय मात्र है- पेड़ लगाना, पानी बचाना और प्लास्टिक को बाय बाय कहना | हमारे यहाँ पर्यावरण संरक्षण के लिए कई त्योहार मनाए जाते थे, आइये फिर से मनाते हैं जुड़-शीतल और पेड़ पौधों को देते हैं पानी, लगाते हैं पनशाला, बचाते हैं तालाब | हमें तो सिखाया गया था कि सगे-सम्बन्धियों के मौत के बाद उनकी याद में पेड़ लगाने के लिए | भोज-भात में भी पत्ते का थाली होता था और पानी पीने के लिए माटी का चुक्का | हमें सिखाया गया कि धरती माता है और हम इसके सीने में डालते हैं जहर, हमें बताया गया कि गंगा मैया है और हम इसको करते हैं गंदा….. हमलोग कर क्या रहे हैं ?

कहते हैं जब जागो तभी सवेरा | अभी देर नहीं हुई  है, थोडा सोचिये कि अपना घर बचाने में क्या योगदान दे सकते हैं |

“If you can’t reuse it, refuse it”