बिहार का लोक उत्सव सामा-चकेवा Nov18

बिहार का लोक उत्सव सामा-चकेवा...

     बिहार में कुछ त्योहार कुछ लोक उत्सव ऐसे हैं जो प्रकृति के प्रति प्रेम और सम्मान के प्रतीक के रूप में मनाये जाते हैं । मकर संक्रान्ति, छठ ऐसे ही कुछ त्योहार हैं । इसी तरह का एक लोक उत्सव है सामा-चकेवा । यह मुख्य रूप से बिहार के मिथिला क्षेत्र में कार्तिक पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है । महिलाएँ पारम्परिक रूप से सज-धज कर कार्तिक पूर्णिमा के शाम को मैथिली लोकगीत गाती हुई बाँस की टोकड़ी में मिट्टी के बने सामा-चकेवा, श्री सामा, चुगला, वृंदावन, बाटो बहिना, सतभैयाँ, पक्षी, पेड़, जानवर आदि के मिट्टी की बनी मूर्तियाँ लेकर खेतों में जाती हैं और इन मूर्तियों के साथ सामा-चकेवा का उत्सव हर्षोल्लास के संग मनाती हैं । इस उत्सव को ही...

खलिहान से लाइव – 56 इंच सीना Jan25

खलिहान से लाइव ̵...

खेती-किसानी सुनते-बतियाते हमें अक्सर सुदूर देहातों में घूमने का मौका मिलता है, कई तरह की भाषाएं सिखने को मिलती है, कई क्षेत्रीय रीति-रिवाजों को जानने-समझने का मौका मिलता है । हम अपनी मिट्टी, अपने देस को बेहद करीब से जानने लगते हैं । किसी किसान के यहां जब गाय दुहकर आपके लिये ‘चाह’...

काशी- यात्रावृतांत...

अभी काशी से विदा भी नहीं हुआ था कि कूची मष्तिष्क के अंतरपटल पर हर्ष की स्याही से क्षणों को दकीचे जा रहा था । पेट से माथे तक बबंडर उठा हुआ था । लेखक मन व्याकुल था, बार-बार कोशिस करता था और शब्द अव्यवस्थित हो रहे थे । मैं हर क्षण को शब्दों की चादर में छुपाकर आप तक सहेजकर कर लाना चाहता था । हम...

दिवाली Oct30

दिवाली

​ गाम की दिवाली अब नसीब नहीं होती….और शहर की यह चाइनीज दिवाली रास नहीं आती । बस यादों में सिमट कर रह गयी है । दादीमाँ मिट्टी की दिवारी (दीया) बनाती थी, हम बाँस के खोपलैया को ताड़ में गूँथ कर हुक्कालोली बनाते थे । बाद में दर्जी के यहाँ गेनी (कपड़े के टुकड़ो को बॉल की तरह बनाकर लोहे के ताड़...

सत्य बकर Sep14

सत्य बकर...

​सत्य बकर आज भादव का तेरस है, आज के दिन गांव के लोग महादेव मंदिर में जलाभिषेक करते हैं । मैं पकरी दयाल में हूँ और यहां पिछले एक महीने से तैयारी हो रही थी । सुबह 3 बजे से 1500-2000 महिला-पुरुष-बच्चे 3 घंटे प्रतिदिन टहलते थे । पर आज सोमेश्वर महादेव को जल चढाते ही यह दृढ़-निश्चय ख़त्म हो जाएगा ।...

शिक्षक दिवस पर एक विचार Sep05

शिक्षक दिवस पर एक वि...

​कभी-कभी जिंदगी और वक़्त के बारे में सोचता हूँ तो बड़ा ताज्जुब होता है । क्या है यह? कैसे संचालित होता है यह? कहीं कोई मदारी तो नहीं जो डमरू बजाता है और हम नाचने लगते हैं ?? बंद पलकों में ये कल का ख्वाब क्या है, कैसा है? हकीकत का गणित तो कुछ और कहता है… सच क्या है, झूठ क्या है? अर्थ क्या...

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