बदलाव

परिवर्तन के दौर में गाँव में पौराणिक रस्मों-रिवाज और आधुनिक तौर-तरीकों का संगम सामाजिक कैनवास पर गाँव का नया चित्र उकेर रहा है।
मैं इस वक़्त पकड़ी दयाल में हूँ, शादियों का मौसम है। उस जमाने में जब शादी के लिए रसूखदारों के शहजादे रथ पर निकलते थे तो घुड़सवारों का एक जत्था आगे आगे चलता था, ढ़ोल-तासे बजते थे, इक्कों और तांगों पर बारात चलती थी ।
वक़्त बदला तो रसूख़ की सामाजिक परिभाषा बदल गयी, पहले जमींदार रसूख़ थे और अब जिसने अर्थ प्रदर्शन कर लिया, ईज्जतदार रसूख़ हो गया । अब एक नमूना देखिये ।
दूल्हे राजा किराए की रथनुमा जीप में बैठें हैं, रथ रंगीन बल्बों से जगमगा रहा है । आगे-आगे डीजे बज रहा है, “….लुधियाना से अयली बलम जी”, तालियों के कुछ जादूगर नर्तकी भेष में अर्धनग्न नृत्य कर रहे हैं, पीछे कुछ शहजादे के मित्र सीटी बजाते हुए लाल रूमाल लहरा रहे हैं। दूल्हे के मामा100 के नये नये नोट लूटा रहे हैं, गाना बदल गया है, अब “लहरिया लुट् ए राजा..” बजने लगा है, घुड़सवारों की टोली ईधर-उधर दौड़ रही है, बीच-बीच में आतिशबाजी भी हो रही है। ये जश्न इनकी रसूख़ का प्रदर्शन है।
अब इनकी सोच भी काफ़ी उन्नत है । हम मौज मना रहे हैं तो आपके बाप का क्या जाता है! मेरा पैसा, मैं कुछ भी करुँ….!!

भाई बदलाव है ये… बदलाव । और आप कहते हो यहां कुछ नहीं बदला है ?