चुनाव Dec08

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चुनाव

चुनाव अब शहरों में नहीं होता, गाँव का रंग देखो, अभी चुनावी रंग में इन्द्रधनुष बना हुआ है | कच्ची-पक्की टूटी-फूटी सड़कों पर भोपूं लगाये रिकार्डेड जयकारों के संग गाड़ियाँ दौड़ रही है | पान-खैनी-चाय दुकान से लेकर खेत-खलिहान पगडंडियों पर भी बात-चीत का मुद्दा राजनीति ही है | सब अपनी अपनी हाँक रहे हैं | ऐसा लग रहा मानो पूरा एक्जिट पोल इन्होंने ही किया है |
आज गाँव में हूँ, बरसों बाद चुनावी माहौल को महसूस कर रहा हूँ | जब से गाँव छोड़ा चुनावी रंग की होली नहीं देख पाया | याद आता है जब बचपन में मेरे गाम में चुनाव के समय किसी नेता की गाड़ी भोपूं लगाये आती थी तो हम सब बच्चे उस गाड़ी से रेस लगाया करते थे….और मैं तो परेशान रहता था उस नेता को देखने-सुनने और उसकी धूल उड़ाती गाड़ी के पीछे दौड़ते हुए नारे लगाने के लिए | मेरे पिताजी सीधे-साधे आदमी है, कभी राजनीति में दिलचस्पी नहीं रखे, वजह शायद ये भी हो सकता है की वो राजनीति शास्त्र से ही स्नातकोत्तर किये हुए हैं तो उन्हें राजनीति के मतलब की अच्छी समझ होगी; खैर जो भी हो पर मुझे तो वो पसंद था…गाड़ियाँ कभी मेरे दरवाजे नही आयी, पड़ोस तक आती थी….पापा से पूछता तो वो टाल देते थे…मैंने भी एक दिन गुस्सा के बोल दिया था की आप देखना एक दिन मैं गाड़ियों को इसी दरवाजे से भेजूंगा और वो हर चौखट पर जायेगी, आदमी देखकर गाड़ियां घर नहीं चुनेगी | उस वक़्त गाड़ियां कम थी तो गाड़ी देखना भी अच्छा लगता था | आज ऐसे ही कुछ बच्चों को भागते हुए देखा तो बचपन याद आ गया | पर आज वो बचपन किसी सड़क पर चलने वाली गाड़ी के लिए नहीं, उड़ने वाली गाड़ी के लिए थी | अब देश की अर्थव्यवस्था मजबूत जो हो गयी है, हमारे देश के सपूत पार्टी फंड में इतना दान करते हैं की पार्टियां जमीं से आसमान तक एक लाख प्रतिदिन का किराया खर्च करके मतदाताओं को जगाती है | जागो ग्राहक जागो ||
कौन कहता है की हिन्दुस्तान गरीब है ??
खैर बातें हैं बातों का क्या | हमलोग सिर्फ बातें बनाना ही तो जानते हैं | अच्छा; आपने मतदान किया क्या? दान है भाई, करके देखो, अच्छा लगता है | अपना हक़ है, समझिये, कब तक सोईएगा ? अपने अधिकार समझिये, अपना सेवक चुनिए, सोचकर-समझकर, जांच कर-परखकर…..इंसान को पार्टी को नहीं | अब चुप्पी तोड़िए, आवाज को आवाज दीजिये |
हर वोट कीमती है, हर एक वोट जरुरी है |