गाम, आम और दादीमां May14

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गाम, आम और दादीमां

दालान से लाइव

जुड़-शीतल ख़त्म होते ही दादीमां की दिनचर्या बदल जाती है, वैसे ये कोई नई बात नही है, मौसम के अनुसार उनका दिनचर्या सालोभर बदलते रहता है | जाड़े में ऊन-काँटा पर सूखे हाथों की झूलती नसें थिरकती है, गर्मी में आम-आचार, मुंग-अरहर-सरसो, बरसात में आलय की साफ़-सफाई, खेत से सरसो, मिर्ची आया तो नीबूं-सरसो-मिर्ची का आचार, बाड़ी से ओल-मूली निकला तो उसका आचार, दिन-दिनभर पत्थर पर नीबूं घिसकर उसका निमकी….याद है कि भूल गये ?

अभी दादीमां आम-आचार में व्यस्त हैं |

जुड़-शीतल से शुरू होता है आम की चटनी के चटकारे ! कच्चा आम और पुदीने की पत्तियों को मिलाकर दादीमां चटनी पिसती है | स्वाद तो जो खाया वही जानता है | J लंबी बीमारी से उठने के बाद जो रोगी को अरुचि हो जाता है यहाँ उसकी भी खुराक बढ़ जाती है |

टिकुला (छोटा कच्चा आम) थोड़ा बड़ा होता है तो शुरू होता है अमचूर बनना | हर दिन सुबह-सुबह आम चुनना, उसे छिलना, काटना, सुखाना…..| गाछी से चुने हुए आमों में से आचार के लिए अच्छा अच्छा आम छांटा जाता है | शीशे के अलग-अलग जार और भिन्न-भिन्न तरह के आचार | किसी में आम को पतला-पतला काटकर, किसी में पीसकर, किसी में आम के चार टुकड़े कर के, किसी में कदूकस पर घीसकर, किसी में चीनी-गुड़ के साथ, किसी में नमक-हल्दी के साथ, तरह-तरह के मसाले, कुछ भुने हुए, कुछ कच्चे… आचार का भी विन्यास होता है | फिर हिस्सा लगता है – यह दिल्ली वाली बुआ के लिए, यह लखनऊ वाले नबाब साहब के लिए, यह पटना वाले चाचा के लिए, यह मामा के लिए….यह बुचीया की शादी के लिए, यह बुआ की गोतनी की चाची की बेटी की शादी के लिए, सबका हिस्सा लगता है |

आचार का दौड़ ख़त्म होते ही शुरू होता है अमावट की तैयारियां…| मई-जून की तपती दोपहरी में दादीमां थरथराते-कांपते हाथों से खलिहान में चौकी पर आम का रस सुखाती है, हर एक घंटे पर नया रस डाल कर हाथ से मिलाना होता है, पसीने से लथ-पथ होती है, हांफती रहती है, पर चेहरे पर परेशानी की महीन सी भी लकीर नहीं | दोपहर को जब घर में सबलोग सो रहा होता है, वह बरामदे पर बैठकर कौवा-मैना भगाती रहती है | कभी मौसम का मिजाज़ बदला, बदरी छाया तो दादीमां उदास हो जाती है | पर हिम्मत नहीं हारती, चूल्हे पर आम के गुदे को खौलाकर उसे जमाती है और अमावट बनाती है | अलग-अलग किस्म के आमों का अलग-अलग अमावट | यहाँ भी हिस्सा लगता है, बुआ के लिए, चाचा के लिए, मामा के लिए…..|

और फिर अमावट के टुकरों को एक-एक कर साफ़ सूती कपड़े लपेट कर रखती है | अक्सर मैंने दादीमां को अपनी नई साड़ी को फाड़कर टुकड़ा बनाते देखा है |

यह गाँव होता है जहाँ दादीमां अपने बच्चों को तोहफे में गाम का प्रेम, स्वाद और खुशबू भेजती है | कैसा होता है दादीमां का प्रेम ? उनका दिल ?

और आजकल के शहरी आधुनिक लोग…जिनके लिए बुढियां मतलब परेशानी, समस्या, कबाब में हड्डी…..और समाधान वृद्धाआश्रम…. | सोचो एक बार | वृद्धाआश्रम भेजकर खर्चे उठाने का पैसा है तो उन्हें गाँव भेज दो, एक आदमी उनकी देखभाल के लिए रख दो, एक-दो महिना पर आकर उनसे मिलते रहो | वो आपके लिए प्यार संजोते रहेगी | कुछ लोग बूढ़े-बुढ़ियों पर चिल्लाते हैं, झुंझलाते हैं, कुछ लोग उनको गाँव में भगवान् भरोसे छोड़कर भूल जाते हैं | ऐसा नही करना प्लीज, उनका दिल मत तोड़ना, वो जो आज हैं, कल तुम भी तो होगे ! क्या बाज़ार की उस गाज़र-नीबूं वाली लाल आचार में स्वाद आता है ? क्या शहर में कभी मटर और खेसारी के कोमल पत्ते को बेसन में लपेटकर खाए हो ?

गाँव की ओर मुड़कर तो देखो कभी चाचू…यहाँ कितनी दादीमां हैं आपकी बाट जोहते | अब तो उनकी आँखें पथरा गयी है | दादीमां है तो गाम है | आपको तो आपके शहर का शमशान भी नहीं पहचानता, पर गाँव में कोई अजनबी ही नहीं मिलता | आईये गाम कभी, फिर बात करेंगे, आम-गाम और दादीमां की |