दिवाली Oct30

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दिवाली


गाम की दिवाली अब नसीब नहीं होती….और शहर की यह चाइनीज दिवाली रास नहीं आती । बस यादों में सिमट कर रह गयी है ।

दादीमाँ मिट्टी की दिवारी (दीया) बनाती थी, हम बाँस के खोपलैया को ताड़ में गूँथ कर हुक्कालोली बनाते थे । बाद में दर्जी के यहाँ गेनी (कपड़े के टुकड़ो को बॉल की तरह बनाकर लोहे के ताड़ में गूँथ कर बनता है) बिकने लगा, आठ आना में देता था । दिनभर मटिया तेल चुड़ाकर उसे डूबा कर रखते थे फिर शाम में आग लगाकर खूब नचाते थे, कभी-कभी गेनी हवा में उछालकर आग से खेलने का स्टंट भी करते थे ।

शाम में फिर खड़ का ऊक बनाकर खबास भैया लाते थे और फिर हमलोग लक्ष्मी पूजा के बाद उखड़ (ओखली) पर सूप रखकर धान और दीया रखा रहता था । दीया से ऊक जलाकर ‘अन्न-धन लक्ष्मी घर आउ, दरिद्रा बाहर जाऊ’ कहते हुए आँगन से बाहर खेत तक ऊक भाँजते थे । फिर सब बैठकर प्रसाद बांटते थे । वो चीनी सिरके में भूना हुआ मखाना का स्वाद तो आज भी याद करके मुस्कुरा देता हूँ । दादीमाँ अरिपन बनाती थी । माँ तो दिन भर डिबिया बनाने और उसमें मटिया तेल भरने में व्यस्त रहती थी । सब लोग मिलकर डिबिया चारो तरफ जलाते थे ।

सुबह फिर 4 बजे ही दादीमाँ सुकराती बजाती थी । सुकराती सूप पर संठी (पटुआ का डंडा) से बजाया जाता है ।

पेट की आग और शहरी चकाचौंध घर से इतना दूर ले आया है कि अब फ़ेसबुकिया दिवाली ही मनाकर काम चला रहे हैं ।