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भाग-1. मैं, नेहा और जलेबी

Posted by on May 25, 2018 in Fiction | 7 comments

भाग-1.  मैं, नेहा और जलेबी

भाग-1.

मैं, नेहा और जलेबी

 

 

 

ये उन दिनों की बात है जब पैरों में कोई लेक्सो का हवाई चप्पल होता था, जिसपर कछुआ छाप से थोड़ा जलाकर हम निशान बना देते थे कि कहीं बदला ना हो जाये, घुटने से दो बिलांग छोटी बुल्लू (ब्लू) कलर की पैन्ट होती थी, जिसमें जिप की जगह बटन होता था क्यूंकि जिप में अक्सर मेरा फंस जाया करता था और उस समय उस उमर में अन्दर ‘वो’ पहनने की जागरूकता नहीं थी, रंगीन गंजी होता था और इन्द्रधनुष रंग का हाफ शर्ट | गोरे बदन पर गंजी के नीचें गंजी का निशान बड़ा प्यारा लगता था, अक्सर अकेले गाछी में जलेबी खाते खाते हम दोनों के एक दुसरे के निशान में ‘मैं ज्यादा गोरा….मैं ज्यादा गोरी’ करते रहते थे | शर्ट के बांह से बगलों में झाँककर बचपन और जवानी में अंतर ढूंढा करते थे | ये वो दिन था जब गाम में किसी किसी के घरों में टिभी होता था और श्वेत-श्याम सिनेमा में भी जब नायक नायिका रोमांस करते थे, तो बड़े बुजुर्ग चैनल बदल देते थे कि ‘गन्दी बातें’ हम सिख ना लें | और कुछ तो सिख भी लिया था जैसे पुआल का बीड़ी फूँकना |

 

वो शहर में रहती थी और मैं गाम में | साल में बस एक बार वो आती थी एक महीने के लिए, महीने का नाम पता नहीं | ये वो दौर था जब हमें ना जनवरी-फ़रवरी आता था ना ही जेठ-आखार | आता था तो बस जलेबी के पेड़ देखकर गिनती करना | मोबाइल था नहीं जो उसका हर खबर उंगलिया थिरकने भर से मिल जाती, चिट्ठी लिखने में डर लगता था, एक दोस्त का फोन बूथ था तो कभी कभार चोरी से वो एक उम्मीद बनकर निकलता था | हाँ फोन नंबर तो एसटीडी कोड के साथ याद था |

 

सर्दी अब सुबह-शाम हाफ स्वेटर में सिमट गया था, काकाजी के बाड़ी में सूसू के बहाने जलेबी का वो पेड़ अब हर दिन मुझे अपने पास बुलाने लगा था | कई बार डांट पड़ती थी कि कहाँ जंगल में जा रहे हो, उधर गेहूँअन रहता है | मुझे जलेबी काफ़ी खुश दिख रहा था, शायद परागण के दौर में सृष्टी ऐसे ही खुशनुमा हो जाता है | जलेबी की फुनगियों पर फूल आने की सुगबुगाहट के बीच किसी को अब इंतज़ार था तो बस फल पकने तक की | हर दिन घंटों जलेबी के साथ गुप्तगू होता था | गिनती शुरु हो गयी थी | एक दिन दो दिन तीन दिन पुरे ढाई महीने के बाद वो दिन आ गया था, वो गाम आई थी, हमारा भी स्कूल का इम्तहान हो गया था और गर्मी की छुट्टियाँ शुरू हो गयी थी |

 

वो जब बस से उतर रही थी, मैं बाबूजी के साथ तरकारी खरीद रहा था | आँखें टकराई और पैरों में पंख लग गये थे, इतना अलबला गया था कि झिंगनी को बाबूजी और बाबूजी को झिंगनी बोल बैठा | मुझे अब जल्दी था सब्जी का झोला घर पटक कर जलेबी को खुशखबरी देने की | जब तक दीखा, देखता रहा, मुस्कुराता रहा, वो बैग थामे घर जा रही थी, बीच बीच में पलटकर मुस्कुरा देती थी |

 

सायकिल उपर से चलाना नहीं आता था, एक तरफ लटककर चलाते जल्दी से घर पहुंचा और जलेबी से जाकर लिपट गया | इतना बेसुध था कि याद ही नहीं रहा और एक काँटा गाल में भी चुभ गया |

 

अगले दिन कई बार उसे देखने की कोशिस की पर उसके घर जाने की हिम्मत नहीं था, शाम में मच्छड़ भाई मच्छड़ खेलते वक़्त वो आई | पीले रंग का सूट, कानों में झूलती हुई एक शहरी बाली और नाक में देसी नथिया | दिल नथिये पर अटक गया था | लम्बे खुले बाल हवा में अठखेलियाँ करती हुई मुझे बेसुध कर रही थी |

 

वो मेरी ऐसी प्रेमिका थी या यूँ कहिये कि वो मेरा ऐसा प्रेम था कि मुझे उसका नाम भी लेने में धाख होता था, जुबान लड़खड़ा जाता था उसे नाम लेकर पुकारने में, कहीं दूर भी कोई उसका नाम लेता था तो सभी इन्द्रियां जाग उठती थी, रोएँ भी खड़े होकर सुनने लगता था | बाल्मीकि की तरह तरह मरा मरा बोलकर हकलाते हुए, झिझकते हुए उसे अपने पास बुलाया था |

 

मेरा हाथ थामे वो भी पेड़ पर चढ़ आयी, उसके बाल मेरे चेहरे को ढकते हुए छिटक सा गया था, खुश्बू उसका था या स्नो-पाउडर का या परफ्यूम का पता नहीं | गाम में तो परफ्यूम का चलन नहीं था पर वो शहरी थी तो हो भी सकता है पर आजतक वो खुश्बू मेरे नाक में है और कहीं वैसा दुबारा नहीं मिला | वो जब भी पास आई खुश्बू एक ही था |

 

शाम ढलने को थी, हम मच्छड़ भाई मच्छड़ छोडकर अन्तराक्षरी खेलने बैठ गया | रेडियों पर बहुत नये गाने सुनने को मिलता नहीं था तो मुझे सिर्फ कुमार सानु के गाने आते थे | चोरी चोरी जब नज़रें मिली….मैं गा रहा था और वो मेरा हाथ थामे नांचने लगी थी | उस गोधूली बेला में भी मेरा सिहरन और लजाया चेहरा अच्छे से उसे दीख गया था |

 

“आशिक गौरव….बिरजू का प्यार नेहा के लिए ?” ना मैं बिरजू को जानता था ना ये बात समझ आई थी पर इतना समझ आ गया था कि वो मेरा चुटकी ले रही थी | शहरी लड़की थोड़ी बेबाक और बिंदास होती है पर गाँव का छोड़ा थोड़ा लजकोटर तो होता ही है |

 

शाम गहरी हो गयी थी, उसके अंगने से काकी उसकी मामी आवाज़ दे रही थी | जाते जाते मैंने फुसफुसाकर बस कहा “लाल लाल जलेबी तेरे लिए रखा हूँ, मेरे घर कब आओगी ?” “कल” अँधेरे में बड़े जोर से गाल खिंची थी मेरा |

 

रात भर मैं बुदबुदाता रहा | दादीमाँ उठकर कई बार गंगाजल छिडकी थी |

 

“जहाँ तहां बौवाते रहता है, बिना पैर धोये सोया है…समझता ही नहीं है..” सिरहाने हनुमान चालीसा और दुर्गा सप्तशती रख रही थी |

 

अगली सुबह उठकर पहला काम लग्गा बनाना हुआ | गंजी फाड़कर लत्ता बनाया और बांस में लत्ते से केमची बांधकर लग्गा तैयार |

 

दोपहर वो यही कुछ ढाई बजे के करीब आई थी, मैं बेरहट खा रहा था, साथ ही दो कौर खायी और फिर उसे मैं जलेबी से मिलाने लेकर चला गया | चेहरे पर कुछ शहरीपन लग रहा था मुझे |

 

“बिना नथिये के तुम मेरी लगती ही नहीं हो, शहरी जैसी लगती हो” 

 

“तो तुम्हें देहाती नेहा चाहिए ?” 

 

“हूँ”

 

“हाहाहा….” खिलखिलाकर हंस पड़ी थी | मुझे उसे चुपचाप निहारना अच्छा लगता था, बातों में थोड़ी झिझक रहती थी | मुझे कुछ समझ नहीं आया, जलेबी तोड़ने में लग गया | लाल लाल मोटा मोटा जलेबी तोड़कर केले के पत्ते पर जमा किया और पुआल के टाल के पास अटक कर बैठ गया | वो मुझमें अटक कर बैठकर जलेबी खाने लगी | मैं थोडा असहज हो गया था |

 

“ओए…ठीक से बैठो तुम…कोई देख लेगा…”

 

“तुम इतना डरते क्यूँ हो ?”

 

“किससे ??”

 

“खुद से…गाम वालों से….”

 

“डरते नहीं हैं…ये सब गन्दी बात है….”

 

“क्या ? लडकियों से बात करना या छूना ?”

 

मैं सकपका गया था | जलेबी उसे देते हुए बात बदलने लगा | उसे कैसे बताता कि स्पर्श, मन से मन की भावना का संचार करता है | और भावना था एक दुसरे में समा जाना जैसे जल में नमक और चीनी |

 

“जानती हो इस पेड़ का जलेबी सबसे मीठा होता है”

 

मेर गोद में सर रखकर लेटते हुए वो जलेबी खाते-खाते बोली, “तुम इससे हमारी बातें करते हो ना, हमारी बातें सुन सुनकर ये मीठा हो गया है |”

 

हम कुछ देर एक दुसरे की उँगलियों में उँगलियाँ फंसाते रहे |

 

“जानती हो मेरा सीना अभी भी तेरे सीने से ज्यादा गोरा है” उसके सीने पर ऊँगली चुभाते हुआ मैं बोला | वो एक टक निहार रही थी मुझे | मैं असहजता से इधर उधर देखने लगा और मेरी उँगलियाँ उसके गाल उसके कान उसके बालों के इर्द गिर्द थिरक रहे थे | बड़ी देर तक हम ऐसे ही रहे जलेबी खाते खाते खामोश |

 

शायद कई बार माँ के पुकारने के बाद आवाज़ कानों तक आई थी | “खाओ दोनों खूब जलेबी, पेट में कीड़े होंगे दर्द होगा तो पेट पकड़कर रोते रहना”

 

“हाँ हाँ….मैं भी इसे यही बोल रहा था पर ये माने तब तो….जबरदस्ती मुझे तब से जलेबी खिलाये जा रहा है…” जाते जाते माँ की आग में फोरन डाल गयी |

 

पर अब ये रूटीन हो गया था, भर दुपहरिया हम जलेबीबाजी करते थे, फिर सबके साथ मच्छड़ भाई मच्छड़ या डिंगा पानी या अन्तराक्षरी | नेहा से पहली बार मैं कब मिला था मुझे याद नहीं | पर जब से होश संभाला वो मुझे अच्छी ही लगी | लड़कियां तो बहुत सी थी पर उसको देखकर ना जाने क्यूँ मैं बावला हो जाता था | दिल से गुजरने वाली रक्त में बुलबुले उठने लगते थे और दिल की गुदगुदी सभी इन्द्रियों पर प्रभावी रहती थी | दुर्गापूजा में 5 रूपये का काला चश्मा सिर्फ उसी के लिए खरीदता था | दिन हो या रात हो दीवानों को परवाह कहाँ, चश्मा चढ़ आता था | रात में काला चश्मा देख कितने लोग मजाक उड़ाते थे पर वो कह देती थी कि अच्छा लगता है और मैं पागल हो जाता था | घर में टिभी रहता तो मैं पक्का फ़िल्मी डायलॉग भी झाड़ते रहता | आँखें जब उसकी आँखों पर टिकती थी तो घंटों पलकें झपकाना भूल जाता था | प्रेम का एक नाम उटपटांग हरकत भी होनी चाहिए |

 

देखते ही देखते वक़्त निकल गया | छुट्टियाँ ख़त्म हो गयी थी | इस बार उसकी छुट्टियाँ लम्बी हो गयी थी, मेरा स्कूल खुल गया था | स्कूल का रास्ता उसके घर से होकर जाता था, पर सुबह उसे लेट से उठने की आदत थी | स्कूल जाते वक़्त तो कभी नहीं दिखी और हाँ आते वक़्त बरामदे पर सोयी दीख जाती थी या मेरे लिए सोने का नाटक कर लेटी रहती थी |

 

बीरबल के फूलबाड़ी में बड़े अच्छे गुलाब लगे थे, बीरबल एकमात्र अपना राजदार था, वो मेरा मीता था | वही सिखाया भी था कि प्रेम में पुष्प की एक भाषा होती है | हर दिन स्कूल से लौटते वक़्त एक फूल चुरा लेता था और नेहा के दरवाजे पर फूल छोड़ आता था | एक दिन तो काकी ने फूल चुडाते पकड़ ही लिया था पर मीता ने संभाल लिया |

 

“फूल क्यूँ तोड़ रहे हो गौरव ?”

 

“माँ गौरव के खरगोश को गुलाब की पंखुड़ी बड़ा अच्छा लगता है |” खरगोश गुलाब खाता भी है कि पता नहीं पर मीता की हाजीरजबाबी मुझे महफूज कर दिया था | या काकी ने बच्चा समझकर ध्यान नहीं दिया |

 

मैं गुलाब उसके घर के पास फेंक आता था, उसे गुलाब कभी मिला या नहीं ये कभी पूछा नहीं पर कभी मुझे उस फेकें हुए जगह पर गुलाब नहीं मिला, ना ही कभी हमारे बीच गुलाब की चर्चा ही हुई |

 

आज स्कूल से लौटा तो माँ बताई की आज नेहा का जन्मदिन है, कल वो चली जाएगी | मुझे कुछ तोहफा सूझ नहीं रहा था | कुछ गोपी आम तोड़ा, कुछ जलेबियाँ तोड़ी और दो मोर्टन टॉफ़ी एक पन्नी में भर लिया | उल्लसित मन को चैन कहाँ, जैसा था वैसे ही पहुँच गया | वो नये कपड़े पहनकर तैयार बैठी थी | परी देखा तो नहीं था पर नंदन में पढ़ी हुई परी सी लग रही थी वो | सांझ की मद्धम सी रौशनी में पूनम की चाँद सा दुधिया दमकता चेहरा, उजला समीज-सलवार, बाल खुले पीठ पर बेपरवाह बिखड़े हुए, कानों में लंबा सा झूलता हुआ शहरी झुमका, नाक में वही देहाती नथिनी, काली आखोँ में गहराती काजल, सुर्ख होठों पर गुलाबी मुस्कान नमीं बिखेड़े हुए, एक कंधे से जमीं को छूता दुपट्टा, हाथों में भरी हुई चूडियाँ और हर आहट पर खनकता पाजेब नेहा को सम्पूर्ण कर दिया था | ह्रदय के बुलबुले से शारीरिक संतुलन बिगड़ सा गया था | अपने नाजुक हाथों मेरे दोनों हाथों को थामकर चौकी पर बिठाई | आज पहली बार उसे देखकर प्रेम की चरम अनुभूति हुई थी | गोधूली बेला में मेरा बाबला दिल स्लो मोशन में भुजालिंगन को आतुर था लेकिन दिमागपट्ट पर बार-बार चेतवानी आ रहा था– “गन्दी बात” | पर शहर में कुछ गन्दी बात नहीं होता और उस शहरी आँखों में कुछ बड़ा खुरापात दीख रहा था मुझे और अगले ही पल वो मुझे पलंग पर धकेल जलेबी का बीज मुँह में छोड़ खिलखिलाकर हंस रही थी | मैं लजाया हुआ था, जलेबी उसके पास और बीज मेरे मुँह में | ये हादसा उस वक़्त के मेरे इतिहास का पहला हादसा था जो आहिस्ता आहिस्ता मेरे ह्रदय के पन्नों पर एक नाम दकीच रहा था | हाने…हाने….हाने…..जलेबी…जलेबी…जलेबी….|

वो लौट रही थी और सूना हो रहा था मेरा संसार, जलेबी का पेड़ और वो आम का पेड़ जहाँ मच्छड़ भाई मच्छड़ खेलते थे | आज स्कूल से लौटकर शाम किसी कोने में बैठकर रोने को दिल कर रहा था, नेहा बहुत याद आ रही थी | बीरबल का टेलीफोन बूथ खुला था

“मीता अभी काकाजी नहीं हैं, एक बार फोन लगा के देख ना कि कौन उठाता है…अगर उसकी आवाज़ लगे तो समझेंगे सही से पहुँच गयी”

 

फोन दो दिन से डेड था, मन मसोसकर चल दिया घर | जलेबी के पेड़ भी ठूठ से लग रहे थे, एक आध कहीं कहीं सूखा जलेबी लटक रहा था | कुछ दिन यूहीं चलता रहा | जलेबी से मिलना वो गुप्तगू सब बंद हो गया था | बरसात जाते ही फिर से नई फुनगियाँ आने लगी थी और मैं फिर से उसके आने का दिन गिनने लगा था |

जलेबी

पोसिया

Posted by on Feb 20, 2016 in Fiction | 0 comments

पोसिया

गाँव के पूरब नदी किनारे मुसहर वस्ती थी, ५ बेटियों के बाद विदेसर मुसहर को जुड़वाँ बेटा हुआ – टिंगा मारी और सफल, लोग प्यार से टिंगा मारी को टीमा और सफल को सुफला बुलाने लगे | विदेसर को जब आठवें संतान की प्राप्ति हुई तो उसकी बड़ी बेटी भी माँ बन चुकी थी | आठवें बच्चे को जन्म देते ही विदेसर की पत्नी परलोक सिधार गयी | आठवीं बेटी ३१ दिसम्बर को हुई थी, पूस अपनी जवानी में सर्द था, विदेसर की भौजाई ने बच्चे का नाम रखा पूसा |

गाँव के सबसे बड़े जमींदार वेदनाथ मिश्र का बड़ी मान-मन्नौवल….इश्वर आराधना के बाद एक पुत्र की प्राप्ति हुई | पूरा माघ वेदनाथ जी बनारस में बाबा विश्वनाथ का पूजा करके पुत्र प्राप्ति का आशीर्वाद माँगा था | इसीलिए पुत्र को बाबा विश्वनाथ का प्रसाद समझकर उसका नाम विश्वनाथ रखा | गाँव के लोग उच्चारण से अक्सर खिलवाड़ करते रहते हैं, विश्वनाथ नाम सिर्फ स्कूल के रजिस्टर में रह गया. लोग विषनाथ कहकर पुकारने लगे | माँ-बाप का इकलौता बेटा, एक नंबर का शैतान, गुस्सा नाक पर और गाली तो उसका बपौती भाषा था, शायद इसीलिए लोग उसे विषनाथ कहते थे |

विदेसर वेदनाथ जी का खानदानी नौकर था…बच्चे वेदनाथ जी के घर ही चौका-वर्तन किया करते थे, गाँव के बदमास बच्चे पूसा को अक्सर पोसिया कहकर चिढ़ाते रहते थे (गाँव में बंधक रखे गये जानवर को पोसिया कहते हैं) | पोसिया के संसार में एक ही इंसान था जो उसे बहुत प्यार करता था, बहुत इज्जत करता था, सबसे छुपाकर उसे खीर और हलुआ खिलाता था, वो था विषनाथ | विषनाथ पोसिया को पुस्सी बुलाता था |

रेडियो सुनकर सुनकर पोसिया बड़ी हुई थी, हर समाचार से पहले परिवार नियोजन का विज्ञापन तो उसे कंठस्थ था…फिर कैसे उस रात विषनाथ के आलिंगन में प्लास्टिक की बांध समंदर के हिलोरों से टूट गयी और पोसिया पेट से हो गयी | आगे क्या हुआ?

क्या हुआ जब पोसिया की भैस उसकी जन्मदिन के रात ठंड से मर गयी ?

विदेसर ने अपने बेटे टीमा का खून क्यों किया ?

विषनाथ का एक्सीडेंट कैसे हुआ ?

वेदनाथ जी की बहु विलायत क्यों चली गयी ?

आगे की कहानी क्या आप खरीदकर पढना चाहेंगे ?