Gaam-Ghar

खलिहान से लाइव – 56 इंच सीना

Posted by on Jan 25, 2017 in Gaam-Ghar | 0 comments

खलिहान से लाइव – 56 इंच सीना

खेती-किसानी सुनते-बतियाते हमें अक्सर सुदूर देहातों में घूमने का मौका मिलता है, कई तरह की भाषाएं सिखने को मिलती है, कई क्षेत्रीय रीति-रिवाजों को जानने-समझने का मौका मिलता है । हम अपनी मिट्टी, अपने देस को बेहद करीब से जानने लगते हैं ।
किसी किसान के यहां जब गाय दुहकर आपके लिये ‘चाह’ (चाय) बनाया जाता है, या किसी के घर आप भरी दुपहरी में पहुँचते हैं तो वो आपसे खाने के लिए पूछता नहीं है वरन बोलता है, “हाथ-पैर धो लीजिये, थाली लग गयी है ।”
बंद कमरे की आरामकुर्सी हो या कैंटीन-रेस्तरां के लज़ीज व्यंजन ऐसा सुकून इतना प्यार इतना सम्मान नहीं मिलता कहीं ।
जिंदगी जीने का असली मज़ा तो यहीं है, अपनी मिट्टी, अपने खेत और खेत की पगडंडियों पर बचपन को जीते हुए कुछ अच्छा कर गुजरना, कि जब कभी पीछे पलट के देखो एक साथ कई चेहरों पर मुस्कान दिखेगी । ऐसे होता है 56 इंच सीना ।

काशी- यात्रावृतांत

Posted by on Nov 18, 2016 in Gaam-Ghar, Yatra | 0 comments

काशी- यात्रावृतांत

अभी काशी से विदा भी नहीं हुआ था कि कूची मष्तिष्क के अंतरपटल पर हर्ष की स्याही से क्षणों को दकीचे जा रहा था । पेट से माथे तक बबंडर उठा हुआ था । लेखक मन व्याकुल था, बार-बार कोशिस करता था और शब्द अव्यवस्थित हो रहे थे । मैं हर क्षण को शब्दों की चादर में छुपाकर आप तक सहेजकर कर लाना चाहता था ।
हम रात के आखिरी पहर में काशी पहुंचे थे । मुगलसराय से जो ऑटो (टेम्पो) रिजर्व था, हरिश्चन्द्र घाट पर पहुंचा । चिताएं भभक रही थी, जिस जिस्म को जिंदगी भर सवांरा था, आज राख हो रहा था, चाण्डाल बाँस के बल्ले से उसे राख करने को आतुर थे, हरिश्चन्द्रों की भीड़ लगी थी । एक कोई बेटा था, जिसकी आँखों में भावनाओं की समंदर उतर आया था, जो ज्वार बनकर आग बुझाने को व्याकुल था ।
हम नीचें गंगा के तीर पहुँचकर अंजलि में चुरुक भर गंगाजल उठाकर खुद को सिक्त किया । अभी सूरज के मुँह से रात की चादर सरकी नहीं थी, कुछ देर वहीं बैठा फिर सभी मित्रों से विमर्श के बाद नौका विहार का आनंद उठाने का विचार किया गया । हज़ारों की संख्या में विदेशी सैलानी कुछ सैकड़ों की संख्या में नावों पर सवार थे, बड़े बड़े कैमरे ज्यामिति के सभी प्रमेयों को सिद्ध कर रहे थे । कभी सीधी रेखा पर, कभी तिरछी, कभी कोण बनाकर कैमरे में वक़्त के संग दृश्य को संजोया जा रहा था ।
और देखने को मिल रही थी हमारे हिंदुस्तान के युवाओं के हाथों घटिया मेहमानवाजी । खैर अजनबियों को हमारे संस्कार में अभिनंदन नहीं करते पर हम एक-आध ऐसे भी थे जिनपर पाश्चात्य संस्कृत का कुछ असर था, हमारी नाव के बगल से उनकी नाव गुजरी, हमने मुस्कुरा कर हाथ हिलाकर एक दूसरे का अभिनन्दन किया । आज काफ़ी दिनों बाद उगते सूरज को देख रहा था, सूरज गंगा के दूसरे छोड़ पर गंगा स्नान करके धीरे धीरे पानी की सतह से ऊपर उठ रहा था ।
दरभंगा घाट से गुजरते हुए गंगा से बड़ा अपनापन लग रहा था । इतिहास की अधिक जानकारी नहीं है, पर यहाँ लगा की महाराज दरभंगा ने भी बड़े-बड़े काम किये थे । नाव सभी छोटी-बड़ी घाटों से गुजरती हुई दश्वमेघ घाट पर हमें छोड़ किसी और को गंगा की सैर कराने निकल पड़ी ।
माननीय गार्जियन भाई नवल श्री पंकज बिना सोचविचार के स्नान को गंगा में उतर गए । बाकि हमलोग कुछ देर ठंढ और गंगाजल की स्वच्छता पर चिंतन-मनन करते रहे और फिर 28 वर्षों का पाप पखाड़ने उतर गये । जैसे ही पाप उतरा, शरीर का तापमान बढ़ गया । दो मित्र तो अभी तक पारासीटामोल की शरण में हैं । भाई की ईच्छा काशी विश्वनाथ की पूजा की भी थी परंतु हमें देव दीपावली के कारण भीड़ की उपस्थिति का अंदाज़ा था । देव को बाहर से ही नमस्कार किया । भाई लोग कुछ देर पंक्तिबद्ध रहे और फिर बीएचयू कैंपस के विश्वनाथ पर अछिन्जल समर्पण के प्रस्ताव के साथ लौट आये ।
हमारे मित्र पंकज भाई बीएचयू से आये थे, हम उनके साथ ई-रिक्सा पर काशी की गलियों से गुजरते हुए काशी हिन्दू विश्वविद्यालय परिसर में उपस्थित हुए । यहाँ विश्वनाथ जी का संपूर्ण दर्शन हुआ । मंदिर का आलय भव्य है । पता चला मालवीय जी के सपने को साकार करने में दरभंगा महाराज का भी बड़ा योगदान था ।
अब तक जठराग्नि ज्वालामुखी बन चुकी थी, पहला निर्विरोध लोकतान्त्रिक निर्णय छोले-भटूरे जलपान के निश्चय से हुआ तत्पश्चात ऊर्जा का संचार सभी पुण्यात्माओं में दिखने लगा था । दोपहर पंकज भाई के निवास में आराम किया गया ।
2 बजे हम अपने मुख्य उद्देश्य मैथिलि साहित्य और भासा के विकास को समर्पित साहित्यिक चौपाड़ि के मासिक बैसार को काशी यात्रा के आखिरी पड़ाव अस्सी घाट की तरफ़ चल पड़े । यहाँ का दृश्य बड़ा मनोरम था । घाट की सीढ़ियों पर कई सैलानी चीलम की कश ले रहे थे । काले और लाल दो तरह के वस्त्रों में जटाधारी बाबाओं का दर्शन हुआ । काले वाले शायद शाक्त थे । पूरे घाट के निरीक्षणोंपरांत हम यज्ञशाला के फर्श पर अपना कार्यक्रम शुरू किये । कार्यक्रम अद्भुत रहा । कुल 5 नये लेखकों ने अपनी रचना को पहली बार प्रस्तुति देकर मैथिलि भासा एवं साहित्य के संवर्धन की ओर अग्रसर हुए ।
कार्यक्रम के उपरांत हम उपस्थित भीड़ का आनंद लेने लगे । जितना सुना था उससे कहीं ज्यादा खूबसूरत है काशी । बालाएँ सौंदर्य की प्रतिमूर्ति थी, एक क्षण में किसी शायर की ग़ज़ल यहाँ मुक्कमल हो सकती है, कोई सिरफिरा लेखक एक रात में उपन्यास लिख सकता है । कुछ चित्रकला संकाय के बच्चे दृश्यों को चित्रों में उकेर रहे थे ।
आया तो पहले भी था एकबार पर उस वक़्त इतनी दिलचस्प नहीं लगी थी पर अबकी हम ईश्क़ में नहीं थे, इस्तीफ़ा देकर स्वच्छंद ईश्क़कार के रूप में विचरण कर रहे थे । काशी के हर मोड़ पर हम बहक से रहे थे, रूककर इश्क़ में फ़ना होने को दृढसंकल्पित थे । धरती पर कहीं कहीं स्वर्ग है तो काशी में भी है । फिजाओं में ही नशा है, चीलम की मादकता है । धमनियों में रक्त भांग हो गया था, शनैः शनैः प्रवाह में था । हम रम से गये थे ।
हज़ारों लोगों के साथ हम भी शाम को गंगा आरती के गवाह बने ।असंख्य दीप गंगा में तैर रहे थे । सबसे खास आकर्षण था अखंड दीप । एक टोकरी में दीये जलाकर उसे बाँस के एक डंडे में लटकाकर रख दिया जाता है जो पूरी रात जलता रहता है । ऐसे सैकड़ों अखंड दीप यहाँ जल रहे थे । लोगों ने बताया कि ये भारत माता के वीर सपूतों की याद में नित्य रूप से जलाया जाता है । एक बूढ़ी माँ अपने शहीद बेटे की याद में अखंड दीप जला रही थी । हमारी आँखें नम हो गयी थी ।
समय कब गुज़र गया, पता ही नहीं चला । अब हमारे वापस लौटने का वक़्त हो गया था । काशी से मुगलसराय तक सब गुमशुम से ऑटो में बैठे थे, मन-मस्तिष्क पर काशी की अमिट छाप पड़ गयी थी ।
ट्रेन का ज्यादा इंतज़ार नहीं करना पड़ा । हम पटना के लिए प्रस्थान कर रहे थे, इस उम्मीद के साथ की अब हर साल एक बार तो जरूर काशी आएंगे ।

दिवाली

Posted by on Oct 30, 2016 in Gaam-Ghar | 0 comments

दिवाली


गाम की दिवाली अब नसीब नहीं होती….और शहर की यह चाइनीज दिवाली रास नहीं आती । बस यादों में सिमट कर रह गयी है ।

दादीमाँ मिट्टी की दिवारी (दीया) बनाती थी, हम बाँस के खोपलैया को ताड़ में गूँथ कर हुक्कालोली बनाते थे । बाद में दर्जी के यहाँ गेनी (कपड़े के टुकड़ो को बॉल की तरह बनाकर लोहे के ताड़ में गूँथ कर बनता है) बिकने लगा, आठ आना में देता था । दिनभर मटिया तेल चुड़ाकर उसे डूबा कर रखते थे फिर शाम में आग लगाकर खूब नचाते थे, कभी-कभी गेनी हवा में उछालकर आग से खेलने का स्टंट भी करते थे ।

शाम में फिर खड़ का ऊक बनाकर खबास भैया लाते थे और फिर हमलोग लक्ष्मी पूजा के बाद उखड़ (ओखली) पर सूप रखकर धान और दीया रखा रहता था । दीया से ऊक जलाकर ‘अन्न-धन लक्ष्मी घर आउ, दरिद्रा बाहर जाऊ’ कहते हुए आँगन से बाहर खेत तक ऊक भाँजते थे । फिर सब बैठकर प्रसाद बांटते थे । वो चीनी सिरके में भूना हुआ मखाना का स्वाद तो आज भी याद करके मुस्कुरा देता हूँ । दादीमाँ अरिपन बनाती थी । माँ तो दिन भर डिबिया बनाने और उसमें मटिया तेल भरने में व्यस्त रहती थी । सब लोग मिलकर डिबिया चारो तरफ जलाते थे ।

सुबह फिर 4 बजे ही दादीमाँ सुकराती बजाती थी । सुकराती सूप पर संठी (पटुआ का डंडा) से बजाया जाता है ।

पेट की आग और शहरी चकाचौंध घर से इतना दूर ले आया है कि अब फ़ेसबुकिया दिवाली ही मनाकर काम चला रहे हैं ।

सत्य बकर

Posted by on Sep 14, 2016 in Gaam-Ghar | 1 comment

सत्य बकर

​सत्य बकर
आज भादव का तेरस है, आज के दिन गांव के लोग महादेव मंदिर में जलाभिषेक करते हैं । मैं पकरी दयाल में हूँ और यहां पिछले एक महीने से तैयारी हो रही थी । सुबह 3 बजे से 1500-2000 महिला-पुरुष-बच्चे 3 घंटे प्रतिदिन टहलते थे । पर आज सोमेश्वर महादेव को जल चढाते ही यह दृढ़-निश्चय ख़त्म हो जाएगा । कल से एक-आध लोग ही टहलते मिलेंगे ।

पूरा माहौल भक्तिमय है, सोमेश्वर महादेव स्थान अरेराज में है, यहां से 55 किलोमीटर पैदल की दूरी है । तक़रीबन 2000 लोग कल शाम में यहां दौड़ते हुए गये हैं, इन्हें डाकबम कहते हैं । इन्होंने 8 घंटे में पहुँचने का संकल्प लिया है । सभी पुरुषों का वस्त्र एक सा है, उजला गंजी, उजला पैंट और उजला गमछा । गंजी पर डाक बम, पकरी दयाल छपा हुआ है । सब एक जगह एकत्रित होकर पूजा किये, संकल्प लिए और फिर दौड़ पड़े । एक विद्यालय के आलय में इनके पूजा करने का पूरा इंतजाम किया गया था, पंडित जी माइक पर मंत्रोच्चार कर रहे थे….पृथ्वी शांतिः…ॐ शांतिः….। बड़ा खूबसूरत सजावट किया गया था, इन्हें पुरे हर्षोल्लास से विदा करने के लिए हजारों लोगों की भीड़ थी ।

चारो तरफ इलाका हर हर महादेव के जयकारों से गूंज रहा था । इनके साथ सहायक बम भी हैं, जो इन कावरियों के पीछे ऑटो से, बोलेरो-स्कार्पियो से पीछे पीछे फल, पानी इन कावरियों के लिये लेकर चल रहे हैं । कुछ युवा भक्त फटफटिया से बाबा से मिलने गए हैं ।

सड़क के दोनों तरफ आस -पास के गांव के बच्चे पानी, केला और सेब लेकर खड़े थे और वो भी इन डाक बमों के साथ कुछ देर तक दौड़ जाते थे, जो लोग सुखी-संपन्न हैं या व्यवसायी हैं उन लोगों ने जगह जगह पर जेनरेटर लगाकर पूरे रास्ते में रौशनी का प्रबंध कर दिए थे, साथ ही बड़े बड़े बुफर लगे साउंड बॉक्सों से बोलबम के गानों से माहौल भक्तिमय था । मैं भी इस अनोखे सामाजिक प्रेम और सौहाद्र का प्रमाण बनने बाइक से कुछ देर तक पीछे पीछे गया । सब जगह वही प्रेम, सम्मान और सहयोग की भावना दिखी । बाज़ार आज बंद है, सभी इस सेवा धर्म में व्यस्त हैं । अख़बार से पता चला है कि 25 अस्थायी स्वास्थ्य केंद्र भी पुरे रास्ते में बनाया हुआ है । अनुमान है कि आज सोमेश्वर महादेव को 1.5 लाख लीटर जल चढ़ाया गया होगा ।

धर्म मात्र के नाम पर यह नज़ारा कमोवेश बिहार में हर गांव-शहर में देखने को मिलता है।

हमारा राजधानी तो इसमें बहुत आगे है ।

आपने सुना होगा पटना सफाई के मामले में बड़ा गंदा शहर है । गली, नुक्कड़, चौक, चौराहा हर जगह कचड़े का अंबार मिलेगा…नगर-निगम वाले उठा कर ले जाते है और आधे-एक घंटे में फिर से ढेर लग जाता है । कई घर पटना में कचड़ों के ढेर पर बने हैं । गांव में सड़क किनारे जैसे गैरमजरूआ या खाली जमींन पर लोग कठघरा बिठा कर पान दुकान लगा लेते हैं ऐसे ही पटना में खाली प्लॉट को कचड़ा-गाह बना देते हैं । गल्ली-मोहल्लों या सड़क किनारे गरी लाइटें तो शायद ही कहीं कोई जलती है तो लोग अँधेरे का फायदा उठाकर रोड पर भी कचड़ा फेंक देते हैं, कभी घूमते वक़्त आपके सर पर किसी बिल्डिंग से पानी, कचड़ा या पान की पीक गिरे तो आश्चर्य नहीं किजियेगा । आपको पटना घूमना हो तो कभी छठ में आइए । दिवाली के अगले दिन से यहां के लोग जिम्मेदार हो जाते हैं, हर जगह साफ़-सफाई होता है और यह कोई सरकारी कर्मचारी ही नहीं करता, यहां के लोग मिलकर करते हैं । पूरा शहर खूबसूरत सजावटों के संग प्रकाशमान रहता है । छठ के दो दिन पूर्व से छठ दिन तक मतलब पुरे चार दिन आप पटना में कहीं भी जमींन पर बैठकर खाना खा सकते हैं, आपको घिन्न नहीं आएगी ।

अब आप बताओ जो मनुष्य धर्म के नाम पर 7 दिन में पूरा शहर सुन्दर बना देता है वो अगर चाहे तो क्या 365 दिन एक शहर खूबसूरत नहीं लग सकता ?? जो लोग एक दिन 55 किलोमीटर चलकर शिव-दर्शन के लिए पूरे एक महीने 3 घंटे सुबह सुबह ताज़ी हवा में टहल सकता है क्या वो 365 दिन नहीं टहल सकता ? क्या होगा अगर ऐसा हुआ तो? मधुमेह, रक्तचाप, मलेरिया जैसी कोई बीमारी किसी को होगी?

पर किसी को इतनी फुरसत कहाँ, ये तो ऊपरवाले की महिमा है हो जाता है ।

थोड़ा सोचिये… ये दो जगह का वाकया है, ऐसे कुछ ना कुछ हर जगह है…बाकि सब ऊपरवाले की माया है ।

शिक्षक दिवस पर एक विचार

Posted by on Sep 5, 2016 in Gaam-Ghar | 0 comments

शिक्षक दिवस पर एक विचार

​कभी-कभी जिंदगी और वक़्त के बारे में सोचता हूँ तो बड़ा ताज्जुब होता है । क्या है यह? कैसे संचालित होता है यह?

कहीं कोई मदारी तो नहीं जो डमरू बजाता है और हम नाचने लगते हैं ??

बंद पलकों में ये कल का ख्वाब क्या है, कैसा है? हकीकत का गणित तो कुछ और कहता है… सच क्या है, झूठ क्या है? अर्थ क्या है, अनर्थ क्या है? ज्ञान बस जीने का तजुर्बा है?

अपना क्या है? पराया भी कुछ है? ये मोह कैसा ? कोई निर्मोही भी है? मोक्ष क्या है? प्रायश्चित क्या है? धर्म क्यूँ है? हम धर्म से या धर्म हम से? इसे समझना ही जीवन जीना है ?

मन मेरा, ख़ुशी भी मेरी, गम भी मेरा फिर ये आह्लादित क्यों है, ये विचलित क्यों है? सत्य है अगर भगवत गीता तो मैं बदहवाश क्यों हूँ, विचलित क्यों हूँ ? हर तथ्य का एक सिद्धांत है, जीने का सिद्धान्त क्यों नहीं??

आकार एक तो फिर प्रकार क्यों अनेक? विचार क्यों अनेक? स्वभाव क्यों अनेक? ना जन्म वश में, ना मृत्यु वश में ,ना काल वश में , ना शरीर वश में, फिर भी अहंकार है ?
दिलचस्प होती है जिंदगी ।
और समय भी….

तजुर्बा का नाम देकर कितना कुछ सीखा जाती है…।

इस शिक्षक दिवस पर वक़्त और जिंदगी को समर्पित श्रद्धा ।

​ग्लोबल गप्प डायरेक्ट गाम से

Posted by on Sep 4, 2016 in Gaam-Ghar | 0 comments

​ग्लोबल गप्प डायरेक्ट गाम से

​ग्लोबल गप्प डायरेक्ट गाम से
मिथिला में बंजर जमीनों, रेलवे लाइन के किनारे, नदी के मुहाने एक प्रकार का घास बहुतायत मिलता है जिसे सिक्की घास कहते हैं।सिक्की घास से मिथिला में नाना प्रकार के घरेलू सामान और सजावट के सामान बनाये जाते थे । हालांकि व्यावसायिक पहचान के अभाव में अब यह कला दम तोड़ रही है । ना कलाकारों को पहचान मिलती है ना ही कला का सही मूल्य मिलता है । ऐसे में आज चौठ-चंद्र के अवसर पर इस सिक्की कला के एक बेहतरीन नमूने ‘डलिया’ में चंद्रमा की पूजा का प्रसाद मिला तो काफी प्रसन्नता हुई । बातचीत के क्रम में बहुत सारे कलाकारों के बारे में पता चला । मैं इनकी कलाओं को जालवृत पर बाज़ार देना चाहता हूँ । ईच्छुक उद्यमी संपर्क कर सकते हैं ।

ग्लोबल शेपर्स कम्युनिटी के क्यूरेटर्स के वार्षिक बैठक

Posted by on Aug 22, 2016 in Yatra | 1 comment

ग्लोबल शेपर्स कम्युनिटी के क्यूरेटर्स के वार्षिक बैठक

यूरोप ख़ूबसूरत है और यूरोपियन और भी ज्यादा | मेरे इस तजुर्बे का पहला पडाव था जिनेवा | पटना से दिल्ली, दिल्ली से जेद्दा और जेद्दा से जिनेवा | अवसर था वर्ल्ड इकनोमिक फोरम के ग्लोबल शेपर्स कम्युनिटी के क्यूरेटर्स के वार्षिक बैठक का | कई सवाल थे, झिझक थी, अनजानेपन का डर था, मैं गाँव का छोड़ा और यह युरोप का शहर, घंटों अंग्रेजी बतियाने वाले लोग…. | जब हवाईअड्डे से कदम निकाला तो भीड़ में मैं ही सिर्फ अकेला था | कई भाषाओं में लोग बतिया रहे थे और मैं हिंदी को तरस रहा था | होटल जाने के लिए १० नंबर की बस मिलेगी बस इतनी ही सूचना मैं पिछले एक घंटे में जमा कर पाया था | टिकट काटने के लिए एक मशीन थी और उसमे भाषा फ्रेन्च या शायद जर्मन | यहाँ स्विट्ज़रलैंड में बहुत सी भाषाएं है….जिनेवा के तरफ फ्रेन्च का प्रचलन है तो ज्यूरिक के तरफ जर्मन | कुछ देर काफी परेशान रहा, कोई मदद करनेवाला दिख नहीं रहा था, अंदाजे से ३ यूरो का एक जिनेवा का टिकट लिया | मशीन में टिकट काटना मेरे लिए यूरोप जितने जैसा था | उपर बस स्टॉप पर पहुँचा तो ५ शेपर्स और खड़े थे, हम फेसबुक पर तो सबसे जुड़े थे पर ना तो कभी किसी से मिले थे ना किसी की फेसबुक वाली शक्ल याद थी |

“शेपर्स…”

एक ने पूछा, परिचय हुआ और अचानक से जैसे लगा कि अपना परिवार मिल गया | पूरी दुनियाँ में हमारा अपना एक समाज है, अपना एक समुदाय है जो एक बेहतर ब्रह्मांड के निर्माण को समर्पित हैं, हम इन्हें ग्लोबल शेपर्स कम्युनिटी कहते हैं | बिहार के हमारे पटना हब में भी बहुत से शेपर्स हैं | प्रत्येक वर्ष हब में नये नेत्रित्वकर्ता का चुनाव होता है और फिर अगस्त महीने में पूरी दुनियाँ के इन नेत्रित्वकर्ताओं को वर्ल्ड इकनोमिक फोरम जिनेवा में ४ दिन के बुलाकर प्रशिक्षित करती है |

१० नंबर की बस आयी और हम ६ बस में चढ़ गये, होटल पहुँचते ही हम ६ से ६० हो गये और फिर कब कितने सैकड़ा पार कर गये पता ही नहीं चला | पहला दिन हमारा कार्यक्रम वर्ल्ड ट्रेड आर्गेनाइजेशन में था, वर्ल्ड इकॉनोमिक फोरम के संस्थापक प्रोफ़ेसर स्वाब को सुनने का सौभाग्य मिला | मनोबल बढ़ा | हमें ५-५ के समूहों में बाँट दिया गया, अब ये पांच मेरे अपने परिवार थे जिनके साथ मुझे अगले ४ दिन रहना था | शाम को बस पुनः होटल पहुँचा दिया | कमरे में गर्मी लग रही थी, यहाँ की घरों में पंखे नही होते हैं, खिड़की खोलना भी मना था | काफी थका हुआ था, आते ही बेसुध हो गया, सुबह रूम में एक और साथी को देखा, परिचय हुआ, वो बंगलादेश से आये थे, हम दोनों शेपर्स को एक ही कमरा मिला था |

बाथरूम घुसते ही झटका लगा, सिर्फ कागज़….. ! हालाँकि ये पहला ऐसा तजुर्बा नही था, हिंदुस्तान में भी अब इसका नक़ल होटल वाले करते हैं, पिछले साल दिल्ली के एक फाइव स्टार होटल में एक कार्यक्रम में गया था तो वहां पहली बार देखा पानी नही है शौच के लिए | खूब गाली दिया होटल वालों को, हाथ तो अच्छे से धो लिया था पर दिमाग की सफाई में एक सप्ताह लग गया, बड़ा अजब सा लग रहा था | पर अबकी बार एक हद तक दिमागी रूप से तैयार था तो ज्यादा आश्चर्य नही हुआ |

सुबह ६ बजे ही नाश्ता का समय मिला था, यहाँ समय के लोग बड़े पाबंद है | जल्दी जल्दी नहा/धोकर…| माफ़ कीजियेगा…..पोछकर-नहाकर नीचें रेस्तरां भागा | नाश्ता में ब्रेड, दूध-कॉर्नफ्लेक्स, सेब, सेब जैसा एक फ़ल, जूस, दही, अंगूर उपलब्ध था | 7 बजे बस आ गयी थी, आज वर्ल्ड इकनोमिक फोरम में कार्यक्रम रखा गया था | झील किनारे इतना ख़ूबसूरत ऑफिस मिल जाए तो शायद मैं तो काम ही नहीं कर पाऊंगा | सुबह सुबह कुछ लोग जिनेवा झील के किनारे टहल रहे थे, कुछ कुत्ते टहला रहे थे | यहाँ इंसानों से ज्यादा ख़ूबसूरत मुझे कुत्ते ही दिखे, अलग-अलग रंग-रूप-आकार-प्रकार….| झील से बड़ा फ़व्वारा उठ रहा था, पूरी दुनिया से लोग जिनेवा इस फ़व्वारे को देखने आते हैं |

वर्ल्ड इकनोमिक फोरम के गेट पर उसके नाम के तस्वीर लिया | अंदर कैंपस में पैर रखते ही एक मोहतरमा से नज़र मिली और…. और क्या….. ’वो’ हो गया…. मुस्कुराकर हेल्लो किया और बढ़ लिया | पिछले १६-१७ घंटे में १५-२० दोस्त बन गये थे तो अकेलापन जैसा कुछ नही था | कई शहरों का नाम पहली बार सुना था, तो उनकी कहानी सुनने को उत्साहित था |

हमारे मोबाइल में फोरम के एप्प में पूरा कार्यक्रम का जानकारी था, वहां भी बोर्ड लगा हुआ था, हम अपने अपने ट्राइब के पास पहुँच गये, हर ट्राइब के पास एक कार्टून का बना हुआ बक्सा था जिसपर ट्राइब का नंबर लिखा हुआ था | दिनभर हमें अलग अलग टीम-ग्रुप बना-बनाकर सामाजिक मूल्य, चुनौतियाँ, टीम/हब सञ्चालन और बदलाव के बारे कई तरह की गतिविधियों के माध्यम से बहुत कुछ सिखाया गया | हम सभी लोगों से ऐसे घुल-मिल गये थे कि सब अपने से ही लग रहे थे, हम एक दुसरे की परेशानियों को समझने और उसके समाधान पर बातें कर रहे थे | पूरा माहौल सकरात्मक बदलाव और रचनात्मकता से सम्पूर्ण था |

दोपहर के भोजन के बाद अर्थव्यवस्था के विकास और सामाजिक संयोजन पर एक वार्ता था | यहाँ का भोजन हमारे यहाँ से बहुत अलग है और खासकर शाकाहारी मनुष्यों के लिए तो यहाँ भोजन ही चुनौती है | खैर जो फल-सलाद मिला, खा लिया और फिर वार्ता शुरू हो गया | शाम तक फिर गतिविधियाँ चलती रही और नये-नये आईडिया, विश्व के आर्थिक और सामाजिक बदलाव के नये आयाम सीखते रहे |

शाम को हम फिर अपने ट्राइब में, अपने नये परिवार के ४ सदस्यों के साथ | दिनभर के कार्यकलापों की समीक्षा की गयी, और संक्षेप में उसे अपने ट्राइब-बॉक्स पर लिख दिया गया | 7 बजे शाम को होटल पहुँचे | जिनकी उर्जा अभी तक संरक्षित थी वो शहर घुमने चले गये, मैं फिर से रजाई में बेसुध हो गया | अगली सुबह फिर से वही होना था, उठा, जूस पिया और भाग लिया | शुरुवात फिर ट्राइब से हुई, कुछ गतिविधियाँ ट्राइब में हुई फिर अलग-अलग टीम में बांटकर अपनी अपनी रुचियों के हिसाब से नया समूह बना दिया गया और मंत्रणा शुरू हो गयी, सभी ने अपने अपने पक्ष रखे | दिनभर कार्यकलाप चलता रहा | आज दोपहर में एशिया का क्षेत्रीय भोजन था, बड़ा उत्साहित था कि कुछ तो देशी मिलेगा खाने को, पर बड़ी निराशा हुई, एक जूस और चार अलग-अलग तरह के सैंडविच | खैर खाली पेट गुल्लर भी मीठा लगता है | खाने के साथ ही सभी एशियाई शेपर्स को एक जगह बिठाकर एक साथ मिलकर आपसी भागीदारी और सहयोग से सामाजिक बदलाव की परियोजनाओं पर कार्य करने की सलाह दी गयी, विचारों का आदान-प्रदान हुआ, आईडिया साझा किये गये |

आज कई बार उनसे नज़रे मिली, हेल्लो भी हुआ पर कुछ बात बनी नहीं | पता नही क्यों पर सिर्फ उनसे ही मिलने में झिझक होती थी | खैर अभी तो वक़्त था | हर गतिविधि के बाद १५ मिनट का ब्रेक मिलता था | हम आपस में अपने क्षेत्र का तोहफे का आदान-प्रदान कर रहे थे | इसी बिच हम ग्रुप फोटो के लिए गार्डन में जा रहे थे, सिढी पर उनसे मुलाकात हुई | हम मुस्कुराये, बात किये…मैंने उन्हें अपने मिथिला की रंग और खुशबू से उकेरी हुई मिथिला पेंटिंग वाली लाल टीशर्ट भेँट की, और उन्होंने भी एक ख़ूबसूरत सा तोहफ़ा भेँट किया | फोटो खिचवाई और भागे ग्रुप फोटो के लिए | अब हम उनसे भी थोड़े घुल-मिल गये थे, बातें हुई | शाम को डिनर के वक़्त मैं प्रोफ़ेसर स्वाब से मिला और उन्हें मिथिला पेंटिंग भेँट किया, वो बड़े खुश हुए | डिनर में हमारे लिए कुछ खास नहीं था, दारु था तो सिर्फ वाइन और शायद बियर भी, जो मैं पीता नहीं | व्हिस्की मिला नहीं | खाने में वही फल-सलाद था, मांसाहारी लोगों के लिए भारत की राजनीति भी थी खाने के लिए | खैर इश्क़ में भूख-प्यास लगती कहाँ है | हम १० बजे होटल आये, आज थकान भी कम लग रही थी |

अगले दिन फिर सुबह-सुबह पोछकर-नहाकर बस में बैठ गया | आज का कार्यक्रम यूनाइटेड नेशन के जिनेवा हेडक्वाटर में था | युएन डायरेक्टर जेनरल को सुनने को मिला, फिर प्रोफ़ेसर स्वाब ने शेपर्स से वार्तालाप किये, कमोवेश सभी ट्राइब ने अपने पक्ष रखे, अपना एक्शन प्लान बताया | फिर दोपहर का लंच हुआ | खाने के बारे में फिर से बताने की जरुरत तो नही है | मैंने उन्हें खाने की ट्रे पकरायी, दोनों मुस्कुरा दिए | अचानक एक वेटर के मुंह से देशी आवाज़ सुनाई दी-

“सर ये यहाँ की खिचड़ी है, इसे खाइये, ये शाकाहारी है“

खिचड़ी वाकई बहुत बेकार था | खैर हमारा कार्यक्रम ख़त्म हो गया था, हम एक दुसरे से अलग हो रहे थे, आँखें बिछड़ने के गम में भरी हुई थी, दिमाग नये आईडिया से भरे पड़े थे, कदम आत्मविश्वास के बढ़ रहे थे, सब खुश थे कि अब ४०० से अधिक शहर में अपना एक घर है | और हम अब अकेले नहीं है….एक अपना पूरा परिवार है….ग्लोबल शेपर्स कम्युनिटी |

दोपहर भोजन के बाद हम घुमने निकल गये, पूरा शहर घूमा, खूब मस्ती की | शहर ने हमें अपना लिया और हमने शहर को | पुरे शहर को पैदल नाप लिया | शाम में जिनेवा एयरपोर्ट से ओल्टेन की ट्रेन लिया, ओल्टेन में मेरा ननिहाल है (मामा रहते हैं) | ट्रेन में भीड़ नहीं थी, रास्ते भर खिड़की से स्विट्ज़रलैंड को देख रहा था, अब समझ में आ रहा था कि यश चोपड़ा साहब को यह देश इतना पसंद क्यों था…!! यहाँ की सबसे अच्छी बात ये है कि बड़ा व्यवस्थित देश है, हर जगह जगह के नाम, रास्ते लिखें हुए हैं, यहाँ तक की बस स्टॉप पर बस नंबर भी लिखा हुआ है |

रास्ते भर ट्रेन दायें-बायें टेढ़ी-मेढ़ी होती रही और मैं खिड़की से सर टिकाये पिछले ४ दिनों में खोया था | कुछ देर बाद टीटी साहब आये, टिकट देखा और मोबाइल एप्प में देखकर ओल्टेन पहुँचने का टाइम बताया, मैंने भी एप्प का नाम पूछकर अपने मोबाइल में एप्प इनस्टॉल कर लिया |

बाहर का नज़ारा काफ़ी ख़ूबसूरत था, यहाँ के गाँव-घर बड़े ख़ूबसूरत होते हैं | कान में इयर फ़ोन लगा था, गाना बज रहा था- “….एक मुलाकात जरुरी है जिन्दगी के लिए…..” | एक मक्के की खेत दिखी तो मुस्कुरा दिया, जो अपना देशी कुछ दिख गया था | अपनी मिट्टी, अपना गाँव, अपना खेत याद आ गया |

सर्वाधिक किताब पढने वाले पाठकों को मिलेगा ‘पंडित श्यामंनद झा स्मृति पाठक’ सम्मान

Posted by on Jul 27, 2016 in Gaam-Ghar | 0 comments

सर्वाधिक किताब पढने वाले पाठकों को मिलेगा ‘पंडित श्यामंनद झा स्मृति पाठक’ सम्मान

सर्वाधिक किताब पढने वाले पाठकों को मिलेगा ‘पंडित श्यामंनद झा स्मृति पाठक’ सम्मान

संस्कृत में एक कहावत है – स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान सर्वत्र पूज्यते | विद्वानों की सर्वत्र पूजा होती है | हमारे यहाँ लेखकों को सबसे बड़ा विद्वान माना जाता है | और लेखक सर्वाधिक सम्मानित भी होते हैं | मिथिला एक ऐसी उपजाऊ पावन भूमि है जहाँ अनादि काल से महान लेखकों का जन्म होता रहा है | जब कोई पोथी प्रकाशित होती है तो लेखक का सामाजिक मान-सम्मान बढ़ता है, प्रकाशक को आर्थिक लाभ प्राप्त होता है, परंच पाठक को ? पाठक सदा अज्ञात रह जाता है |

वर्तमान समय और परिवेश के आधुनिकीकरण में पाठकों का समुदाय विलुप्त सा हो गया है, लोग अपने काम मात्र की जानकारी इन्टरनेट पर खोजकर जरुरत पूरा कर लेते हैं, वो शौक से फुरसत में किताबें नहीं पढ़ते, टेलीविजन देखते हैं, पार्टी करते हैं, गानें सुनते हैं | गाँव-घर का माहौल बदल गया है, बच्चे अपने स्कूल-कॉलेज के विषय-वास्तु के अतिरिक्त कोई किताब पढना पसंद नहीं करते हैं | समाज के विकृत हो रहे इस प्रवृति में सकारात्मक बदलाव लाने का एक प्रयास “पंडित श्यामानंद झा स्मृति पाठक सम्मान” के रूप में लालगंज, मधुबनी स्थित यदुनाथ सार्वजानिक पुस्तकालय द्वारा पिछले दो वर्षों से किया जा रहा है | यह सम्मान पुरे एक साल में सर्वाधिक पुस्तक पढने वाले पाठक को ईक्कीस सौ रुपया, अंगवस्त्र और प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया जाता है | यह सम्मान इस वर्ष लालगंज गाँव निवासी श्री अरविन्द झा की बेटी,  स्नातक की छात्रा सुश्री श्रुति कुमारी को दिया गया है | इस अवसर पर सुश्री श्रुति ने बताया कि वो ‘नेट’ की तैयारी कर रही हैं और गाँव में कोई किताब कि दुकान नहीं है, समुचित साधनों का अभाव है, ऐसे में पुस्तकालय उनके सपनों में नई उड़ान भर दिया है, यहाँ इन्हें किताबें तो उपलब्ध हो ही जाता है साथ ही विद्वतजनों का मार्गदर्शन भी मिलता है |

गौरतलब है कि यह सम्मान लालगंज निवासी शब्द प्रदीपकार हेमपति झा, प्रसिद्ध विकल झा के पुत्र कर्णिका, मधुवीथी, वेदना, सुधावाल्ली आदि कव्यग्रंथ के कृति रचनाकार, विभिन्न मांगलिक अवसर और गीतहारि महिलाओं के कंठ से स्वतःस्फूर्त व्यावहारिक गीतों के ‘बालकवि’, जे.वी.एम्. संस्कृत कॉलेज, मुम्बईक पूर्व प्रधानाचार्य, व्याख्यान वाचस्पति, वैयाकरण पंडित श्यामानंद झा (२७ जुलाई १९०६- ३० अगस्त १९४९ ई.) केर स्मृतिमे उनके जन्मदिन के पावन अवसर पर दिया जाता है |

इस वर्ष के कार्यक्रम का संचालन मैथिलि साहित्य के वरिष्ट समालोचक. ३० से अधिक पुस्तकों के संपादक एवं समीक्षक डॉ. रमानंद झा ‘रमण’ ने किया | कार्यक्रम की शुरुवात पंडित श्यामानंद झा के फोटो पर माल्यार्पण से शुरू हुआ, तत्पश्चात युवा गायक-संगीतकार श्री अभिशेष, मोहम्मद जमाल और आशीषचन्द्र मिश्र ने पंडित जी लिखित शिव-श्रोत का गायन प्रस्तुत किया | इस अवसर पर आस-पास के १०० से अधिक विद्वतजन उपस्थित थे | कार्यक्रम के विशिष्ट अथितियों द्वारा पंडित श्यामानंद झा के कीर्तियों पर प्रकाश डाला गया एवं साहित्य और संस्कृति के प्रचार-प्रसार एवं संरक्षण में पाठक के महत्व पर विस्तृत चर्चा की गयी | युवा कवि श्री नविन कुमार ‘आशा’ द्वारा काव्य पाठ किया गया | धन्यवाद् ज्ञापन पुस्तकालय के अध्यक्ष श्री जीवनाथ मिश्र ने किया | इस अवसर श्री किशोर नाथ झा, रामजी ठाकुर, जगदीश मिश्र, अशर्फी कामती, राजनाथ झा, दुर्गानंद झा, शिवशंकर श्रीनिवास, उदय नाथ मिश्र, नीतू कुमारी, शिवानी कुमारी आदि विद्वतजन उपस्थित थे |

 

पंडित श्यामानंद झा के बारे में अधिक जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें- और ई-पोथी मुफ्त डाउनलोड करें |

 

चंपारण के खेत-खलिहान और बीहड़ों से

Posted by on Jul 5, 2016 in Gaam-Ghar | 0 comments

चंपारण के खेत-खलिहान और बीहड़ों से

चंपारण के खेत-खलिहान और बीहड़ों से

पिछले ५ दिन से चंपारण में था, परसों पटना लौटा | पूर्वी और पश्चिमी चंपारण के अलग अलग प्रखंडों के तक़रीबन १५-२० गाँवों में किसानों से मिला | बहुत कुछ सिखने समझने को मिला |

यहाँ गाँवों की स्थिति आज भी काफ़ी बुरी है, खासकर के जो गाँव जिला मुख्यालय से दूर है | कई जगह सड़कें नहीं हैं, फूस की छत और भीत की दीवालों से बने आशियाने हैं | सामाजिक खाई बहुत गहरी है, किसी के पास १०० एकड़ जमीन है तो किसी के पास जमीन है ही नहीं | अधिकतर किसान हल-बैल से खेती करते हैं | तकनीक से कोशों दूर हैं |

एक गाँव गया था बैरिया प्रखंड में, किसानों ने बताया कि उनके गाँव में आज से ५-७ वर्ष अपने ही पंचायत के दो जातियों की आपसी लड़ाई में एक ने गंडक के बांध को काट दिया, नतीजन आज गंडक की धारा ही बदल गयी और पूरा गाँव कट कर बह गया | आये दिन मगरमच्छ देखने को मिलते हैं, परसों एक बकरी चराती महिला को जख्मी कर दिया था | गाँव के अधिकतर युवा बाहर शहर में नौकरी करते हैं | गाँव से पलायन की रफ़्तार काफ़ी अधिक है | रामगढ़वा प्रखंड में एक किसान कृष्णा राम ने बताया कि मिटटी खोदने से कुछ नहीं मिलने वाला, वहां शहर में हर महीने के आखिरी में १० हज़ार जेब में रहता है | लोगों की जुबान काफ़ी तल्ख़ हैं | महिलाओं कि स्थिति और भी बुरी है | मुसहर जाति की अधिकांश महिलाएँ मजदूर हैं जिन्हें ४०-१०० रूपये 6 घंटे की मजदूरी मिलती है, वहीं पुरुषों को २००-२५० रूपये ८ घंटे कि मजदूरी मिलती है | सामान्यतः मुसहर के अलावा बाकी लोग अपनी महिलाओं को घर से बाहर नहीं निकलने देते हैं |
कुछ अच्छी चीजें जो देखने को मिली वो ये है कि पुरे बिहार में शायद सबसे अधिक हरियाली चंपारण में है | भयानक जंगल सब हैं, कई जगह जंगलों के बीच से सड़क गुजरती है | नदी और नहर बहुत हैं | पानी का स्तर काफ़ी ठीक है, ४०-५० फुट गहराई पर पानी मिल जाता है |

मैंने उदयपुर के जंगलों को देखा, कभी इन जंगलों में दस्युओं का ठिकाना होता था | बेतिया स्टेट की गाछीयों को देखा | सरेयामन नदी देखा, जिसके दोनों तरफ जामुन के जंगल है, इस नदी की मछलियाँ बहुत स्वादिष्ट होती है | जहाँ सामान्य तालाब की मछलियों की कीमत २००/- रूपये प्रति किलो होती है वहां सरेयामन की मछलियों की कीमत २५०-३००/- रूपये प्रति किलो होती है | एक जगह सेवई का गृह उद्योग देखा | और भी बहुत कुछ देखा, आप उन्हें इन तस्वीरों में देखिये |

गाँव की बात

Posted by on Jul 3, 2016 in Gaam-Ghar | 0 comments

गाँव की बात

खलिहान से लाइव

कल चोरमा गाँव से गुजर रहा था तो महिलाओं की टोली खेत की पगडंडियों पर सर पर छोटी-छोटी टोकरी लिए गाना गाते हुए चली आ रही थी | उत्सुकता हुई, रूककर पूछा |

“माटी लेकर आ रहे हैं साहब, इस माटी से चूल्हा बनेगा और भीत को लिपेंगे….भीत समझते हैं ना ? कच्चा घर”

आज अधिकांश घर गाँव में पक्के के हो गये हैं, फिर भी समाज के कुछ तबके में अभी भी इंदिरा आवास मिलना बाकी है तो भीतघर है | पहले जब मेरा घर भी भीत का था तो उसे ऐसे ही पोखरा से चिकनी मिट्टी मंगवाकर लिपा जाता था फिर दीवाल पर पिठार (चावल को फुलाकर सिलवट पर पीसकर बनाया जाता है) और सिंदूर से फूल, देवी, स्वास्तिक आदि का चित्र बनाया जाता था, नया चूल्हा बनाया जाता था | चूल्हा भी सबके लिए अलग-अलग; भगवती पूजा के लिए अलग, विधवा या वैष्णव के लिए अलग, और बाकी लोगों के लिए अलग | बड़े-बुजुर्ग बताते हैं कि एक ज़माने में मिथिला के हर घर कि दीवारों पर पिठार, गाय का गोबर आदि से मिथिला चित्रकला में विभिन्न देवी-देवताओं, जिव-जंतु, रीति-रिवाजों के चित्र उकेरे जाते थे |

शहर के गैस चूल्हे में बने खाने का वो स्वाद कहाँ होता है जो आज भी गाँव में माटी के चूल्हे में गोयठे की आँच पर बनता है, सौंधी-सौंधी खुशबू लिए चावल-दाल-सब्जियाँ |

एक बार की बात है, गाँव में घर पर बहुत से मेहमान लोग आये थे | माछ-भात (मछली-चावल) की तैयारी चल रही थी | मिथिला में माछ, पान और मखाना का बड़ा महत्व है | मौसी सिलवट पर मसाला पिस रही थी, चूल्हे पर अधहन खौल रहा था, माँ चावल धो रही थी, गोयठा लाल हो चूका था, चेरा (जलावन की लकड़ी) जल रहा था, पूरा आँच था | माँ ने खौलते अधहन में चावल डाला और कुछ ही देर में भात बनकर तैयार था | माँ भात पसा कर मेरी थाली लगा दी | मुझे माड़-भात-नमक-आचार बहुत पसंद था, मैं अपनी थाली लेकर चौके में ही बैठ गया | दूसरा एक कारण और था कि मेरे और दादीमा के अलावा सभी लोग सर्वहारी थे, दादीमा का एकादशी था तो सिर्फ मैं एक निरीह शाकाहारी था | गरम-गरम भात से उठते भाप और सौंधी खुशबू से पूरा आलय जैसे गमक उठा था | मामा माहौल बनाने में लगे थे |

“उसना चावल और मछली, सुनते ही मुँह पनियांने लगता है…पर ये शाक-सब्जी वाले क्या जानें…”

“हाँ मामा…”

“…चुप कर…बन्दर क्या जाने अदरक का स्वाद…”

“मामा, मुझे मुर्दे खाने का कोई शौक नहीं है, ये तो चील-कौवे-गीदड़ भी खाते हैं…तड़पती हुई मछली या हलाल होते बकरी और मुर्गे को देखा है कभी…?”

मैं थोड़ा तल्ख़ बोल दिया था, सारा माहौल ख़राब कर दिया था |

“तुम कौन दूध के धुले हो… ?” मामा का जबाब पर मैं चुप था |

बचपन में मैं भी 5-6 वर्ष की उम्र तक खाता था पर गाँव में कोई बाबा आये थे, मष्तिस्क स्वच्छता अभियान चलाया था, जाते-जाते मुझे भी पवित्र करते गये |

आज वर्षो बाद बातें याद आ रही है, अब गाँव से बहुत कुछ विलुप्त सा हो गया है, सरकार भी नगर पंचायत बना-बनाकर गाँवों को शहर बना रही है | पहले शहरी बच्चे पिकनिक मनाने गाँव जाते थे पर आजकल के माँ-बाप को अपने बच्चों से अधिक प्यार है, वो उन्हें दुनियाँ से छुपाकर रखना चाहते हैं, बेटा एक चौथाई उम्र पार कर जाता है और कभी दुसरे शहर भी अकेला नहीं गया होता है | बैट-बौल में बेटे को चोट लग जाएगा तो बाबूजी घर में ही काउच पर बेटे के साथ विडियो गेम खेला करते हैं |

उम्मीद है आने वाले वर्षो में गाँव जैसा कृत्रिम गाँव जरुर बसाया जाएगा | मन में एक व्यापारिक ख्याल आया है कि एक २५-३० एकड़ में कृत्रिम गाँव बसाया जाय, टूरिस्टों को आकर्षण का केंद्र होगा | ५००-१०००/- रूपये का टिकट रख देंगे | भीत का घर रहेगा, झोपड़ी रहेगी, अन्दर से वातानुकूलित बनाकर उसे टूरिस्टों के रहने  के लिए भी बना देंगे | परियोजना पर  विचार कर  रहा हूँ | क्या आप इस परियोजना में हमसे जुड़ना चाहेंगे ? किस प्रकार से जुड़ेंगे ? फ़िलहाल मैं अपने इस गाँव संरक्षण अभियान को अल्प विराम देता हूँ | गाँव घूम रहा हूँ, तो अभी बहुत कुछ सुनाने को है | पूर्णविराम अभी बाकी है मेरे दोस्त | तब तक मुस्कुराते रहिये |