Khet-Khalihan

#BeatPlasticPollution विश्व पर्यावरण दिवस 2018

Posted by on Jun 5, 2018 in खलिहान से लाइव | 0 comments

#BeatPlasticPollution विश्व पर्यावरण दिवस 2018

आज वर्ल्ड एनवायरनमेंट डे अर्थात विश्व पर्यावरण दिवस है और इस वर्ष का थीम है, “BEAT PLASTIC POLLUTION” |

ये पर्यावरण क्या है ?

पर्यावरण एक परिस्थिति है जिससे आपका अस्तित्व है | अब सवाल ये है कि अपना अस्तित्व खुद बचाया जाय या किसी को ठेकेदार बनाएं !

पर्यावरण की आज की वर्तमान स्थिति क्या है इससे कोई अनजान नहीं हैं | पर बड़ा सवाल ये है कि सब जानकर भी लोग वास्तविकता से परे होकर कैसे शेखी बघाड़ रहे हैं ? ये जो आज ‘अधजल गगरी छलकत जाय’ को अक्षरशः चरितार्थ करते हुए मनुष्य अपने आध्यात्मिक परंपरा, संस्कृति के उपहास में अट्टहास करते हुए उछ्रिन्कलता पूर्वक भौतिकता को सम्यक आचरण बता रहा है उन्हें कौन समझाएगा ? ये कौन समझाएगा कि ये ललक ये भौतिकवादी विचारधारा टिकाऊ नहीं हैं, ये मृगतृष्णा है जिसकी कीमत अकाल मृत्यु है |

एक दशक पहले तक हमारे यहाँ पुराने कपड़े का झोला बनाया जाता था जो साक-सब्जी खरीदने के लिए व्यवहार किया जाता है | पोथी-पतरा के लिए लम्बी सी कपड़े वाली या जूट का झोला होता था | पर दिखावे या यूँ कहिये आधुनिकता की परिभाषा गढ़ने में हम बड़े तहजीब से बोलते हैं, “carry bag please !!” | और दूकानदार प्लास्टिक का एक थैला पकड़ा देता है | पिछले एक दशक में हम पलास्टिक पर ऐसे निर्भर हो चले हैं कि एक वर्ष में तक़रीबन एक ख़रब प्लास्टिक बैग घर ले आते हैं जिसको कहीं 100 साल से अधिक लग जायेंगे नस्ट होने में | तक़रीबन तेरह लाख टन प्लास्टिक हर साल नदियों-नालों-नहरों से होकर समंदर पहुँच रहा है और एक लाख से अधिक जलीय जिव के मृत्यु का कारण बन रहा है | आंकड़ों पर संदेह हो तो अपने घर के सामने बह रहे नाले पर एक नजर डालिए | कभी अपने घर के कूड़ेदान पर गौर किया है ? पूरे कचड़े का दस प्रतिशत तो पलास्टिक ही होता है |

ये जो आज हर देश में प्राकृतिक त्रासदी हो रहा है, ये बिल्कुल भी अस्वाभाविक नहीं है | ये पर्यावरण असंतुलन है |

बचपन में सुनते थे, “क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा, पञ्च रचित यह अधम शरीरा” | इन्हीं पांच तत्वों से शरीर का निर्माण होता है | पर क्या इनके संयोजन में अगर संतुलन नहीं रहेगा तो एक स्वस्थ शरीर का निर्माण हो सकेगा ? और स्वस्थ शरीर ही नहीं होगा तो स्वस्थ मस्तिष्क कैसे होगा !

हम खुद को काबिल बताने के लिए पूर्वजों को, रीति-रिवाजों को ढकोसला, अन्धविश्वास, ओल्ड फैशंड बोल देते हैं पर क्या हम सचमुच काबिल हैं ? ऐसी क्या काबिलियत हमारे तौर तरीकों में है ? हमारे पूर्वज काबिल थे, वो कहते थे पीपल लगाओ, नीम लगाओ….वृक्ष लगाओ, स्वर्ग मिलेगा | वह स्वर्ग यहीं था जो जीते जी उन्हें मिलता था | आप जो हनीमून मनाने जाते हो और कहते हो यही स्वर्ग है तो वो स्वर्ग आपके आँगन में क्यूँ नहीं है ? आपके शहर का एक कोना भी उस स्वर्ग जैसा क्यूँ नहीं है ? वैसा सुकून क्यूँ नहीं मिलता आपको ? जरा सोचिये |

एक वृक्ष को दस पुत्र से तुलना की गयी है | हमारी संस्कृति ने हमें प्रकृति का सम्मान करना सिखाया है और इस विरासत के साथ ही हस्तांतरित हुई है एक जिम्मेदारी इसके संरक्षण की, इसके संतुलन की |

पर्यावरण संरक्षण का यही उपाय मात्र है- पेड़ लगाना, पानी बचाना और प्लास्टिक को बाय बाय कहना | हमारे यहाँ पर्यावरण संरक्षण के लिए कई त्योहार मनाए जाते थे, आइये फिर से मनाते हैं जुड़-शीतल और पेड़ पौधों को देते हैं पानी, लगाते हैं पनशाला, बचाते हैं तालाब | हमें तो सिखाया गया था कि सगे-सम्बन्धियों के मौत के बाद उनकी याद में पेड़ लगाने के लिए | भोज-भात में भी पत्ते का थाली होता था और पानी पीने के लिए माटी का चुक्का | हमें सिखाया गया कि धरती माता है और हम इसके सीने में डालते हैं जहर, हमें बताया गया कि गंगा मैया है और हम इसको करते हैं गंदा….. हमलोग कर क्या रहे हैं ?

कहते हैं जब जागो तभी सवेरा | अभी देर नहीं हुई  है, थोडा सोचिये कि अपना घर बचाने में क्या योगदान दे सकते हैं |

“If you can’t reuse it, refuse it”

 

 

जलवायु परिवर्तन : समस्या एवं समाधान

Posted by on May 23, 2018 in खलिहान से लाइव | 0 comments

जलवायु परिवर्तन : समस्या एवं समाधान

#खलिहान_से_लाइव

हिमालय के नजदीक रहने के कारण बिहार सबसे अधिक जलवायु परिवर्तन से प्रभावित हो रहा है | जलवायु परिवर्तन का कोई विकल्प नहीं है, एक ही उपाय है कि हम अधिक से अधिक पेड़ लगायें, कार्बनडाईऑक्साइड और कार्बनमोनोऑक्साइड को वायुमंडल में कम से कम उत्सर्जन करें | रिन्यूएबल एनर्जी के श्रोतों का व्यव्हार करें | किसान इसमें मुख्य रोल अदा कर सकते हैं | कीटनाशकों की जगह जैविक उपादानों एवं किट रक्षकों का प्रयोग, डीजल पम्पसेट की जगह सोलर पम्पसेट का उपयोग, कृषि अपसिष्टों का जैविक कम्पोस्ट बनाकर जलवायु परिवर्तन के नियंत्रण में अपना गंभीर योगदान दे सकते हैं | चूँकि मौसम तेजी से बदल रहा है तो कम दिनों का वैरायटी सही समय पर लगाकर उपज ले सकते हैं परन्तु कोई स्थायी समाधान या विकल्प फिलहाल मेरी जानकारी में किसान के पास नहीं है | तकनीकीकरण से लागत कम कर सकते हैं और उन्नत किस्म के सहनशील बीज लगाकर तत्कालिक समाधान किया जा सकता है | जैसे अब धान में बाढ़ और सुखाड़ दोनों से सहनशील बीज का किस्म उपलब्ध है |
मौसम के पूर्वानुमान की जानकारी रखकर फसल क्षति प्रबंधन कर सकते हैं । और हमें ये सब करना ही होगा, कोई उपाय भी नहीं है । क्या पता कल सांस लेने के लिए ऑक्सीजन खरीदना पड़े !
हम हर चीज की कीमत चुकाते हैं किसी ना किसी रूप में, सिर्फ साँसों का नहीं चुकाते क्यूंकि आज तक प्रकृति ने कीमत माँगा नहीं | पर हमें चुकाना चाहिए, अगर एक साल में बस दो पेड़ लगा लें तो साँसों को सुरक्षित किया जा सकता है | मैं अपने जन्मदिन पर हर साल एक पेड़ लगाता हूँ, अब तो दोस्तों को भी जन्मदिन पर पेड़ गिफ्ट करना शुरू किया हूँ | मुझे विश्वास है कि एक दिन हर कोई ऐसा करेगा और हम अपनी धरती को डूबने से बचा लेंगे | अगर आज हम अपने कल को सुरक्षित नहीं किये तो हमारी आनेवाली पीढ़ी शायद इस खूबसूरत दुनियाँ को नहीं देख पाएगी |
2010 में काफ़ी गर्मी पड़ी थी और इसके बाद अगर आप गौर करेंगे तो २०१४ से हर साल गर्मी पिछले साल से अधिक पड़ने लगी | २०१६ सबसे गर्म वर्ष रहा | जो कभी पृथ्वी का 0.1 % क्षेत्र सबसे गर्म होता था आज 14 % हो गया है | ठंड घटने लगा है और गर्मी बढ़ने लगी है | पिछले साल जुलाई में कुवैत का तापमान 51 डिग्री सेल्सियस हो गया था, अगस्त में कई जगहों पर उडती हुई चिड़िया धूप से झुलस कर जमीं पर गिरकर मर गयी | कई जगहों पर सड़क का अलकतरा पिघलने लगा | २०१५ में २३३० लोग इंडिया में लू लगने से मर गये | 28 मई 2017 को पाकिस्तान का तुर्बत शहर का तापमान 54 डिग्री सेल्सियस हो गया | ग्लोबल वार्मिंग की वजह से बढ़ रही इस गर्मी का 93% समंदर में जाता है नतीजन समंदर गर्म हो रहा है और फिर समंदर की गर्मी सुनामी और हुरीकेंन बनकर तबाही लाता है | एक डिग्री से अगर तापमान बढ़ता है तो 7% से वास्पीकरण बढ़ जाता है नतीजन बेमौसम बेवक्त भयंकर बारिश होती है | गर्मी से ग्लेसियर पिघलता है और फिर बाढ़ | पिछले कुछ सालों से बेमौसम बरसात आम बात हो गया है | किसान मौसम की मार से परेशान है | पिछले साल मक्के में परागण के समय बेमौसम बारिश हो गयी नतीजन गेहूँ मक्का दोनों बर्बाद गया | इस साल ठंढ लंबे समय तक रह गया नतीजन जिन्होंने भी मक्के की अगेती खेती की थी परागण ढंग से नहीं हुआ और कटनी के समय अभी इतना बारिश हुआ है कि फसल में नमी बढ़ गयी है, फंगस बढ़ गया है और अब कोई ऐसा फसल खरीदने को तैयार नहीं है । खेती में कीड़े मकोड़े की समस्या बढ़ रही है, क्यूंकि गर्मी की वजह से अंडे से लार्वा जल्दी तैयार हो जाता है और अपनी जीवनवधि में अधिक संतति पैदा कर लेता है |
जलवायु परिवर्तन एक ऐसी गंभीर समस्या बनकर उभर रही है जिसके लिए अगर आज अब सचेत नहीं हुए तो शायद हम हम एक दो पीढ़ी के बाद धरती को खो देंगे |
हमने किसानों को कीटनाशकों का वायुमंडल पर प्रभाव और स्वास्थ्य पर प्रभाव के प्रति जागरूक किया है और फेरोमोन ट्रैप, पक्षी बैठका, पिला बोर्ड, conservation agriculture आदि तकनीकों के माध्यम से कीटनाशक रहित कृषि को बढ़ावा दिया है |
पूरी तरह से जैविक खेती में अभी थोडा समय लगेगा पर बिहार के किसानों में अब जागरूकता बढ़ रही है | कीटनाशकों का प्रभाव वो अपने स्वास्थ्य पर भी महसूस करने लगे हैं |
आइये साथ दीजिये धरती को बचाने में, हमने कोशिस शुरू की है, कुछ हाथ मिलने भी लगा है । अभी हमारे साथ आये हैं अंतरराष्ट्रीय संस्था RIMES और भारत सरकार के मौसम विभाग के वैज्ञानिक और हमने शुरू किया कृषि में मौसम के पूर्वानुमान के प्रयोग से क्षति प्रबंधन पर जहानाबाद में किसानों का प्रशिक्षण । ना से थोड़ा भला, सूचना उपलब्ध होगी तो फसल सुरक्षा का प्रयास किया जा सकता है ।

#ClimateChange #ClimateAction #Agriculture #CropManagement#ClimateSmartAgriculture
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जल संरक्षण : भूजल पुनर्भरण

Posted by on May 19, 2018 in खलिहान से लाइव | 0 comments

जल संरक्षण : भूजल पुनर्भरण

#खलिहान_से_लाइव

अभी जहानाबाद गया था, जल विहीन है पूरा क्षेत्र | गर्द का गुबार उठता है हल्की सी हवा चलने भर से | परती खेत धूप में जल रहा है | ये स्थिति नवादा, जमुई जैसे कई अन्य क्षेत्रो में भी हो रहा है |

पानी की समस्या अगले १० वर्ष में सबसे बड़ी समस्या बनने वाली है | बिहार में ये समस्या प्रलयकारी रूप ले रही है | एक चौथाई क्षेत्र सूखे की चपेट में आ रहा है, कई क्षेत्रो में पानी में आर्सेनिक की समस्या भी सुनने को आया है,शोध निरंतर चल रहा है, कई क्षेत्रों में पानी में लौह की प्रचुरता देखी जा रही है, पूर्णिया-कटिहार तरफ तो उजले दांत से कपड़े तक पीले हो जा रहे हैं |

सवाल ये है कि इसका समाधान क्या है ? क्या सात निश्चय के अंतर्गत जो हर घर जल योजना के तहत टोंटी लगा दिया गया है मात्र उससे पानी की बर्बादी कम हो जाएगा ??

शायद समाधान ये है कि जल संरक्षण किया जाय, भूजल पुनर्भरण किया जाय | हमारे बिहार में तकनीक की सुलभता उतनी नहीं है ना ही उतना जागरूकता है | एक-आध फीसदी किसानों को छोड़कर बाकी सभी बाढ़ सिंचाई (flood irrigation) ही करते हैं और अक्सर फसल को उतना पानी का जरुरत नहीं होता है और पानी बर्बाद चला जाता है | जरुरत ड्रिप,स्प्रिंकलर, रेन गन जैसे तकनीक का है, इससे तकरीबन 30-40% पानी का खपत कम किया जा सकता है |
हर कोई अपने आलय में अगर एक सोख्ता बना लें या कोई पुराना कुआँ हो तो उसका भी उपयोग किया जा सकता है और छत या आँगन से निकलने वाले बर्षा जल को पाइप या नाले के सहारे उस सोख्ता में जमा करने लगें तो शायद इस तरह काफी मात्रा में बर्षा जल से भूजल संभरण किया जा सकता है ।
तालाबों का प्रचलन तो खत्म ही हो रहा है, लोग धड़ल्ले से तालाबों, गड्ढों को भरकर उसपर मकान बना रहे हैं या जो कुछ तालाब है भी अधिकांशतः अतिक्रमित है । नहरों और तालाबों का जल संरक्षण में बड़ा योगदान होता है । कई सूखाग्रस्त क्षेत्रों में तालाब के बीच 2-3 गहरा गढ्ढा खोद कर रख दिया जाता है जिसका मुख्य उद्देश्य भूजल संभरण ही होता है ।
मेरा घर बाढ़ग्रस्त क्षेत्र में है, प्रत्येक साल बाढ़ आता है और लाखों क्यूसेक पानी बेकार जाता है ।

आप लोगों के पास कुछ आईडिया है तो बताइये, इस पानी की समस्या का कुछ किया जाय ।

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का करें सर, पैसा तो है नही…..चक्की बेच दें ?

Posted by on May 12, 2018 in खलिहान से लाइव | 0 comments

का करें सर, पैसा तो है नही…..चक्की बेच दें ?

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भरत आज भरथा से भरत भाई हो गए हैं । आज आप इनके गांव जाओ और किसी को पूछो कि भरत जी का घर कहाँ है तो लोग आपको इनके घर तक पहुँचा देंगे, पर चलते-चलते जरूर पूछ देंगे कि कोनों कंपनी से आये हैं का? बहुते कंपनी वाला सब उनके पास आते रहता है ।
पूर्वी चंपारण के पकड़ी दयाल प्रखंड में एक गाम है सिरहा | यही भरत का गाम है, यहीं से भरत अपनी जिन्दगी की शुरुवात किये हैं | भरत की उम्र अभी कुछ 26 बरस हुई है, पर जिन्दगी को बहुत करीब से समझने लगे हैं | तंगी अक्सर चड्डी सँभालने से पहले घर संभालना सिखा देती है | ऐसा ही कुछ भरत के साथ भी हुआ | गाँव से ही किसी तरह बारहवीं का इम्तहान दिए और रिजल्ट आने से पहले ही नौकरी की तलाश में हजारों मजदूरों की तरह ट्रेन में लटक लिए | पहुँच गये आंध्रप्रदेश | आकीबाडू नाम के एक जगह पर एक मछली फार्म में सुपरवाइजर का काम मिला, पर रास नही आया | माँ-बाबूजी, गाम-घर, खेत-खलिहान सब सपने में आने लगा और अभी 6 महीना भी नहीं हुआ था कि एक दिन सबको हाय-बाय करके जनरल बोगी में चढ़ लिए और पहुँच गये अपने सिरहा | जब तक पैसा था जेब में, गाम अच्छा लग रहा था और गाम वालों को भी भरत अच्छे लग रहे थे पर जल्दी ही सबकुछ बदलने लगा |
छठ पूजा के बाद हर बार गाम पहले से ज्यादा सूना हो जाता है | वापस लौटते परदेसियों की भीड़ में कई नये चेहरे स्कूल के बस्त्ते में चादर, कम्बल और कपड़े ठूसे हुए रेलवे प्लेटफ़ॉर्म पर, बस स्टॉप पर दिख जाते हैं | एक बार इस भीड़ में फिर से भरत भी था | इस बार भरत गाम को भूलने के लिए गाम से बहुत दूर तमिलनाडु जा रहा था |
भरत को तमिलनाडु में एक स्टील प्लांट में नौकरी मिल गयी थी | वहाँ खाना-रहना मिला हुआ था उपर से आठ हज़ार तनख्वाह भी मिलता था | घर पर 3 लोगों का परिवार था- पत्नी, माँ, बाबूजी | सबके लिए दो हज़ार के हिसाब से खर्चा भेज दिया करता था | अभी 7 महीने हो गये थे, आठवां शुरू था | सब अच्छा अच्छा ही लग रहा था उसे | पर नियति को कुछ और मंजूर था | एक दिन फैक्ट्री में एक दुर्घटना हो गयी और भरत के एक साथी मजदूर की मौत हो गयी | पुलिस सब मजदूरों को उठाकर ले गयी और खूब पिटाई की | भरत थोडा डर गया था | उसे ये बेइज्जती सा लगा | और अगली सुबह भरत फिर से एक बार हाय-बाय करके जनरल बोगी में था |
इस बार रास्ते में ये तय कर लिया था कि अब बाहर नहीं जाना है, गाँव में ही कुछ करना है | वापस आकर सबसे पहले एक आटा चक्की लगाया | और बाबूजी के साथ खेती में जुट गया | दिनभर खेत में और सुबह-शाम गेहूँ पिसाई | आइडिया चल निकला | भरत काफ़ी खुश था | 2.5 एकड़ पुश्तैनी जमींन थी और कुछ एक एकड़ लीज पर भी ले लिया था | पर धीरे-धीरे परिवार बढ़ने लगा, देखते ही देखते समय के पंख लग गये, भरत 2 बेटे और 2 बेटियों के बाप बन गये थे, समस्याएँ बढ़ने लगी थी | एक बार फिर से भरत परेशांन था | खेती भी 2 साल धोखा दे गया |
इसी दौरान हमारी मुलाकात भरत से हुई | कौशल्या फाउंडेशन द्वारा Syngenta foundation के सहयोग से कृषि उद्यमी कार्यक्रम शुरू किया जा रहा था | कार्यक्रम का उद्देश्य था कि प्रत्येक पंचायत या गाम में एक कृषि उद्यमी हो जो अपने गाम अपने आस-पास के किसानों को सभी कृषि सुविधाएँ यथा- खाद-बीज की उपलब्धि, मिट्टी जाँच की सुविधा, प्रसार एवं कृषि सलाह, बैंक ऋण, नई एवं उन्नत तकनीक और कृषि उत्पाद की बिक्री की सुविधा उपलब्ध करवाए | प्रारंभिक जाँच में भरत काफ़ी उर्जावान और सशक्त उम्मीदवार लगे | पूर्वी चंपारण में चार पंचायत से कुल चार लोग चुने गये थे जिनको कृषि तकनीक और कृषि उद्यमिता के प्रशिक्षण के लिए हैदराबाद भेजा जाना था | प्रशिक्षण के उपरांत इन कृषि उद्यमीयों को अपने पंचायत के किसानों के साथ कृषि व्यपार का कार्य शुरू करना था |
भरत उर्जावान तो थे ही अब थोड़े ज्ञानवान भी हो गये थे | इनके गाँव में सब्जी की खेती सर्वाधिक होती है, साथ ही मक्का और गेहूँ भी प्रचुर मात्रा में उपजाया जाता है | प्रशिक्षण से आते ही कृषि व्यापार की शुरुवात हुई सब्जी के व्यापार से | गाँव के सभी किसानों से सब्जी एकत्रित करके भरत छोटा ट्रक (पिक-अप) में भरकर मंडी निकल पड़े | मंडी की राजनीति बिल्कुल अपने देश की राजनीति जैसी होती है, नये लोगों को आसानी से जगह नहीं मिलता है | भरत के बोलचाल और पहनावा से उन्हें समझ आ गया था कि नया व्यापारी खड़ा हो रहा है | सभी व्यापारी मिल गये और भाव गिरा दिए | भरत को घाटे में सारा सब्जी बेचना पड़ा | भरत उदास तो थे पर हिम्मत नहीं हारी थी | अगले दिन फिर सुबह-सुबह दूसरी मंडी में पहुचें, यहाँ भी कल वाला ही हादसा हुआ | एक सप्ताह में भरत को 10 हज़ार का नुकसान हो चुका था | हिम्मत टूट सी गयी थी | जब भरत से मेरी बात हुई तो वो काफ़ी उदास थे, मैं ढाढस दे रहा था |
“बाज़ार में नया लोगों को जमने नहीं ना देता है…… का करें सर, पैसा तो है नही…..चक्की बेच दें ? 25 हज़ार करीब मिल जाएगा…..” अचानक से भरत पूछ बैठा था | मैं बेजुबाँ था | कुछ देर सोचकर कहा
“इस पर कल निर्णय करेंगे, पहले ये बताओ कि कितने पैसे की जरुरत है और कैसे फ़ायदा होगा….क्या करेंगे कहाँ बेचेंगे कि अबकी बार घाटा नहीं होगा….?”
अगले दिन योजना बनाया गया, विचार-विमर्श हुआ और चक्की बिक गया | भरत ने एक बैगन का खेत 45 दिन के लिए 11 हज़ार में लीज पर लिया | अभी 7 मई को उसका लीज ख़त्म हो गया | अब तक भरत कुल 19 हज़ार का बैगन उस खेत से निकाल कर बेचे हैं | गाम के किसानों को उन्नत बीज और तकनीक सिखाकर अब अच्छी उपज भी करवाने लगे हैं और अब बाज़ार में भी सब जानने लगा है | पिछले महीने मशरूम का 250 किट लगवाए थे, 50 किट खुद लगवाए और बाकी 5 किसानों को प्रेरित कर उनके यहाँ भी 50-50 किट लगा दिए | मशरूम जब निकला तो इन्हें गाम का बाज़ार ही बेहतर दिखा, गाम में मशरूम खाना शौक का चीज था, अच्छा मूल्य मिला |
अब भरत मक्के की बिक्री की तैयारी में लगे हैं | बैंक से लिंकेज की बात भी चल रही है, खाद-बीज का दुकान भी शुरू करना है | सपने बड़े है, रफ़्तार थोड़ी धीमी है पर हौसला अपने दम पर है |
खलिहान से लाइव में किसी दिन हम भरत के साथ चाय पीते हुए खेती-किसानी की बात-चीत भी सुनायेंगे | बस आपका स्नेह बना रहे |
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खलिहान से लाइव – 56 इंच सीना

Posted by on Jan 25, 2017 in Gaam-Ghar | 0 comments

खलिहान से लाइव – 56 इंच सीना

खेती-किसानी सुनते-बतियाते हमें अक्सर सुदूर देहातों में घूमने का मौका मिलता है, कई तरह की भाषाएं सिखने को मिलती है, कई क्षेत्रीय रीति-रिवाजों को जानने-समझने का मौका मिलता है । हम अपनी मिट्टी, अपने देस को बेहद करीब से जानने लगते हैं ।
किसी किसान के यहां जब गाय दुहकर आपके लिये ‘चाह’ (चाय) बनाया जाता है, या किसी के घर आप भरी दुपहरी में पहुँचते हैं तो वो आपसे खाने के लिए पूछता नहीं है वरन बोलता है, “हाथ-पैर धो लीजिये, थाली लग गयी है ।”
बंद कमरे की आरामकुर्सी हो या कैंटीन-रेस्तरां के लज़ीज व्यंजन ऐसा सुकून इतना प्यार इतना सम्मान नहीं मिलता कहीं ।
जिंदगी जीने का असली मज़ा तो यहीं है, अपनी मिट्टी, अपने खेत और खेत की पगडंडियों पर बचपन को जीते हुए कुछ अच्छा कर गुजरना, कि जब कभी पीछे पलट के देखो एक साथ कई चेहरों पर मुस्कान दिखेगी । ऐसे होता है 56 इंच सीना ।

काशी- यात्रावृतांत

Posted by on Nov 18, 2016 in Gaam-Ghar, Yatra | 0 comments

काशी- यात्रावृतांत

अभी काशी से विदा भी नहीं हुआ था कि कूची मष्तिष्क के अंतरपटल पर हर्ष की स्याही से क्षणों को दकीचे जा रहा था । पेट से माथे तक बबंडर उठा हुआ था । लेखक मन व्याकुल था, बार-बार कोशिस करता था और शब्द अव्यवस्थित हो रहे थे । मैं हर क्षण को शब्दों की चादर में छुपाकर आप तक सहेजकर कर लाना चाहता था ।
हम रात के आखिरी पहर में काशी पहुंचे थे । मुगलसराय से जो ऑटो (टेम्पो) रिजर्व था, हरिश्चन्द्र घाट पर पहुंचा । चिताएं भभक रही थी, जिस जिस्म को जिंदगी भर सवांरा था, आज राख हो रहा था, चाण्डाल बाँस के बल्ले से उसे राख करने को आतुर थे, हरिश्चन्द्रों की भीड़ लगी थी । एक कोई बेटा था, जिसकी आँखों में भावनाओं की समंदर उतर आया था, जो ज्वार बनकर आग बुझाने को व्याकुल था ।
हम नीचें गंगा के तीर पहुँचकर अंजलि में चुरुक भर गंगाजल उठाकर खुद को सिक्त किया । अभी सूरज के मुँह से रात की चादर सरकी नहीं थी, कुछ देर वहीं बैठा फिर सभी मित्रों से विमर्श के बाद नौका विहार का आनंद उठाने का विचार किया गया । हज़ारों की संख्या में विदेशी सैलानी कुछ सैकड़ों की संख्या में नावों पर सवार थे, बड़े बड़े कैमरे ज्यामिति के सभी प्रमेयों को सिद्ध कर रहे थे । कभी सीधी रेखा पर, कभी तिरछी, कभी कोण बनाकर कैमरे में वक़्त के संग दृश्य को संजोया जा रहा था ।
और देखने को मिल रही थी हमारे हिंदुस्तान के युवाओं के हाथों घटिया मेहमानवाजी । खैर अजनबियों को हमारे संस्कार में अभिनंदन नहीं करते पर हम एक-आध ऐसे भी थे जिनपर पाश्चात्य संस्कृत का कुछ असर था, हमारी नाव के बगल से उनकी नाव गुजरी, हमने मुस्कुरा कर हाथ हिलाकर एक दूसरे का अभिनन्दन किया । आज काफ़ी दिनों बाद उगते सूरज को देख रहा था, सूरज गंगा के दूसरे छोड़ पर गंगा स्नान करके धीरे धीरे पानी की सतह से ऊपर उठ रहा था ।
दरभंगा घाट से गुजरते हुए गंगा से बड़ा अपनापन लग रहा था । इतिहास की अधिक जानकारी नहीं है, पर यहाँ लगा की महाराज दरभंगा ने भी बड़े-बड़े काम किये थे । नाव सभी छोटी-बड़ी घाटों से गुजरती हुई दश्वमेघ घाट पर हमें छोड़ किसी और को गंगा की सैर कराने निकल पड़ी ।
माननीय गार्जियन भाई नवल श्री पंकज बिना सोचविचार के स्नान को गंगा में उतर गए । बाकि हमलोग कुछ देर ठंढ और गंगाजल की स्वच्छता पर चिंतन-मनन करते रहे और फिर 28 वर्षों का पाप पखाड़ने उतर गये । जैसे ही पाप उतरा, शरीर का तापमान बढ़ गया । दो मित्र तो अभी तक पारासीटामोल की शरण में हैं । भाई की ईच्छा काशी विश्वनाथ की पूजा की भी थी परंतु हमें देव दीपावली के कारण भीड़ की उपस्थिति का अंदाज़ा था । देव को बाहर से ही नमस्कार किया । भाई लोग कुछ देर पंक्तिबद्ध रहे और फिर बीएचयू कैंपस के विश्वनाथ पर अछिन्जल समर्पण के प्रस्ताव के साथ लौट आये ।
हमारे मित्र पंकज भाई बीएचयू से आये थे, हम उनके साथ ई-रिक्सा पर काशी की गलियों से गुजरते हुए काशी हिन्दू विश्वविद्यालय परिसर में उपस्थित हुए । यहाँ विश्वनाथ जी का संपूर्ण दर्शन हुआ । मंदिर का आलय भव्य है । पता चला मालवीय जी के सपने को साकार करने में दरभंगा महाराज का भी बड़ा योगदान था ।
अब तक जठराग्नि ज्वालामुखी बन चुकी थी, पहला निर्विरोध लोकतान्त्रिक निर्णय छोले-भटूरे जलपान के निश्चय से हुआ तत्पश्चात ऊर्जा का संचार सभी पुण्यात्माओं में दिखने लगा था । दोपहर पंकज भाई के निवास में आराम किया गया ।
2 बजे हम अपने मुख्य उद्देश्य मैथिलि साहित्य और भासा के विकास को समर्पित साहित्यिक चौपाड़ि के मासिक बैसार को काशी यात्रा के आखिरी पड़ाव अस्सी घाट की तरफ़ चल पड़े । यहाँ का दृश्य बड़ा मनोरम था । घाट की सीढ़ियों पर कई सैलानी चीलम की कश ले रहे थे । काले और लाल दो तरह के वस्त्रों में जटाधारी बाबाओं का दर्शन हुआ । काले वाले शायद शाक्त थे । पूरे घाट के निरीक्षणोंपरांत हम यज्ञशाला के फर्श पर अपना कार्यक्रम शुरू किये । कार्यक्रम अद्भुत रहा । कुल 5 नये लेखकों ने अपनी रचना को पहली बार प्रस्तुति देकर मैथिलि भासा एवं साहित्य के संवर्धन की ओर अग्रसर हुए ।
कार्यक्रम के उपरांत हम उपस्थित भीड़ का आनंद लेने लगे । जितना सुना था उससे कहीं ज्यादा खूबसूरत है काशी । बालाएँ सौंदर्य की प्रतिमूर्ति थी, एक क्षण में किसी शायर की ग़ज़ल यहाँ मुक्कमल हो सकती है, कोई सिरफिरा लेखक एक रात में उपन्यास लिख सकता है । कुछ चित्रकला संकाय के बच्चे दृश्यों को चित्रों में उकेर रहे थे ।
आया तो पहले भी था एकबार पर उस वक़्त इतनी दिलचस्प नहीं लगी थी पर अबकी हम ईश्क़ में नहीं थे, इस्तीफ़ा देकर स्वच्छंद ईश्क़कार के रूप में विचरण कर रहे थे । काशी के हर मोड़ पर हम बहक से रहे थे, रूककर इश्क़ में फ़ना होने को दृढसंकल्पित थे । धरती पर कहीं कहीं स्वर्ग है तो काशी में भी है । फिजाओं में ही नशा है, चीलम की मादकता है । धमनियों में रक्त भांग हो गया था, शनैः शनैः प्रवाह में था । हम रम से गये थे ।
हज़ारों लोगों के साथ हम भी शाम को गंगा आरती के गवाह बने ।असंख्य दीप गंगा में तैर रहे थे । सबसे खास आकर्षण था अखंड दीप । एक टोकरी में दीये जलाकर उसे बाँस के एक डंडे में लटकाकर रख दिया जाता है जो पूरी रात जलता रहता है । ऐसे सैकड़ों अखंड दीप यहाँ जल रहे थे । लोगों ने बताया कि ये भारत माता के वीर सपूतों की याद में नित्य रूप से जलाया जाता है । एक बूढ़ी माँ अपने शहीद बेटे की याद में अखंड दीप जला रही थी । हमारी आँखें नम हो गयी थी ।
समय कब गुज़र गया, पता ही नहीं चला । अब हमारे वापस लौटने का वक़्त हो गया था । काशी से मुगलसराय तक सब गुमशुम से ऑटो में बैठे थे, मन-मस्तिष्क पर काशी की अमिट छाप पड़ गयी थी ।
ट्रेन का ज्यादा इंतज़ार नहीं करना पड़ा । हम पटना के लिए प्रस्थान कर रहे थे, इस उम्मीद के साथ की अब हर साल एक बार तो जरूर काशी आएंगे ।

दिवाली

Posted by on Oct 30, 2016 in Gaam-Ghar | 0 comments

दिवाली


गाम की दिवाली अब नसीब नहीं होती….और शहर की यह चाइनीज दिवाली रास नहीं आती । बस यादों में सिमट कर रह गयी है ।

दादीमाँ मिट्टी की दिवारी (दीया) बनाती थी, हम बाँस के खोपलैया को ताड़ में गूँथ कर हुक्कालोली बनाते थे । बाद में दर्जी के यहाँ गेनी (कपड़े के टुकड़ो को बॉल की तरह बनाकर लोहे के ताड़ में गूँथ कर बनता है) बिकने लगा, आठ आना में देता था । दिनभर मटिया तेल चुड़ाकर उसे डूबा कर रखते थे फिर शाम में आग लगाकर खूब नचाते थे, कभी-कभी गेनी हवा में उछालकर आग से खेलने का स्टंट भी करते थे ।

शाम में फिर खड़ का ऊक बनाकर खबास भैया लाते थे और फिर हमलोग लक्ष्मी पूजा के बाद उखड़ (ओखली) पर सूप रखकर धान और दीया रखा रहता था । दीया से ऊक जलाकर ‘अन्न-धन लक्ष्मी घर आउ, दरिद्रा बाहर जाऊ’ कहते हुए आँगन से बाहर खेत तक ऊक भाँजते थे । फिर सब बैठकर प्रसाद बांटते थे । वो चीनी सिरके में भूना हुआ मखाना का स्वाद तो आज भी याद करके मुस्कुरा देता हूँ । दादीमाँ अरिपन बनाती थी । माँ तो दिन भर डिबिया बनाने और उसमें मटिया तेल भरने में व्यस्त रहती थी । सब लोग मिलकर डिबिया चारो तरफ जलाते थे ।

सुबह फिर 4 बजे ही दादीमाँ सुकराती बजाती थी । सुकराती सूप पर संठी (पटुआ का डंडा) से बजाया जाता है ।

पेट की आग और शहरी चकाचौंध घर से इतना दूर ले आया है कि अब फ़ेसबुकिया दिवाली ही मनाकर काम चला रहे हैं ।

सत्य बकर

Posted by on Sep 14, 2016 in Gaam-Ghar | 1 comment

सत्य बकर

​सत्य बकर
आज भादव का तेरस है, आज के दिन गांव के लोग महादेव मंदिर में जलाभिषेक करते हैं । मैं पकरी दयाल में हूँ और यहां पिछले एक महीने से तैयारी हो रही थी । सुबह 3 बजे से 1500-2000 महिला-पुरुष-बच्चे 3 घंटे प्रतिदिन टहलते थे । पर आज सोमेश्वर महादेव को जल चढाते ही यह दृढ़-निश्चय ख़त्म हो जाएगा । कल से एक-आध लोग ही टहलते मिलेंगे ।

पूरा माहौल भक्तिमय है, सोमेश्वर महादेव स्थान अरेराज में है, यहां से 55 किलोमीटर पैदल की दूरी है । तक़रीबन 2000 लोग कल शाम में यहां दौड़ते हुए गये हैं, इन्हें डाकबम कहते हैं । इन्होंने 8 घंटे में पहुँचने का संकल्प लिया है । सभी पुरुषों का वस्त्र एक सा है, उजला गंजी, उजला पैंट और उजला गमछा । गंजी पर डाक बम, पकरी दयाल छपा हुआ है । सब एक जगह एकत्रित होकर पूजा किये, संकल्प लिए और फिर दौड़ पड़े । एक विद्यालय के आलय में इनके पूजा करने का पूरा इंतजाम किया गया था, पंडित जी माइक पर मंत्रोच्चार कर रहे थे….पृथ्वी शांतिः…ॐ शांतिः….। बड़ा खूबसूरत सजावट किया गया था, इन्हें पुरे हर्षोल्लास से विदा करने के लिए हजारों लोगों की भीड़ थी ।

चारो तरफ इलाका हर हर महादेव के जयकारों से गूंज रहा था । इनके साथ सहायक बम भी हैं, जो इन कावरियों के पीछे ऑटो से, बोलेरो-स्कार्पियो से पीछे पीछे फल, पानी इन कावरियों के लिये लेकर चल रहे हैं । कुछ युवा भक्त फटफटिया से बाबा से मिलने गए हैं ।

सड़क के दोनों तरफ आस -पास के गांव के बच्चे पानी, केला और सेब लेकर खड़े थे और वो भी इन डाक बमों के साथ कुछ देर तक दौड़ जाते थे, जो लोग सुखी-संपन्न हैं या व्यवसायी हैं उन लोगों ने जगह जगह पर जेनरेटर लगाकर पूरे रास्ते में रौशनी का प्रबंध कर दिए थे, साथ ही बड़े बड़े बुफर लगे साउंड बॉक्सों से बोलबम के गानों से माहौल भक्तिमय था । मैं भी इस अनोखे सामाजिक प्रेम और सौहाद्र का प्रमाण बनने बाइक से कुछ देर तक पीछे पीछे गया । सब जगह वही प्रेम, सम्मान और सहयोग की भावना दिखी । बाज़ार आज बंद है, सभी इस सेवा धर्म में व्यस्त हैं । अख़बार से पता चला है कि 25 अस्थायी स्वास्थ्य केंद्र भी पुरे रास्ते में बनाया हुआ है । अनुमान है कि आज सोमेश्वर महादेव को 1.5 लाख लीटर जल चढ़ाया गया होगा ।

धर्म मात्र के नाम पर यह नज़ारा कमोवेश बिहार में हर गांव-शहर में देखने को मिलता है।

हमारा राजधानी तो इसमें बहुत आगे है ।

आपने सुना होगा पटना सफाई के मामले में बड़ा गंदा शहर है । गली, नुक्कड़, चौक, चौराहा हर जगह कचड़े का अंबार मिलेगा…नगर-निगम वाले उठा कर ले जाते है और आधे-एक घंटे में फिर से ढेर लग जाता है । कई घर पटना में कचड़ों के ढेर पर बने हैं । गांव में सड़क किनारे जैसे गैरमजरूआ या खाली जमींन पर लोग कठघरा बिठा कर पान दुकान लगा लेते हैं ऐसे ही पटना में खाली प्लॉट को कचड़ा-गाह बना देते हैं । गल्ली-मोहल्लों या सड़क किनारे गरी लाइटें तो शायद ही कहीं कोई जलती है तो लोग अँधेरे का फायदा उठाकर रोड पर भी कचड़ा फेंक देते हैं, कभी घूमते वक़्त आपके सर पर किसी बिल्डिंग से पानी, कचड़ा या पान की पीक गिरे तो आश्चर्य नहीं किजियेगा । आपको पटना घूमना हो तो कभी छठ में आइए । दिवाली के अगले दिन से यहां के लोग जिम्मेदार हो जाते हैं, हर जगह साफ़-सफाई होता है और यह कोई सरकारी कर्मचारी ही नहीं करता, यहां के लोग मिलकर करते हैं । पूरा शहर खूबसूरत सजावटों के संग प्रकाशमान रहता है । छठ के दो दिन पूर्व से छठ दिन तक मतलब पुरे चार दिन आप पटना में कहीं भी जमींन पर बैठकर खाना खा सकते हैं, आपको घिन्न नहीं आएगी ।

अब आप बताओ जो मनुष्य धर्म के नाम पर 7 दिन में पूरा शहर सुन्दर बना देता है वो अगर चाहे तो क्या 365 दिन एक शहर खूबसूरत नहीं लग सकता ?? जो लोग एक दिन 55 किलोमीटर चलकर शिव-दर्शन के लिए पूरे एक महीने 3 घंटे सुबह सुबह ताज़ी हवा में टहल सकता है क्या वो 365 दिन नहीं टहल सकता ? क्या होगा अगर ऐसा हुआ तो? मधुमेह, रक्तचाप, मलेरिया जैसी कोई बीमारी किसी को होगी?

पर किसी को इतनी फुरसत कहाँ, ये तो ऊपरवाले की महिमा है हो जाता है ।

थोड़ा सोचिये… ये दो जगह का वाकया है, ऐसे कुछ ना कुछ हर जगह है…बाकि सब ऊपरवाले की माया है ।

शिक्षक दिवस पर एक विचार

Posted by on Sep 5, 2016 in Gaam-Ghar | 0 comments

शिक्षक दिवस पर एक विचार

​कभी-कभी जिंदगी और वक़्त के बारे में सोचता हूँ तो बड़ा ताज्जुब होता है । क्या है यह? कैसे संचालित होता है यह?

कहीं कोई मदारी तो नहीं जो डमरू बजाता है और हम नाचने लगते हैं ??

बंद पलकों में ये कल का ख्वाब क्या है, कैसा है? हकीकत का गणित तो कुछ और कहता है… सच क्या है, झूठ क्या है? अर्थ क्या है, अनर्थ क्या है? ज्ञान बस जीने का तजुर्बा है?

अपना क्या है? पराया भी कुछ है? ये मोह कैसा ? कोई निर्मोही भी है? मोक्ष क्या है? प्रायश्चित क्या है? धर्म क्यूँ है? हम धर्म से या धर्म हम से? इसे समझना ही जीवन जीना है ?

मन मेरा, ख़ुशी भी मेरी, गम भी मेरा फिर ये आह्लादित क्यों है, ये विचलित क्यों है? सत्य है अगर भगवत गीता तो मैं बदहवाश क्यों हूँ, विचलित क्यों हूँ ? हर तथ्य का एक सिद्धांत है, जीने का सिद्धान्त क्यों नहीं??

आकार एक तो फिर प्रकार क्यों अनेक? विचार क्यों अनेक? स्वभाव क्यों अनेक? ना जन्म वश में, ना मृत्यु वश में ,ना काल वश में , ना शरीर वश में, फिर भी अहंकार है ?
दिलचस्प होती है जिंदगी ।
और समय भी….

तजुर्बा का नाम देकर कितना कुछ सीखा जाती है…।

इस शिक्षक दिवस पर वक़्त और जिंदगी को समर्पित श्रद्धा ।