Khet-Khalihan

शिक्षक दिवस पर एक विचार

Posted by on Sep 5, 2016 in Gaam-Ghar | 0 comments

शिक्षक दिवस पर एक विचार

​कभी-कभी जिंदगी और वक़्त के बारे में सोचता हूँ तो बड़ा ताज्जुब होता है । क्या है यह? कैसे संचालित होता है यह?

कहीं कोई मदारी तो नहीं जो डमरू बजाता है और हम नाचने लगते हैं ??

बंद पलकों में ये कल का ख्वाब क्या है, कैसा है? हकीकत का गणित तो कुछ और कहता है… सच क्या है, झूठ क्या है? अर्थ क्या है, अनर्थ क्या है? ज्ञान बस जीने का तजुर्बा है?

अपना क्या है? पराया भी कुछ है? ये मोह कैसा ? कोई निर्मोही भी है? मोक्ष क्या है? प्रायश्चित क्या है? धर्म क्यूँ है? हम धर्म से या धर्म हम से? इसे समझना ही जीवन जीना है ?

मन मेरा, ख़ुशी भी मेरी, गम भी मेरा फिर ये आह्लादित क्यों है, ये विचलित क्यों है? सत्य है अगर भगवत गीता तो मैं बदहवाश क्यों हूँ, विचलित क्यों हूँ ? हर तथ्य का एक सिद्धांत है, जीने का सिद्धान्त क्यों नहीं??

आकार एक तो फिर प्रकार क्यों अनेक? विचार क्यों अनेक? स्वभाव क्यों अनेक? ना जन्म वश में, ना मृत्यु वश में ,ना काल वश में , ना शरीर वश में, फिर भी अहंकार है ?
दिलचस्प होती है जिंदगी ।
और समय भी….

तजुर्बा का नाम देकर कितना कुछ सीखा जाती है…।

इस शिक्षक दिवस पर वक़्त और जिंदगी को समर्पित श्रद्धा ।

​ग्लोबल गप्प डायरेक्ट गाम से

Posted by on Sep 4, 2016 in Gaam-Ghar | 0 comments

​ग्लोबल गप्प डायरेक्ट गाम से

​ग्लोबल गप्प डायरेक्ट गाम से
मिथिला में बंजर जमीनों, रेलवे लाइन के किनारे, नदी के मुहाने एक प्रकार का घास बहुतायत मिलता है जिसे सिक्की घास कहते हैं।सिक्की घास से मिथिला में नाना प्रकार के घरेलू सामान और सजावट के सामान बनाये जाते थे । हालांकि व्यावसायिक पहचान के अभाव में अब यह कला दम तोड़ रही है । ना कलाकारों को पहचान मिलती है ना ही कला का सही मूल्य मिलता है । ऐसे में आज चौठ-चंद्र के अवसर पर इस सिक्की कला के एक बेहतरीन नमूने ‘डलिया’ में चंद्रमा की पूजा का प्रसाद मिला तो काफी प्रसन्नता हुई । बातचीत के क्रम में बहुत सारे कलाकारों के बारे में पता चला । मैं इनकी कलाओं को जालवृत पर बाज़ार देना चाहता हूँ । ईच्छुक उद्यमी संपर्क कर सकते हैं ।

ग्लोबल शेपर्स कम्युनिटी के क्यूरेटर्स के वार्षिक बैठक

Posted by on Aug 22, 2016 in Yatra | 1 comment

ग्लोबल शेपर्स कम्युनिटी के क्यूरेटर्स के वार्षिक बैठक

यूरोप ख़ूबसूरत है और यूरोपियन और भी ज्यादा | मेरे इस तजुर्बे का पहला पडाव था जिनेवा | पटना से दिल्ली, दिल्ली से जेद्दा और जेद्दा से जिनेवा | अवसर था वर्ल्ड इकनोमिक फोरम के ग्लोबल शेपर्स कम्युनिटी के क्यूरेटर्स के वार्षिक बैठक का | कई सवाल थे, झिझक थी, अनजानेपन का डर था, मैं गाँव का छोड़ा और यह युरोप का शहर, घंटों अंग्रेजी बतियाने वाले लोग…. | जब हवाईअड्डे से कदम निकाला तो भीड़ में मैं ही सिर्फ अकेला था | कई भाषाओं में लोग बतिया रहे थे और मैं हिंदी को तरस रहा था | होटल जाने के लिए १० नंबर की बस मिलेगी बस इतनी ही सूचना मैं पिछले एक घंटे में जमा कर पाया था | टिकट काटने के लिए एक मशीन थी और उसमे भाषा फ्रेन्च या शायद जर्मन | यहाँ स्विट्ज़रलैंड में बहुत सी भाषाएं है….जिनेवा के तरफ फ्रेन्च का प्रचलन है तो ज्यूरिक के तरफ जर्मन | कुछ देर काफी परेशान रहा, कोई मदद करनेवाला दिख नहीं रहा था, अंदाजे से ३ यूरो का एक जिनेवा का टिकट लिया | मशीन में टिकट काटना मेरे लिए यूरोप जितने जैसा था | उपर बस स्टॉप पर पहुँचा तो ५ शेपर्स और खड़े थे, हम फेसबुक पर तो सबसे जुड़े थे पर ना तो कभी किसी से मिले थे ना किसी की फेसबुक वाली शक्ल याद थी |

“शेपर्स…”

एक ने पूछा, परिचय हुआ और अचानक से जैसे लगा कि अपना परिवार मिल गया | पूरी दुनियाँ में हमारा अपना एक समाज है, अपना एक समुदाय है जो एक बेहतर ब्रह्मांड के निर्माण को समर्पित हैं, हम इन्हें ग्लोबल शेपर्स कम्युनिटी कहते हैं | बिहार के हमारे पटना हब में भी बहुत से शेपर्स हैं | प्रत्येक वर्ष हब में नये नेत्रित्वकर्ता का चुनाव होता है और फिर अगस्त महीने में पूरी दुनियाँ के इन नेत्रित्वकर्ताओं को वर्ल्ड इकनोमिक फोरम जिनेवा में ४ दिन के बुलाकर प्रशिक्षित करती है |

१० नंबर की बस आयी और हम ६ बस में चढ़ गये, होटल पहुँचते ही हम ६ से ६० हो गये और फिर कब कितने सैकड़ा पार कर गये पता ही नहीं चला | पहला दिन हमारा कार्यक्रम वर्ल्ड ट्रेड आर्गेनाइजेशन में था, वर्ल्ड इकॉनोमिक फोरम के संस्थापक प्रोफ़ेसर स्वाब को सुनने का सौभाग्य मिला | मनोबल बढ़ा | हमें ५-५ के समूहों में बाँट दिया गया, अब ये पांच मेरे अपने परिवार थे जिनके साथ मुझे अगले ४ दिन रहना था | शाम को बस पुनः होटल पहुँचा दिया | कमरे में गर्मी लग रही थी, यहाँ की घरों में पंखे नही होते हैं, खिड़की खोलना भी मना था | काफी थका हुआ था, आते ही बेसुध हो गया, सुबह रूम में एक और साथी को देखा, परिचय हुआ, वो बंगलादेश से आये थे, हम दोनों शेपर्स को एक ही कमरा मिला था |

बाथरूम घुसते ही झटका लगा, सिर्फ कागज़….. ! हालाँकि ये पहला ऐसा तजुर्बा नही था, हिंदुस्तान में भी अब इसका नक़ल होटल वाले करते हैं, पिछले साल दिल्ली के एक फाइव स्टार होटल में एक कार्यक्रम में गया था तो वहां पहली बार देखा पानी नही है शौच के लिए | खूब गाली दिया होटल वालों को, हाथ तो अच्छे से धो लिया था पर दिमाग की सफाई में एक सप्ताह लग गया, बड़ा अजब सा लग रहा था | पर अबकी बार एक हद तक दिमागी रूप से तैयार था तो ज्यादा आश्चर्य नही हुआ |

सुबह ६ बजे ही नाश्ता का समय मिला था, यहाँ समय के लोग बड़े पाबंद है | जल्दी जल्दी नहा/धोकर…| माफ़ कीजियेगा…..पोछकर-नहाकर नीचें रेस्तरां भागा | नाश्ता में ब्रेड, दूध-कॉर्नफ्लेक्स, सेब, सेब जैसा एक फ़ल, जूस, दही, अंगूर उपलब्ध था | 7 बजे बस आ गयी थी, आज वर्ल्ड इकनोमिक फोरम में कार्यक्रम रखा गया था | झील किनारे इतना ख़ूबसूरत ऑफिस मिल जाए तो शायद मैं तो काम ही नहीं कर पाऊंगा | सुबह सुबह कुछ लोग जिनेवा झील के किनारे टहल रहे थे, कुछ कुत्ते टहला रहे थे | यहाँ इंसानों से ज्यादा ख़ूबसूरत मुझे कुत्ते ही दिखे, अलग-अलग रंग-रूप-आकार-प्रकार….| झील से बड़ा फ़व्वारा उठ रहा था, पूरी दुनिया से लोग जिनेवा इस फ़व्वारे को देखने आते हैं |

वर्ल्ड इकनोमिक फोरम के गेट पर उसके नाम के तस्वीर लिया | अंदर कैंपस में पैर रखते ही एक मोहतरमा से नज़र मिली और…. और क्या….. ’वो’ हो गया…. मुस्कुराकर हेल्लो किया और बढ़ लिया | पिछले १६-१७ घंटे में १५-२० दोस्त बन गये थे तो अकेलापन जैसा कुछ नही था | कई शहरों का नाम पहली बार सुना था, तो उनकी कहानी सुनने को उत्साहित था |

हमारे मोबाइल में फोरम के एप्प में पूरा कार्यक्रम का जानकारी था, वहां भी बोर्ड लगा हुआ था, हम अपने अपने ट्राइब के पास पहुँच गये, हर ट्राइब के पास एक कार्टून का बना हुआ बक्सा था जिसपर ट्राइब का नंबर लिखा हुआ था | दिनभर हमें अलग अलग टीम-ग्रुप बना-बनाकर सामाजिक मूल्य, चुनौतियाँ, टीम/हब सञ्चालन और बदलाव के बारे कई तरह की गतिविधियों के माध्यम से बहुत कुछ सिखाया गया | हम सभी लोगों से ऐसे घुल-मिल गये थे कि सब अपने से ही लग रहे थे, हम एक दुसरे की परेशानियों को समझने और उसके समाधान पर बातें कर रहे थे | पूरा माहौल सकरात्मक बदलाव और रचनात्मकता से सम्पूर्ण था |

दोपहर के भोजन के बाद अर्थव्यवस्था के विकास और सामाजिक संयोजन पर एक वार्ता था | यहाँ का भोजन हमारे यहाँ से बहुत अलग है और खासकर शाकाहारी मनुष्यों के लिए तो यहाँ भोजन ही चुनौती है | खैर जो फल-सलाद मिला, खा लिया और फिर वार्ता शुरू हो गया | शाम तक फिर गतिविधियाँ चलती रही और नये-नये आईडिया, विश्व के आर्थिक और सामाजिक बदलाव के नये आयाम सीखते रहे |

शाम को हम फिर अपने ट्राइब में, अपने नये परिवार के ४ सदस्यों के साथ | दिनभर के कार्यकलापों की समीक्षा की गयी, और संक्षेप में उसे अपने ट्राइब-बॉक्स पर लिख दिया गया | 7 बजे शाम को होटल पहुँचे | जिनकी उर्जा अभी तक संरक्षित थी वो शहर घुमने चले गये, मैं फिर से रजाई में बेसुध हो गया | अगली सुबह फिर से वही होना था, उठा, जूस पिया और भाग लिया | शुरुवात फिर ट्राइब से हुई, कुछ गतिविधियाँ ट्राइब में हुई फिर अलग-अलग टीम में बांटकर अपनी अपनी रुचियों के हिसाब से नया समूह बना दिया गया और मंत्रणा शुरू हो गयी, सभी ने अपने अपने पक्ष रखे | दिनभर कार्यकलाप चलता रहा | आज दोपहर में एशिया का क्षेत्रीय भोजन था, बड़ा उत्साहित था कि कुछ तो देशी मिलेगा खाने को, पर बड़ी निराशा हुई, एक जूस और चार अलग-अलग तरह के सैंडविच | खैर खाली पेट गुल्लर भी मीठा लगता है | खाने के साथ ही सभी एशियाई शेपर्स को एक जगह बिठाकर एक साथ मिलकर आपसी भागीदारी और सहयोग से सामाजिक बदलाव की परियोजनाओं पर कार्य करने की सलाह दी गयी, विचारों का आदान-प्रदान हुआ, आईडिया साझा किये गये |

आज कई बार उनसे नज़रे मिली, हेल्लो भी हुआ पर कुछ बात बनी नहीं | पता नही क्यों पर सिर्फ उनसे ही मिलने में झिझक होती थी | खैर अभी तो वक़्त था | हर गतिविधि के बाद १५ मिनट का ब्रेक मिलता था | हम आपस में अपने क्षेत्र का तोहफे का आदान-प्रदान कर रहे थे | इसी बिच हम ग्रुप फोटो के लिए गार्डन में जा रहे थे, सिढी पर उनसे मुलाकात हुई | हम मुस्कुराये, बात किये…मैंने उन्हें अपने मिथिला की रंग और खुशबू से उकेरी हुई मिथिला पेंटिंग वाली लाल टीशर्ट भेँट की, और उन्होंने भी एक ख़ूबसूरत सा तोहफ़ा भेँट किया | फोटो खिचवाई और भागे ग्रुप फोटो के लिए | अब हम उनसे भी थोड़े घुल-मिल गये थे, बातें हुई | शाम को डिनर के वक़्त मैं प्रोफ़ेसर स्वाब से मिला और उन्हें मिथिला पेंटिंग भेँट किया, वो बड़े खुश हुए | डिनर में हमारे लिए कुछ खास नहीं था, दारु था तो सिर्फ वाइन और शायद बियर भी, जो मैं पीता नहीं | व्हिस्की मिला नहीं | खाने में वही फल-सलाद था, मांसाहारी लोगों के लिए भारत की राजनीति भी थी खाने के लिए | खैर इश्क़ में भूख-प्यास लगती कहाँ है | हम १० बजे होटल आये, आज थकान भी कम लग रही थी |

अगले दिन फिर सुबह-सुबह पोछकर-नहाकर बस में बैठ गया | आज का कार्यक्रम यूनाइटेड नेशन के जिनेवा हेडक्वाटर में था | युएन डायरेक्टर जेनरल को सुनने को मिला, फिर प्रोफ़ेसर स्वाब ने शेपर्स से वार्तालाप किये, कमोवेश सभी ट्राइब ने अपने पक्ष रखे, अपना एक्शन प्लान बताया | फिर दोपहर का लंच हुआ | खाने के बारे में फिर से बताने की जरुरत तो नही है | मैंने उन्हें खाने की ट्रे पकरायी, दोनों मुस्कुरा दिए | अचानक एक वेटर के मुंह से देशी आवाज़ सुनाई दी-

“सर ये यहाँ की खिचड़ी है, इसे खाइये, ये शाकाहारी है“

खिचड़ी वाकई बहुत बेकार था | खैर हमारा कार्यक्रम ख़त्म हो गया था, हम एक दुसरे से अलग हो रहे थे, आँखें बिछड़ने के गम में भरी हुई थी, दिमाग नये आईडिया से भरे पड़े थे, कदम आत्मविश्वास के बढ़ रहे थे, सब खुश थे कि अब ४०० से अधिक शहर में अपना एक घर है | और हम अब अकेले नहीं है….एक अपना पूरा परिवार है….ग्लोबल शेपर्स कम्युनिटी |

दोपहर भोजन के बाद हम घुमने निकल गये, पूरा शहर घूमा, खूब मस्ती की | शहर ने हमें अपना लिया और हमने शहर को | पुरे शहर को पैदल नाप लिया | शाम में जिनेवा एयरपोर्ट से ओल्टेन की ट्रेन लिया, ओल्टेन में मेरा ननिहाल है (मामा रहते हैं) | ट्रेन में भीड़ नहीं थी, रास्ते भर खिड़की से स्विट्ज़रलैंड को देख रहा था, अब समझ में आ रहा था कि यश चोपड़ा साहब को यह देश इतना पसंद क्यों था…!! यहाँ की सबसे अच्छी बात ये है कि बड़ा व्यवस्थित देश है, हर जगह जगह के नाम, रास्ते लिखें हुए हैं, यहाँ तक की बस स्टॉप पर बस नंबर भी लिखा हुआ है |

रास्ते भर ट्रेन दायें-बायें टेढ़ी-मेढ़ी होती रही और मैं खिड़की से सर टिकाये पिछले ४ दिनों में खोया था | कुछ देर बाद टीटी साहब आये, टिकट देखा और मोबाइल एप्प में देखकर ओल्टेन पहुँचने का टाइम बताया, मैंने भी एप्प का नाम पूछकर अपने मोबाइल में एप्प इनस्टॉल कर लिया |

बाहर का नज़ारा काफ़ी ख़ूबसूरत था, यहाँ के गाँव-घर बड़े ख़ूबसूरत होते हैं | कान में इयर फ़ोन लगा था, गाना बज रहा था- “….एक मुलाकात जरुरी है जिन्दगी के लिए…..” | एक मक्के की खेत दिखी तो मुस्कुरा दिया, जो अपना देशी कुछ दिख गया था | अपनी मिट्टी, अपना गाँव, अपना खेत याद आ गया |

सर्वाधिक किताब पढने वाले पाठकों को मिलेगा ‘पंडित श्यामंनद झा स्मृति पाठक’ सम्मान

Posted by on Jul 27, 2016 in Gaam-Ghar | 1 comment

सर्वाधिक किताब पढने वाले पाठकों को मिलेगा ‘पंडित श्यामंनद झा स्मृति पाठक’ सम्मान

सर्वाधिक किताब पढने वाले पाठकों को मिलेगा ‘पंडित श्यामंनद झा स्मृति पाठक’ सम्मान

संस्कृत में एक कहावत है – स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान सर्वत्र पूज्यते | विद्वानों की सर्वत्र पूजा होती है | हमारे यहाँ लेखकों को सबसे बड़ा विद्वान माना जाता है | और लेखक सर्वाधिक सम्मानित भी होते हैं | मिथिला एक ऐसी उपजाऊ पावन भूमि है जहाँ अनादि काल से महान लेखकों का जन्म होता रहा है | जब कोई पोथी प्रकाशित होती है तो लेखक का सामाजिक मान-सम्मान बढ़ता है, प्रकाशक को आर्थिक लाभ प्राप्त होता है, परंच पाठक को ? पाठक सदा अज्ञात रह जाता है |

वर्तमान समय और परिवेश के आधुनिकीकरण में पाठकों का समुदाय विलुप्त सा हो गया है, लोग अपने काम मात्र की जानकारी इन्टरनेट पर खोजकर जरुरत पूरा कर लेते हैं, वो शौक से फुरसत में किताबें नहीं पढ़ते, टेलीविजन देखते हैं, पार्टी करते हैं, गानें सुनते हैं | गाँव-घर का माहौल बदल गया है, बच्चे अपने स्कूल-कॉलेज के विषय-वास्तु के अतिरिक्त कोई किताब पढना पसंद नहीं करते हैं | समाज के विकृत हो रहे इस प्रवृति में सकारात्मक बदलाव लाने का एक प्रयास “पंडित श्यामानंद झा स्मृति पाठक सम्मान” के रूप में लालगंज, मधुबनी स्थित यदुनाथ सार्वजानिक पुस्तकालय द्वारा पिछले दो वर्षों से किया जा रहा है | यह सम्मान पुरे एक साल में सर्वाधिक पुस्तक पढने वाले पाठक को ईक्कीस सौ रुपया, अंगवस्त्र और प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया जाता है | यह सम्मान इस वर्ष लालगंज गाँव निवासी श्री अरविन्द झा की बेटी,  स्नातक की छात्रा सुश्री श्रुति कुमारी को दिया गया है | इस अवसर पर सुश्री श्रुति ने बताया कि वो ‘नेट’ की तैयारी कर रही हैं और गाँव में कोई किताब कि दुकान नहीं है, समुचित साधनों का अभाव है, ऐसे में पुस्तकालय उनके सपनों में नई उड़ान भर दिया है, यहाँ इन्हें किताबें तो उपलब्ध हो ही जाता है साथ ही विद्वतजनों का मार्गदर्शन भी मिलता है |

गौरतलब है कि यह सम्मान लालगंज निवासी शब्द प्रदीपकार हेमपति झा, प्रसिद्ध विकल झा के पुत्र कर्णिका, मधुवीथी, वेदना, सुधावाल्ली आदि कव्यग्रंथ के कृति रचनाकार, विभिन्न मांगलिक अवसर और गीतहारि महिलाओं के कंठ से स्वतःस्फूर्त व्यावहारिक गीतों के ‘बालकवि’, जे.वी.एम्. संस्कृत कॉलेज, मुम्बईक पूर्व प्रधानाचार्य, व्याख्यान वाचस्पति, वैयाकरण पंडित श्यामानंद झा (२७ जुलाई १९०६- ३० अगस्त १९४९ ई.) केर स्मृतिमे उनके जन्मदिन के पावन अवसर पर दिया जाता है |

इस वर्ष के कार्यक्रम का संचालन मैथिलि साहित्य के वरिष्ट समालोचक. ३० से अधिक पुस्तकों के संपादक एवं समीक्षक डॉ. रमानंद झा ‘रमण’ ने किया | कार्यक्रम की शुरुवात पंडित श्यामानंद झा के फोटो पर माल्यार्पण से शुरू हुआ, तत्पश्चात युवा गायक-संगीतकार श्री अभिशेष, मोहम्मद जमाल और आशीषचन्द्र मिश्र ने पंडित जी लिखित शिव-श्रोत का गायन प्रस्तुत किया | इस अवसर पर आस-पास के १०० से अधिक विद्वतजन उपस्थित थे | कार्यक्रम के विशिष्ट अथितियों द्वारा पंडित श्यामानंद झा के कीर्तियों पर प्रकाश डाला गया एवं साहित्य और संस्कृति के प्रचार-प्रसार एवं संरक्षण में पाठक के महत्व पर विस्तृत चर्चा की गयी | युवा कवि श्री नविन कुमार ‘आशा’ द्वारा काव्य पाठ किया गया | धन्यवाद् ज्ञापन पुस्तकालय के अध्यक्ष श्री जीवनाथ मिश्र ने किया | इस अवसर श्री किशोर नाथ झा, रामजी ठाकुर, जगदीश मिश्र, अशर्फी कामती, राजनाथ झा, दुर्गानंद झा, शिवशंकर श्रीनिवास, उदय नाथ मिश्र, नीतू कुमारी, शिवानी कुमारी आदि विद्वतजन उपस्थित थे |

 

पंडित श्यामानंद झा के बारे में अधिक जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें- और ई-पोथी मुफ्त डाउनलोड करें |

 

चंपारण के खेत-खलिहान और बीहड़ों से

Posted by on Jul 5, 2016 in Gaam-Ghar | 0 comments

चंपारण के खेत-खलिहान और बीहड़ों से

चंपारण के खेत-खलिहान और बीहड़ों से

पिछले ५ दिन से चंपारण में था, परसों पटना लौटा | पूर्वी और पश्चिमी चंपारण के अलग अलग प्रखंडों के तक़रीबन १५-२० गाँवों में किसानों से मिला | बहुत कुछ सिखने समझने को मिला |

यहाँ गाँवों की स्थिति आज भी काफ़ी बुरी है, खासकर के जो गाँव जिला मुख्यालय से दूर है | कई जगह सड़कें नहीं हैं, फूस की छत और भीत की दीवालों से बने आशियाने हैं | सामाजिक खाई बहुत गहरी है, किसी के पास १०० एकड़ जमीन है तो किसी के पास जमीन है ही नहीं | अधिकतर किसान हल-बैल से खेती करते हैं | तकनीक से कोशों दूर हैं |

एक गाँव गया था बैरिया प्रखंड में, किसानों ने बताया कि उनके गाँव में आज से ५-७ वर्ष अपने ही पंचायत के दो जातियों की आपसी लड़ाई में एक ने गंडक के बांध को काट दिया, नतीजन आज गंडक की धारा ही बदल गयी और पूरा गाँव कट कर बह गया | आये दिन मगरमच्छ देखने को मिलते हैं, परसों एक बकरी चराती महिला को जख्मी कर दिया था | गाँव के अधिकतर युवा बाहर शहर में नौकरी करते हैं | गाँव से पलायन की रफ़्तार काफ़ी अधिक है | रामगढ़वा प्रखंड में एक किसान कृष्णा राम ने बताया कि मिटटी खोदने से कुछ नहीं मिलने वाला, वहां शहर में हर महीने के आखिरी में १० हज़ार जेब में रहता है | लोगों की जुबान काफ़ी तल्ख़ हैं | महिलाओं कि स्थिति और भी बुरी है | मुसहर जाति की अधिकांश महिलाएँ मजदूर हैं जिन्हें ४०-१०० रूपये 6 घंटे की मजदूरी मिलती है, वहीं पुरुषों को २००-२५० रूपये ८ घंटे कि मजदूरी मिलती है | सामान्यतः मुसहर के अलावा बाकी लोग अपनी महिलाओं को घर से बाहर नहीं निकलने देते हैं |
कुछ अच्छी चीजें जो देखने को मिली वो ये है कि पुरे बिहार में शायद सबसे अधिक हरियाली चंपारण में है | भयानक जंगल सब हैं, कई जगह जंगलों के बीच से सड़क गुजरती है | नदी और नहर बहुत हैं | पानी का स्तर काफ़ी ठीक है, ४०-५० फुट गहराई पर पानी मिल जाता है |

मैंने उदयपुर के जंगलों को देखा, कभी इन जंगलों में दस्युओं का ठिकाना होता था | बेतिया स्टेट की गाछीयों को देखा | सरेयामन नदी देखा, जिसके दोनों तरफ जामुन के जंगल है, इस नदी की मछलियाँ बहुत स्वादिष्ट होती है | जहाँ सामान्य तालाब की मछलियों की कीमत २००/- रूपये प्रति किलो होती है वहां सरेयामन की मछलियों की कीमत २५०-३००/- रूपये प्रति किलो होती है | एक जगह सेवई का गृह उद्योग देखा | और भी बहुत कुछ देखा, आप उन्हें इन तस्वीरों में देखिये |

गाँव की बात

Posted by on Jul 3, 2016 in Gaam-Ghar | 0 comments

गाँव की बात

खलिहान से लाइव

कल चोरमा गाँव से गुजर रहा था तो महिलाओं की टोली खेत की पगडंडियों पर सर पर छोटी-छोटी टोकरी लिए गाना गाते हुए चली आ रही थी | उत्सुकता हुई, रूककर पूछा |

“माटी लेकर आ रहे हैं साहब, इस माटी से चूल्हा बनेगा और भीत को लिपेंगे….भीत समझते हैं ना ? कच्चा घर”

आज अधिकांश घर गाँव में पक्के के हो गये हैं, फिर भी समाज के कुछ तबके में अभी भी इंदिरा आवास मिलना बाकी है तो भीतघर है | पहले जब मेरा घर भी भीत का था तो उसे ऐसे ही पोखरा से चिकनी मिट्टी मंगवाकर लिपा जाता था फिर दीवाल पर पिठार (चावल को फुलाकर सिलवट पर पीसकर बनाया जाता है) और सिंदूर से फूल, देवी, स्वास्तिक आदि का चित्र बनाया जाता था, नया चूल्हा बनाया जाता था | चूल्हा भी सबके लिए अलग-अलग; भगवती पूजा के लिए अलग, विधवा या वैष्णव के लिए अलग, और बाकी लोगों के लिए अलग | बड़े-बुजुर्ग बताते हैं कि एक ज़माने में मिथिला के हर घर कि दीवारों पर पिठार, गाय का गोबर आदि से मिथिला चित्रकला में विभिन्न देवी-देवताओं, जिव-जंतु, रीति-रिवाजों के चित्र उकेरे जाते थे |

शहर के गैस चूल्हे में बने खाने का वो स्वाद कहाँ होता है जो आज भी गाँव में माटी के चूल्हे में गोयठे की आँच पर बनता है, सौंधी-सौंधी खुशबू लिए चावल-दाल-सब्जियाँ |

एक बार की बात है, गाँव में घर पर बहुत से मेहमान लोग आये थे | माछ-भात (मछली-चावल) की तैयारी चल रही थी | मिथिला में माछ, पान और मखाना का बड़ा महत्व है | मौसी सिलवट पर मसाला पिस रही थी, चूल्हे पर अधहन खौल रहा था, माँ चावल धो रही थी, गोयठा लाल हो चूका था, चेरा (जलावन की लकड़ी) जल रहा था, पूरा आँच था | माँ ने खौलते अधहन में चावल डाला और कुछ ही देर में भात बनकर तैयार था | माँ भात पसा कर मेरी थाली लगा दी | मुझे माड़-भात-नमक-आचार बहुत पसंद था, मैं अपनी थाली लेकर चौके में ही बैठ गया | दूसरा एक कारण और था कि मेरे और दादीमा के अलावा सभी लोग सर्वहारी थे, दादीमा का एकादशी था तो सिर्फ मैं एक निरीह शाकाहारी था | गरम-गरम भात से उठते भाप और सौंधी खुशबू से पूरा आलय जैसे गमक उठा था | मामा माहौल बनाने में लगे थे |

“उसना चावल और मछली, सुनते ही मुँह पनियांने लगता है…पर ये शाक-सब्जी वाले क्या जानें…”

“हाँ मामा…”

“…चुप कर…बन्दर क्या जाने अदरक का स्वाद…”

“मामा, मुझे मुर्दे खाने का कोई शौक नहीं है, ये तो चील-कौवे-गीदड़ भी खाते हैं…तड़पती हुई मछली या हलाल होते बकरी और मुर्गे को देखा है कभी…?”

मैं थोड़ा तल्ख़ बोल दिया था, सारा माहौल ख़राब कर दिया था |

“तुम कौन दूध के धुले हो… ?” मामा का जबाब पर मैं चुप था |

बचपन में मैं भी 5-6 वर्ष की उम्र तक खाता था पर गाँव में कोई बाबा आये थे, मष्तिस्क स्वच्छता अभियान चलाया था, जाते-जाते मुझे भी पवित्र करते गये |

आज वर्षो बाद बातें याद आ रही है, अब गाँव से बहुत कुछ विलुप्त सा हो गया है, सरकार भी नगर पंचायत बना-बनाकर गाँवों को शहर बना रही है | पहले शहरी बच्चे पिकनिक मनाने गाँव जाते थे पर आजकल के माँ-बाप को अपने बच्चों से अधिक प्यार है, वो उन्हें दुनियाँ से छुपाकर रखना चाहते हैं, बेटा एक चौथाई उम्र पार कर जाता है और कभी दुसरे शहर भी अकेला नहीं गया होता है | बैट-बौल में बेटे को चोट लग जाएगा तो बाबूजी घर में ही काउच पर बेटे के साथ विडियो गेम खेला करते हैं |

उम्मीद है आने वाले वर्षो में गाँव जैसा कृत्रिम गाँव जरुर बसाया जाएगा | मन में एक व्यापारिक ख्याल आया है कि एक २५-३० एकड़ में कृत्रिम गाँव बसाया जाय, टूरिस्टों को आकर्षण का केंद्र होगा | ५००-१०००/- रूपये का टिकट रख देंगे | भीत का घर रहेगा, झोपड़ी रहेगी, अन्दर से वातानुकूलित बनाकर उसे टूरिस्टों के रहने  के लिए भी बना देंगे | परियोजना पर  विचार कर  रहा हूँ | क्या आप इस परियोजना में हमसे जुड़ना चाहेंगे ? किस प्रकार से जुड़ेंगे ? फ़िलहाल मैं अपने इस गाँव संरक्षण अभियान को अल्प विराम देता हूँ | गाँव घूम रहा हूँ, तो अभी बहुत कुछ सुनाने को है | पूर्णविराम अभी बाकी है मेरे दोस्त | तब तक मुस्कुराते रहिये |

बेतिया, पश्चिमी चंपारण

Posted by on Jun 30, 2016 in Gaam-Ghar | 1 comment

बेतिया, पश्चिमी चंपारण

खलिहान से लाइव

इस वक़्त मैं पश्चिमी चंपारण के खेत-खलिहानों में घूम रहा हूँ | पश्चिमी चंपारण में गन्ने कि खेती सर्वाधिक होती है, चीनी मिलें भी है | किसानों को इससे अच्छी आमदनी हो जाती है, हालांकि झुण्ड के झुण्ड नीलगायों के आक्रमण की वजह से किसानों को काफ़ी नुकसान होता है | गन्ने के अलावा यहाँ किसान धान और गेहूँ भी करते हैं, कुछ क्षेत्रों में मक्के की खेती प्रचुर मात्रा में होती है | तक़रीबन सभी किसान दलहन भी करते हैं, मसूर और मूंग खास कर के | दलहन कि उत्पादकता काफ़ी कम है, साथ ही जानकारी और कृषि सुविधा का बहुत अभाव है तो इनका उत्पादन बहुत छोटे स्तर पर होता है | अपनी खपत भर के लिए | अधवारा समूह की नदियाँ बहती है, मुख्य नदी गंडक है, गंडक के दोनों तरफ के क्षेत्र में मसूर और मूंग प्रचुर मात्रा में होता है | इन क्षेत्रों में बलुई-दोमट मिटटी है | अरहर अभी भी खेत की मेड़ो पर ही दिखती है | किसानों में जागरूकता का अभाव लगा | सूचना एवं तकनीक से अभी काफ़ी दूर हैं | गन्ने के अलावा किसी भी फ़सल का स्थायी बाज़ार या भण्डारण की सुविधाएं नहीं है | बाज़ार समिति रहने के कारण आम की बिक्री में अधिक परेशानी नहीं होती है |

बेतिया में जिला मुख्यालय है | काफ़ी प्रगति देखने को मिली | शहर की सड़कें अच्छी है, बस-स्टैंड, रेलवे-स्टेशन काफ़ी साफ़-सुथरा है, यहाँ गौरतलब है कि शहर के अन्दर सड़कें अच्छी है, पर मोतिहारी से बेतिया तक रास्ता दुर्गम है, गड्ढो में कहीं-कहीं बर्षों पहले बिछी अलकतरे के टुकड़े देखने को मिलती हैं, 47 किलोमीटर की दूरी तय करने में दो से ढाई घंटे लगते हैं, शुक्र है कि वातानुकूलित बसें चलती है वरना शहीद होने को एक सफ़र काफ़ी है | शहर में बड़े-बड़े ५-५ मंजिलों वाले घर भी देखने को मिलता है | कुछ ब्रांडेड कम्पनियों की बड़े बाज़ार भी देखने को मिलता है, जैसे- रिलायंस ट्रेंड, V2, V-मार्ट, विशाल मेगा मार्ट आदि | बिग बाज़ार को छोड़कर तक़रीबन सभी ब्रांड जो छोटे शहरों में होता है, है | बड़े-बड़े साफ़-सुथरे होटल सब है | होटलों की टैरिफ राजधानी जैसा है, २०००-४०००/- प्रति दिन का भी है और ५००/- प्रतिदिन का भी है | पर सुविधाएं अच्छी है, रातभर बिजली थी, बस एक फ़ोन करने पर खाने-पीने कि तमाम चीजें मेरे कमरे में पहुँच जाता था | होटल स्टाफ काफ़ी अच्छे लगे | अपने कार्यों के प्रति ईमानदार लगे | सुबह-सुबह अखबार कमरे में आ गया था, 6 बजे चाय भी आ गया | पर मुझे थोड़ा मंहगा शहर लगा |

सरकारी कार्यालयों की स्थिति काफ़ी बदतर लगी, तकनीक और सुविधाओं से दूर छोटे-छोटे मकानों में कार्यालय है |

लोग मिलनसार है, भाषा मैथिलि-भोजपुरी मिक्स है | लोगों से बातचीत में पता चला कि यहाँ का आम काफ़ी प्रसिद्ध है | यहाँ ‘जर्दा’ आम प्रचुर होता है | जर्दा १५ मई के बाद पकना शुरू होता है और काफ़ी स्वादिष्ट होता है | अभी अब ख़त्म हो गया है फिर एक किसान के पेड़ में कुछ बचा था तो चखने का मौका मिला |

पश्चिमी चंपारण कि कुछ सीमाएं नेपाल से मिलती है | सीमावर्ती क्षेत्रों में ट्राइबल लोग काफ़ी हैं, कुछ अच्छी संस्थाएं उनलोगों के सामाजिक उत्थान के लिए कार्य कर रही है | यहाँ घूमने-फिरने के लिए काफ़ी सारी जगहें हैं | जैसे बाल्मीकि नगर जहाँ गंडक के उपर डैम बना हुआ है, यहाँ रामायण वाले महर्षि वाल्मीकि का आश्रम भी है, त्रिवेणी का किनारा मनमोहक है, गज-ग्राह की लड़ाई यहीं शुरू हुई थी | कभी इधर आयें तो रामनगर में सुमेश्वर घुमने लायक है, बाघा में ५२ किला ५३ बाज़ार भी जरुर जायें | बाल्मीकि बाघ अभयारण्य का नाम तो आप सुने ही होंगे | प्रकृति की सुन्दर छटाओं का आनंद लेना हो तो पश्चिमी चंपारण जरुर आइये | बाकी जो रह गया अगली बार फिर कभी आऊंगा तो बताऊंगा | J

बचपन और बरसात

Posted by on Jun 27, 2016 in Gaam-Ghar | 0 comments

बचपन और बरसात

आज सुबह से ही मौसम काफ़ी अच्छा था, घर से ऑफिस के लिए अभी निकला ही था कि बारिश शुरू हो गयी, सामने एक मकान था तो फटफटिया खड़ा कर छज्जे के नीचें शरण लिया, काफ़ी देर तक बारिश होती रही, रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी | रास्ते पर कुछ स्कूली बच्चे छप-छप कर रहे थे, दाहिने तरफ़ गर्ल्स हॉस्टल कि छत पर लडकियां बारिश में नहा रही थी और सामने के अपार्टमेंट कि बालकनी में एक लड़की अपने दोनों तलहथियों में बारिश कि बूंदों को समेट रही थी, कुछ बूंदें उसके मासूम गुलाबी चेहरे पर मोतियों कि तरह चमक रहे थे…फुटपाथ पर कुछ बच्चे नंग-धरंग बारिश में नाच रहे थे |

मैं अपने बचपन को इन सब में देख रहा था | आह….वो कागज कि कश्ती और बारिश का पानी…..तरह-तरह के नाव बनाता था | जब बाबूजी घर पर नहीं होते थे तो अक्सर गंजी-वंजी खोल नंग-धरंग खलिहान में उछल-कूद शुरू कर देते थे, माँ चिल्लाती रहती थी….उस समय गाँव में पक्के के मकान कम थे, सामने बस एक मंदिर था जिसका छत था और छत में लगे पानी निकासी की पाइप से मोटी धार गिरती थी, थोड़ा चोट जैसा लगता था पर बहुत मज़ा आता था | घर के दो तरफ पोखड़ा था तो बर्षा होते ही कवई मछली पोखड़ा से गाछी में चढ़ आता था, खूब पकड़ते थे |

रात को माँ पैर में लहसून-तेल पकाकर लगा देती थी कि बारिश का कोई एलर्जी ना हो | दोनों भाई खाट पर लैम्प जलाकर संस्कृत का श्लोक या अंग्रेजी का वर्ड मीनिंग याद किया करते थे तो नीचें खेत में मेढ़क अपने टर्र-टर्र से शमां बांधे रहता था, मुझे तो आज भी मेढ़क के टर्र-टर्र और झींगुर के झंकार में बड़ा बढियां नींद आती है | पर शहर में अब ये शायद ही कभी नसीब होता है | रात को बाबूजी घर के सभी किवाड़ों के नीचें जूट के खाली बोरे लगा देते थे, क्यूंकि मेढ़क के पीछे-पीछे सांप घुस आता था | बरसात में गाँव में सर्पदंश कि घटनाएँ बहुत बढ़ जाती है |

एक बार सत्यनारायण पूजा (हमारे यहाँ सत्यनारायण पूजा शाम में सूरज के अस्त होने के बाद होती है, कहीं-कहीं ये दिन में भी होती है) के बाद उनको घर पहुँचाने जा रहा था, दो जिस्म थे, चिकनी मिट्टी कि कच्ची सड़क थी और कजरी जमा हुआ था | कजरी पर अँधेरे में टोर्च कि रौशनी कम थी और हम दोनों पिछड़कर गिर गये, हम सिर्फ जमीं पर गिरे नहीं थे, प्रेम में भी फिसल गये थे, अंधरे में बिजलियों कि चमक पर ना जाने कब तक हम दोनों पंक-क्रीड़ा में मशगूल रहे, उनका तो पता नही घर में गंदे कपड़ों पर क्या टिप्पणी मिली पर मैं रास्ते में तालाब में पैंट-शर्ट निकालकर धोकर पहन लिया और घर में माँ पूछी तो बोल दिया था कि बारिश में भींग गया था, ये भी बता दिया कि एक बार तो फिसल भी गया था, डर था कि चोर कि दाढ़ी में तिनका होता है, कहीं मिटटी लगा रह गया होगा तो सवाल नहीं होगा | भोली माँ कितना यकीं करती थी |

वो हवाई चप्पल की बात तो मैं भूल ही गया, कीचड़ के छींटे पूरे पैंट पर होते थे, माँ धोते-धोते विफ़र पड़ती थी फिर बाबूजी हाट पर बरसाती चप्पल खरीद देते थे |

ज्यादा बारिश होने पर दादीमा चौके कि दीवार पर कालिख से कुछ चित्र बनाती थी, और मैं जो ननिहाल में उल्टा जन्मा था तो हमसे आँगन में माटी खोदवाकर आग गरवाती थी ताकि अब इन्द्रदेव अपना भाभट समेटें |

बाढ़ आने पर पोखड़ा से मछलियाँ निकलकर कर खेतों में आ जाती थी और फिर हमलोग बांस कि बर्छी से शिकार शुरू करते थे, कोई बुलबुला उठा या कोई पौधा हिला कि बर्छी से आक्रमण शुरू हो जाता था | बड़ा रोमांचक होता था | अगर बाढ़ का पानी ज्यादा रहा तो फिर केले की थंब से खाट बांधकर नाव बनाकर खूब घूमते थे |

इस मौसम में गाँव में शाम को प्याज कि कचड़ी खूब देखने को मिलेगी, दालान पर बैठकर किसानी बात और कचड़ी के साथ… | प्याज बस महिना भर पहले ही निकला होता है तो तक़रीबन सभी किसानों के घर में जरुर रहता है |

ये मौसम धानरोपनी का होता है | पहले गाँव में जब बारिश समय पर नही होती थी तो महिलाएँ जट-जटीन का सामूहिक नृत्य करके इन्द्रदेव को खुश करती थी | पर अब तो बिहार कि लोक संस्कृति ख़त्म ही हो गयी है | लोक संस्कृति का सिर्फ सांस्कृतिक महत्व ही नहीं इसका आध्यात्मिक महत्व भी है | समाज के निर्माण का आधार होता है लोक संस्कृति और परम्परा | और जब ये संस्कृति और परंपरा ख़त्म होती है तो इसके साथ ही विलुप्त हो जाता है उस समाज का वास्तविक स्वरुप |

हमारी लोक संस्कृति, हमारी लोक-कला, काव्य एवं संगीत, मिथिला-चित्रकला, लोक-नाट्य, भोजन, सामाजिक व्यवस्था, पारिवारिक संरचना, संस्कार, अतिथि स्वागत ही हमारी पहचान थी | जो आज हम महिला शशक्तिकरण कि बात करते हैं तो मुझे लगता है उस ज़माने में महिला अधिक शशक्त थी, परिवार के संस्कार और समृद्धि का आधार थी | बांस से डाला, सूप, बियानि, फूलडाली, सिक्की से पौती, मौनी, चंगेरी, खर पर प्लास्टिक के थैले को लपेटकर बनाई गयी मौनी, लाह की लहठी, कुश कि आसनी, मोथी का पटिया, सिंदूर का किया, सांच हमारी माँ-बहनों के कलात्मकता को प्रदर्शित करता था | पमरिया नांच, विहुला-विषहरी, झिझिया, जट-जटीन आदि लोक-नृत्य समाज को मजबूती से बांधे रखता था | पर आज सब ख़त्म | गूगल पर भी उपलब्ध नहीं है |

खैर मैं थोड़ा जज्बाती हो गया | ब से बरसात कि बात कर रहे थे हम | धान रोपनी का चर्चा शुरू किये थे | कभी कादो में हल के पीछे-पीछे खेत में घुमे हैं ? पैरों में पंक का जूता, कादो कि खुशबू और बैलों के गले में बंधे घंटी कि टन-टन…क्या उत्सव का माहौल होता है | उस वक़्त शायद मैं सातवीं-आठवीं में था, हरवाहे के लिए पनपियाई लेकर जाती हुई उसकी छोटू बहु के पायल की खनक पर मेरा पोर-पोर झनझना उठता था फिर क्या खाक पढाई में मन लगेगा, मैं भी धानरोपनी देखने पहुँच जाता था | अपने कोमल हाथों से जब वो धान रोपती थी, मैं एक टक उसे निहारा करता था, सारी महिलाएँ गाना गाते हुए धानरोपनी में व्यस्त होती थी और मैं उसे लेकर शून्य में होता था | रोपनी वो करती थी पर उसके कमर के दर्द को मैं महसूस करता था, एक दिन उसके पैर में सीसा चुभ गया था, पैर कीचड़-पानी में ऐसा सूजा था कि उसे पता भी नहीं चला, मैंने उसके पैर के पास का मटमैला पानी थोड़ा लाल सा देखा तो बोला, उसकी कलमुहीं सास तो बोली की ठेंघी लग गया होगा | पर उसका पैर काफ़ी कट गया था, वो पनपियाई कि ढकनी में से लत्ता फाड़कर उसे बांध दी और फिर से रोपनी में लग गयी | मैंने देखा था उसके नाजुक पैरों को, भखडी हुई चून-सुर्खी की दीवार की तरह पैर लग रहे थे | कमोवेश हालत आज भी बिहार में वैसा ही है, बहु-बेटियां वैसी ही रोपनी करती है, आज भी तकनीक बिहार के खेतों से नदारद है, हाँ पर कागज के पन्नों में अब अच्छा-खासा दिख जाता है |

काका तो बादल देखकर ही बारिश का हाल बता देते थे, धान के लिए बिचड़ा गिराने से पहले सब काका से पूछता था | काका कहते थे कि गर्मी के कारण जलवाष्प उपर उठता है और उपर आसमान में पहुंचकर ठंढा होकर कम तापमान कि वजह से बादल बन जाता है | बादल तीन तरह का होता है-एक होता है जो गोल होता है और बहुत ऊंचाई पर होता है, ये वर्फ के कणों से बने होते हैं | एक रुई के ढेर की तरह होता है, जब इसका रंग गहरा जाता है तो वर्षा होती है और तीसरा होता है जो पूरा फैला रहता है, पुरे आकाश को घेर लेता है, यही बादल अक्सर बरसता है, यह काफ़ी नीचें होता है | जब दो बादल टकराते हैं तो आवाज़ होती है और बिजली कड़कती है |

काका हवाओं के रुख से वर्षा का अनुमान करते थे | काका को नक्षत्र और बारिश के महत्व का पूरा ज्ञान था | काका बताते थे कि स्वाति नक्षत्र में बारिश का बड़ा महत्व है, खंजन चिड़िया स्वाति कि बूंदों पर ही भर साल कि प्यास पूरी करती है, बांस में अगर स्वाति का बूंद गिरता है तो बंसलोचन बनता है, घोंघा पीता है तो मोती, आदमी के सर गिरा तो विद्वान आदमी….मैं काका को बता कर रखता था कि स्वाति नक्षत्र आये तो बता दीजिएगा…एक बार याद है मुझे, स्वाति नक्षत्र में बारिश हुई, मैं खूब भींगा, कुछ पानी पी भी लिया, रात में पेट दर्द उठा तो डर गया कि कहीं मेरे भी पेट में मोती तो नही बन गया..|

काका कहते थे अगर सूर्य पश्चिम में हो और बादल पूरब से उठे तो शीघ्र वर्षा होगी | ऐसे ही अगर शाम में इंद्रधनुष दिखाई दिया तो समझो कि सुबह बारिश होगी | चाचा काफ़ी ज्ञानी थे, कहते थे अगर चैत में पछवा चल रहा है तो भादों में अबकी वर्षा होगी, और अगर चैत में वर्षा हो गया तो खरीफ का फसल बर्बाद गया समझो | चाचा के साथ रहकर मैं भी सिख गया कि जब अंडा लेकर चींटी अपने बिल से निकलती है तो इसका मतलब है कि वर्षा होने वाला है | कल एक किताब मिला है, ‘घाघ और भड्डरी कि कहावतें’, चाचा के ज्ञान का भंडार मुझे पता चल गया है, पढ़ रहा हूँ, आगे फिर कभी सुनाऊंगा |

वैसे आज जिस तरह से मौसम बदल रहा है, वक़्त पर बारिश नही हो रही है, पानी का स्तर गिर रहा है, ऐसे में जल का संरक्षण आवश्यक हो गया है | अनावश्यक पानी की बर्बादी जैसे मुंह धोते समय नल का खुला रहना, कपड़ा धोते समय नल का खुला रखना, टंकी भर गया फिर भी मोटर बंद नही करना…हमें इन चीजों से बचना होगा | कुवां, तालाब तो अब रहा नहीं, तो जल संचय की स्थित्ति काफ़ी बिगड़ी हुई है | हालात ऐसे ही रहे तो फिर….

बाकी तो आप सब बुझबे करते हैं |

 

किसानी सरदर्दी

Posted by on May 16, 2016 in Gaam-Ghar | 0 comments

किसानी सरदर्दी
खलिहान से लाइव
आज पकड़ी दयाल में हूँ, यह पूर्वी चंपारण का एक प्रखंड है । यहाँ हमारे साथ 750 किसान जुड़े हुए हैं, और इन किसानों की अपनी कंपनी है- उदय कृषक प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड (www.ukpcl.in)। सभी मक्का, धान, गेहूँ उत्पादक हैं।
सुबह से अकौना, थरभीतिया, नवादा आदि कई गाँव घूमा, खेत-पथार देखा, किसानों से बातचीत हुई ।
 
पिछले 10 दिन से यहाँ दिन को तो काफ़ी गर्मी रहती है पर रातों को अक्सर आँधी-बारिश हो रहा है , नतीज़न मक्के की फ़सल बरबाद हो रही है और अधपके में ही काट रहे हैं । इससे किसान को बाज़ार भाव कम मिल रहा है। इस साल पहले ही नमी के कारण गेहूँ-मकई कम जमा (अंकुरण) था और फिर परागन के समय आँधी-बारिश हो गयी तो फल सही नहीं निकला और अभी जब फसल काटने का समय आया तो फिर से मौसम नाराज । इस साल गेहूँ का भी उपज अच्छा नहीं रहा । हालांकि हमारे कुछ किसान जिन्होंने हाइब्रिड लगाया था उनके गेहूँ का उपज संतोषप्रद रहा । शिवशंकर जी कर्ज में डूब गये हैं, बस इतना कहा- “अगर आज बड़कू परदेश में ना कमाता रहता तो मैं ज़हर खा लेता, अब कमर टूट गयी है बाबू इस खेती-किसानी में…’
 
मैंने किसानों को ढांढस बढ़ाया और धान की तैयारी करने को कहा, जानकारियां दी और उनकी परेशानियों के मकड़जाल को सुलझाते हुए आगे की गांव की ओर बढ़ गया । विजय जी अपनी गाछी में बारहमासा आम दिखाए, मज्जर और फल दोनों है। अच्छा है एक पेड़ तो किचन गार्डेन में भी लग जाएगा । वहीं कृष्ण भोग आम देखा तो रहा नहीं गया, ढेला से एक तोड़ा, स्वाद लिया। रास्ते में नदी पार करते वक़्त एक मल्लाह मिला, काँटा फसा रहा था तो मैंने भी क़िस्मत आजमा लिया, पर मछली का मूड नहीं था, बेइज्जत करके भेज दिया ।
 
टहलते-टहलते रात हो गयी, अभी अतिथि गृह पहुँचा हूँ, बिजली रानी गुस्से में मुँह फुलाकर बैठी है । मैं छत पर चाँद से आज की रात की टोह ले रहा हूँ, शायद आज बारिश नहीं होगी, शायद चाँद को धान के पूरे 130 दिन की ख़बर होगी।
किसानी में भी बड़ी सरदर्दी है।

बदलाव

Posted by on May 16, 2016 in Gaam-Ghar | 0 comments

बदलाव

परिवर्तन के दौर में गाँव में पौराणिक रस्मों-रिवाज और आधुनिक तौर-तरीकों का संगम सामाजिक कैनवास पर गाँव का नया चित्र उकेर रहा है।
मैं इस वक़्त पकड़ी दयाल में हूँ, शादियों का मौसम है। उस जमाने में जब शादी के लिए रसूखदारों के शहजादे रथ पर निकलते थे तो घुड़सवारों का एक जत्था आगे आगे चलता था, ढ़ोल-तासे बजते थे, इक्कों और तांगों पर बारात चलती थी ।
वक़्त बदला तो रसूख़ की सामाजिक परिभाषा बदल गयी, पहले जमींदार रसूख़ थे और अब जिसने अर्थ प्रदर्शन कर लिया, ईज्जतदार रसूख़ हो गया । अब एक नमूना देखिये ।
दूल्हे राजा किराए की रथनुमा जीप में बैठें हैं, रथ रंगीन बल्बों से जगमगा रहा है । आगे-आगे डीजे बज रहा है, “….लुधियाना से अयली बलम जी”, तालियों के कुछ जादूगर नर्तकी भेष में अर्धनग्न नृत्य कर रहे हैं, पीछे कुछ शहजादे के मित्र सीटी बजाते हुए लाल रूमाल लहरा रहे हैं। दूल्हे के मामा100 के नये नये नोट लूटा रहे हैं, गाना बदल गया है, अब “लहरिया लुट् ए राजा..” बजने लगा है, घुड़सवारों की टोली ईधर-उधर दौड़ रही है, बीच-बीच में आतिशबाजी भी हो रही है। ये जश्न इनकी रसूख़ का प्रदर्शन है।
अब इनकी सोच भी काफ़ी उन्नत है । हम मौज मना रहे हैं तो आपके बाप का क्या जाता है! मेरा पैसा, मैं कुछ भी करुँ….!!

भाई बदलाव है ये… बदलाव । और आप कहते हो यहां कुछ नहीं बदला है ?