Gaam-Ghar

बेतिया, पश्चिमी चंपारण

Posted by on Jun 30, 2016 in Gaam-Ghar | 1 comment

बेतिया, पश्चिमी चंपारण

खलिहान से लाइव

इस वक़्त मैं पश्चिमी चंपारण के खेत-खलिहानों में घूम रहा हूँ | पश्चिमी चंपारण में गन्ने कि खेती सर्वाधिक होती है, चीनी मिलें भी है | किसानों को इससे अच्छी आमदनी हो जाती है, हालांकि झुण्ड के झुण्ड नीलगायों के आक्रमण की वजह से किसानों को काफ़ी नुकसान होता है | गन्ने के अलावा यहाँ किसान धान और गेहूँ भी करते हैं, कुछ क्षेत्रों में मक्के की खेती प्रचुर मात्रा में होती है | तक़रीबन सभी किसान दलहन भी करते हैं, मसूर और मूंग खास कर के | दलहन कि उत्पादकता काफ़ी कम है, साथ ही जानकारी और कृषि सुविधा का बहुत अभाव है तो इनका उत्पादन बहुत छोटे स्तर पर होता है | अपनी खपत भर के लिए | अधवारा समूह की नदियाँ बहती है, मुख्य नदी गंडक है, गंडक के दोनों तरफ के क्षेत्र में मसूर और मूंग प्रचुर मात्रा में होता है | इन क्षेत्रों में बलुई-दोमट मिटटी है | अरहर अभी भी खेत की मेड़ो पर ही दिखती है | किसानों में जागरूकता का अभाव लगा | सूचना एवं तकनीक से अभी काफ़ी दूर हैं | गन्ने के अलावा किसी भी फ़सल का स्थायी बाज़ार या भण्डारण की सुविधाएं नहीं है | बाज़ार समिति रहने के कारण आम की बिक्री में अधिक परेशानी नहीं होती है |

बेतिया में जिला मुख्यालय है | काफ़ी प्रगति देखने को मिली | शहर की सड़कें अच्छी है, बस-स्टैंड, रेलवे-स्टेशन काफ़ी साफ़-सुथरा है, यहाँ गौरतलब है कि शहर के अन्दर सड़कें अच्छी है, पर मोतिहारी से बेतिया तक रास्ता दुर्गम है, गड्ढो में कहीं-कहीं बर्षों पहले बिछी अलकतरे के टुकड़े देखने को मिलती हैं, 47 किलोमीटर की दूरी तय करने में दो से ढाई घंटे लगते हैं, शुक्र है कि वातानुकूलित बसें चलती है वरना शहीद होने को एक सफ़र काफ़ी है | शहर में बड़े-बड़े ५-५ मंजिलों वाले घर भी देखने को मिलता है | कुछ ब्रांडेड कम्पनियों की बड़े बाज़ार भी देखने को मिलता है, जैसे- रिलायंस ट्रेंड, V2, V-मार्ट, विशाल मेगा मार्ट आदि | बिग बाज़ार को छोड़कर तक़रीबन सभी ब्रांड जो छोटे शहरों में होता है, है | बड़े-बड़े साफ़-सुथरे होटल सब है | होटलों की टैरिफ राजधानी जैसा है, २०००-४०००/- प्रति दिन का भी है और ५००/- प्रतिदिन का भी है | पर सुविधाएं अच्छी है, रातभर बिजली थी, बस एक फ़ोन करने पर खाने-पीने कि तमाम चीजें मेरे कमरे में पहुँच जाता था | होटल स्टाफ काफ़ी अच्छे लगे | अपने कार्यों के प्रति ईमानदार लगे | सुबह-सुबह अखबार कमरे में आ गया था, 6 बजे चाय भी आ गया | पर मुझे थोड़ा मंहगा शहर लगा |

सरकारी कार्यालयों की स्थिति काफ़ी बदतर लगी, तकनीक और सुविधाओं से दूर छोटे-छोटे मकानों में कार्यालय है |

लोग मिलनसार है, भाषा मैथिलि-भोजपुरी मिक्स है | लोगों से बातचीत में पता चला कि यहाँ का आम काफ़ी प्रसिद्ध है | यहाँ ‘जर्दा’ आम प्रचुर होता है | जर्दा १५ मई के बाद पकना शुरू होता है और काफ़ी स्वादिष्ट होता है | अभी अब ख़त्म हो गया है फिर एक किसान के पेड़ में कुछ बचा था तो चखने का मौका मिला |

पश्चिमी चंपारण कि कुछ सीमाएं नेपाल से मिलती है | सीमावर्ती क्षेत्रों में ट्राइबल लोग काफ़ी हैं, कुछ अच्छी संस्थाएं उनलोगों के सामाजिक उत्थान के लिए कार्य कर रही है | यहाँ घूमने-फिरने के लिए काफ़ी सारी जगहें हैं | जैसे बाल्मीकि नगर जहाँ गंडक के उपर डैम बना हुआ है, यहाँ रामायण वाले महर्षि वाल्मीकि का आश्रम भी है, त्रिवेणी का किनारा मनमोहक है, गज-ग्राह की लड़ाई यहीं शुरू हुई थी | कभी इधर आयें तो रामनगर में सुमेश्वर घुमने लायक है, बाघा में ५२ किला ५३ बाज़ार भी जरुर जायें | बाल्मीकि बाघ अभयारण्य का नाम तो आप सुने ही होंगे | प्रकृति की सुन्दर छटाओं का आनंद लेना हो तो पश्चिमी चंपारण जरुर आइये | बाकी जो रह गया अगली बार फिर कभी आऊंगा तो बताऊंगा | J

बचपन और बरसात

Posted by on Jun 27, 2016 in Gaam-Ghar | 0 comments

बचपन और बरसात

आज सुबह से ही मौसम काफ़ी अच्छा था, घर से ऑफिस के लिए अभी निकला ही था कि बारिश शुरू हो गयी, सामने एक मकान था तो फटफटिया खड़ा कर छज्जे के नीचें शरण लिया, काफ़ी देर तक बारिश होती रही, रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी | रास्ते पर कुछ स्कूली बच्चे छप-छप कर रहे थे, दाहिने तरफ़ गर्ल्स हॉस्टल कि छत पर लडकियां बारिश में नहा रही थी और सामने के अपार्टमेंट कि बालकनी में एक लड़की अपने दोनों तलहथियों में बारिश कि बूंदों को समेट रही थी, कुछ बूंदें उसके मासूम गुलाबी चेहरे पर मोतियों कि तरह चमक रहे थे…फुटपाथ पर कुछ बच्चे नंग-धरंग बारिश में नाच रहे थे |

मैं अपने बचपन को इन सब में देख रहा था | आह….वो कागज कि कश्ती और बारिश का पानी…..तरह-तरह के नाव बनाता था | जब बाबूजी घर पर नहीं होते थे तो अक्सर गंजी-वंजी खोल नंग-धरंग खलिहान में उछल-कूद शुरू कर देते थे, माँ चिल्लाती रहती थी….उस समय गाँव में पक्के के मकान कम थे, सामने बस एक मंदिर था जिसका छत था और छत में लगे पानी निकासी की पाइप से मोटी धार गिरती थी, थोड़ा चोट जैसा लगता था पर बहुत मज़ा आता था | घर के दो तरफ पोखड़ा था तो बर्षा होते ही कवई मछली पोखड़ा से गाछी में चढ़ आता था, खूब पकड़ते थे |

रात को माँ पैर में लहसून-तेल पकाकर लगा देती थी कि बारिश का कोई एलर्जी ना हो | दोनों भाई खाट पर लैम्प जलाकर संस्कृत का श्लोक या अंग्रेजी का वर्ड मीनिंग याद किया करते थे तो नीचें खेत में मेढ़क अपने टर्र-टर्र से शमां बांधे रहता था, मुझे तो आज भी मेढ़क के टर्र-टर्र और झींगुर के झंकार में बड़ा बढियां नींद आती है | पर शहर में अब ये शायद ही कभी नसीब होता है | रात को बाबूजी घर के सभी किवाड़ों के नीचें जूट के खाली बोरे लगा देते थे, क्यूंकि मेढ़क के पीछे-पीछे सांप घुस आता था | बरसात में गाँव में सर्पदंश कि घटनाएँ बहुत बढ़ जाती है |

एक बार सत्यनारायण पूजा (हमारे यहाँ सत्यनारायण पूजा शाम में सूरज के अस्त होने के बाद होती है, कहीं-कहीं ये दिन में भी होती है) के बाद उनको घर पहुँचाने जा रहा था, दो जिस्म थे, चिकनी मिट्टी कि कच्ची सड़क थी और कजरी जमा हुआ था | कजरी पर अँधेरे में टोर्च कि रौशनी कम थी और हम दोनों पिछड़कर गिर गये, हम सिर्फ जमीं पर गिरे नहीं थे, प्रेम में भी फिसल गये थे, अंधरे में बिजलियों कि चमक पर ना जाने कब तक हम दोनों पंक-क्रीड़ा में मशगूल रहे, उनका तो पता नही घर में गंदे कपड़ों पर क्या टिप्पणी मिली पर मैं रास्ते में तालाब में पैंट-शर्ट निकालकर धोकर पहन लिया और घर में माँ पूछी तो बोल दिया था कि बारिश में भींग गया था, ये भी बता दिया कि एक बार तो फिसल भी गया था, डर था कि चोर कि दाढ़ी में तिनका होता है, कहीं मिटटी लगा रह गया होगा तो सवाल नहीं होगा | भोली माँ कितना यकीं करती थी |

वो हवाई चप्पल की बात तो मैं भूल ही गया, कीचड़ के छींटे पूरे पैंट पर होते थे, माँ धोते-धोते विफ़र पड़ती थी फिर बाबूजी हाट पर बरसाती चप्पल खरीद देते थे |

ज्यादा बारिश होने पर दादीमा चौके कि दीवार पर कालिख से कुछ चित्र बनाती थी, और मैं जो ननिहाल में उल्टा जन्मा था तो हमसे आँगन में माटी खोदवाकर आग गरवाती थी ताकि अब इन्द्रदेव अपना भाभट समेटें |

बाढ़ आने पर पोखड़ा से मछलियाँ निकलकर कर खेतों में आ जाती थी और फिर हमलोग बांस कि बर्छी से शिकार शुरू करते थे, कोई बुलबुला उठा या कोई पौधा हिला कि बर्छी से आक्रमण शुरू हो जाता था | बड़ा रोमांचक होता था | अगर बाढ़ का पानी ज्यादा रहा तो फिर केले की थंब से खाट बांधकर नाव बनाकर खूब घूमते थे |

इस मौसम में गाँव में शाम को प्याज कि कचड़ी खूब देखने को मिलेगी, दालान पर बैठकर किसानी बात और कचड़ी के साथ… | प्याज बस महिना भर पहले ही निकला होता है तो तक़रीबन सभी किसानों के घर में जरुर रहता है |

ये मौसम धानरोपनी का होता है | पहले गाँव में जब बारिश समय पर नही होती थी तो महिलाएँ जट-जटीन का सामूहिक नृत्य करके इन्द्रदेव को खुश करती थी | पर अब तो बिहार कि लोक संस्कृति ख़त्म ही हो गयी है | लोक संस्कृति का सिर्फ सांस्कृतिक महत्व ही नहीं इसका आध्यात्मिक महत्व भी है | समाज के निर्माण का आधार होता है लोक संस्कृति और परम्परा | और जब ये संस्कृति और परंपरा ख़त्म होती है तो इसके साथ ही विलुप्त हो जाता है उस समाज का वास्तविक स्वरुप |

हमारी लोक संस्कृति, हमारी लोक-कला, काव्य एवं संगीत, मिथिला-चित्रकला, लोक-नाट्य, भोजन, सामाजिक व्यवस्था, पारिवारिक संरचना, संस्कार, अतिथि स्वागत ही हमारी पहचान थी | जो आज हम महिला शशक्तिकरण कि बात करते हैं तो मुझे लगता है उस ज़माने में महिला अधिक शशक्त थी, परिवार के संस्कार और समृद्धि का आधार थी | बांस से डाला, सूप, बियानि, फूलडाली, सिक्की से पौती, मौनी, चंगेरी, खर पर प्लास्टिक के थैले को लपेटकर बनाई गयी मौनी, लाह की लहठी, कुश कि आसनी, मोथी का पटिया, सिंदूर का किया, सांच हमारी माँ-बहनों के कलात्मकता को प्रदर्शित करता था | पमरिया नांच, विहुला-विषहरी, झिझिया, जट-जटीन आदि लोक-नृत्य समाज को मजबूती से बांधे रखता था | पर आज सब ख़त्म | गूगल पर भी उपलब्ध नहीं है |

खैर मैं थोड़ा जज्बाती हो गया | ब से बरसात कि बात कर रहे थे हम | धान रोपनी का चर्चा शुरू किये थे | कभी कादो में हल के पीछे-पीछे खेत में घुमे हैं ? पैरों में पंक का जूता, कादो कि खुशबू और बैलों के गले में बंधे घंटी कि टन-टन…क्या उत्सव का माहौल होता है | उस वक़्त शायद मैं सातवीं-आठवीं में था, हरवाहे के लिए पनपियाई लेकर जाती हुई उसकी छोटू बहु के पायल की खनक पर मेरा पोर-पोर झनझना उठता था फिर क्या खाक पढाई में मन लगेगा, मैं भी धानरोपनी देखने पहुँच जाता था | अपने कोमल हाथों से जब वो धान रोपती थी, मैं एक टक उसे निहारा करता था, सारी महिलाएँ गाना गाते हुए धानरोपनी में व्यस्त होती थी और मैं उसे लेकर शून्य में होता था | रोपनी वो करती थी पर उसके कमर के दर्द को मैं महसूस करता था, एक दिन उसके पैर में सीसा चुभ गया था, पैर कीचड़-पानी में ऐसा सूजा था कि उसे पता भी नहीं चला, मैंने उसके पैर के पास का मटमैला पानी थोड़ा लाल सा देखा तो बोला, उसकी कलमुहीं सास तो बोली की ठेंघी लग गया होगा | पर उसका पैर काफ़ी कट गया था, वो पनपियाई कि ढकनी में से लत्ता फाड़कर उसे बांध दी और फिर से रोपनी में लग गयी | मैंने देखा था उसके नाजुक पैरों को, भखडी हुई चून-सुर्खी की दीवार की तरह पैर लग रहे थे | कमोवेश हालत आज भी बिहार में वैसा ही है, बहु-बेटियां वैसी ही रोपनी करती है, आज भी तकनीक बिहार के खेतों से नदारद है, हाँ पर कागज के पन्नों में अब अच्छा-खासा दिख जाता है |

काका तो बादल देखकर ही बारिश का हाल बता देते थे, धान के लिए बिचड़ा गिराने से पहले सब काका से पूछता था | काका कहते थे कि गर्मी के कारण जलवाष्प उपर उठता है और उपर आसमान में पहुंचकर ठंढा होकर कम तापमान कि वजह से बादल बन जाता है | बादल तीन तरह का होता है-एक होता है जो गोल होता है और बहुत ऊंचाई पर होता है, ये वर्फ के कणों से बने होते हैं | एक रुई के ढेर की तरह होता है, जब इसका रंग गहरा जाता है तो वर्षा होती है और तीसरा होता है जो पूरा फैला रहता है, पुरे आकाश को घेर लेता है, यही बादल अक्सर बरसता है, यह काफ़ी नीचें होता है | जब दो बादल टकराते हैं तो आवाज़ होती है और बिजली कड़कती है |

काका हवाओं के रुख से वर्षा का अनुमान करते थे | काका को नक्षत्र और बारिश के महत्व का पूरा ज्ञान था | काका बताते थे कि स्वाति नक्षत्र में बारिश का बड़ा महत्व है, खंजन चिड़िया स्वाति कि बूंदों पर ही भर साल कि प्यास पूरी करती है, बांस में अगर स्वाति का बूंद गिरता है तो बंसलोचन बनता है, घोंघा पीता है तो मोती, आदमी के सर गिरा तो विद्वान आदमी….मैं काका को बता कर रखता था कि स्वाति नक्षत्र आये तो बता दीजिएगा…एक बार याद है मुझे, स्वाति नक्षत्र में बारिश हुई, मैं खूब भींगा, कुछ पानी पी भी लिया, रात में पेट दर्द उठा तो डर गया कि कहीं मेरे भी पेट में मोती तो नही बन गया..|

काका कहते थे अगर सूर्य पश्चिम में हो और बादल पूरब से उठे तो शीघ्र वर्षा होगी | ऐसे ही अगर शाम में इंद्रधनुष दिखाई दिया तो समझो कि सुबह बारिश होगी | चाचा काफ़ी ज्ञानी थे, कहते थे अगर चैत में पछवा चल रहा है तो भादों में अबकी वर्षा होगी, और अगर चैत में वर्षा हो गया तो खरीफ का फसल बर्बाद गया समझो | चाचा के साथ रहकर मैं भी सिख गया कि जब अंडा लेकर चींटी अपने बिल से निकलती है तो इसका मतलब है कि वर्षा होने वाला है | कल एक किताब मिला है, ‘घाघ और भड्डरी कि कहावतें’, चाचा के ज्ञान का भंडार मुझे पता चल गया है, पढ़ रहा हूँ, आगे फिर कभी सुनाऊंगा |

वैसे आज जिस तरह से मौसम बदल रहा है, वक़्त पर बारिश नही हो रही है, पानी का स्तर गिर रहा है, ऐसे में जल का संरक्षण आवश्यक हो गया है | अनावश्यक पानी की बर्बादी जैसे मुंह धोते समय नल का खुला रहना, कपड़ा धोते समय नल का खुला रखना, टंकी भर गया फिर भी मोटर बंद नही करना…हमें इन चीजों से बचना होगा | कुवां, तालाब तो अब रहा नहीं, तो जल संचय की स्थित्ति काफ़ी बिगड़ी हुई है | हालात ऐसे ही रहे तो फिर….

बाकी तो आप सब बुझबे करते हैं |

 

किसानी सरदर्दी

Posted by on May 16, 2016 in Gaam-Ghar | 0 comments

किसानी सरदर्दी
खलिहान से लाइव
आज पकड़ी दयाल में हूँ, यह पूर्वी चंपारण का एक प्रखंड है । यहाँ हमारे साथ 750 किसान जुड़े हुए हैं, और इन किसानों की अपनी कंपनी है- उदय कृषक प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड (www.ukpcl.in)। सभी मक्का, धान, गेहूँ उत्पादक हैं।
सुबह से अकौना, थरभीतिया, नवादा आदि कई गाँव घूमा, खेत-पथार देखा, किसानों से बातचीत हुई ।
 
पिछले 10 दिन से यहाँ दिन को तो काफ़ी गर्मी रहती है पर रातों को अक्सर आँधी-बारिश हो रहा है , नतीज़न मक्के की फ़सल बरबाद हो रही है और अधपके में ही काट रहे हैं । इससे किसान को बाज़ार भाव कम मिल रहा है। इस साल पहले ही नमी के कारण गेहूँ-मकई कम जमा (अंकुरण) था और फिर परागन के समय आँधी-बारिश हो गयी तो फल सही नहीं निकला और अभी जब फसल काटने का समय आया तो फिर से मौसम नाराज । इस साल गेहूँ का भी उपज अच्छा नहीं रहा । हालांकि हमारे कुछ किसान जिन्होंने हाइब्रिड लगाया था उनके गेहूँ का उपज संतोषप्रद रहा । शिवशंकर जी कर्ज में डूब गये हैं, बस इतना कहा- “अगर आज बड़कू परदेश में ना कमाता रहता तो मैं ज़हर खा लेता, अब कमर टूट गयी है बाबू इस खेती-किसानी में…’
 
मैंने किसानों को ढांढस बढ़ाया और धान की तैयारी करने को कहा, जानकारियां दी और उनकी परेशानियों के मकड़जाल को सुलझाते हुए आगे की गांव की ओर बढ़ गया । विजय जी अपनी गाछी में बारहमासा आम दिखाए, मज्जर और फल दोनों है। अच्छा है एक पेड़ तो किचन गार्डेन में भी लग जाएगा । वहीं कृष्ण भोग आम देखा तो रहा नहीं गया, ढेला से एक तोड़ा, स्वाद लिया। रास्ते में नदी पार करते वक़्त एक मल्लाह मिला, काँटा फसा रहा था तो मैंने भी क़िस्मत आजमा लिया, पर मछली का मूड नहीं था, बेइज्जत करके भेज दिया ।
 
टहलते-टहलते रात हो गयी, अभी अतिथि गृह पहुँचा हूँ, बिजली रानी गुस्से में मुँह फुलाकर बैठी है । मैं छत पर चाँद से आज की रात की टोह ले रहा हूँ, शायद आज बारिश नहीं होगी, शायद चाँद को धान के पूरे 130 दिन की ख़बर होगी।
किसानी में भी बड़ी सरदर्दी है।

बदलाव

Posted by on May 16, 2016 in Gaam-Ghar | 0 comments

बदलाव

परिवर्तन के दौर में गाँव में पौराणिक रस्मों-रिवाज और आधुनिक तौर-तरीकों का संगम सामाजिक कैनवास पर गाँव का नया चित्र उकेर रहा है।
मैं इस वक़्त पकड़ी दयाल में हूँ, शादियों का मौसम है। उस जमाने में जब शादी के लिए रसूखदारों के शहजादे रथ पर निकलते थे तो घुड़सवारों का एक जत्था आगे आगे चलता था, ढ़ोल-तासे बजते थे, इक्कों और तांगों पर बारात चलती थी ।
वक़्त बदला तो रसूख़ की सामाजिक परिभाषा बदल गयी, पहले जमींदार रसूख़ थे और अब जिसने अर्थ प्रदर्शन कर लिया, ईज्जतदार रसूख़ हो गया । अब एक नमूना देखिये ।
दूल्हे राजा किराए की रथनुमा जीप में बैठें हैं, रथ रंगीन बल्बों से जगमगा रहा है । आगे-आगे डीजे बज रहा है, “….लुधियाना से अयली बलम जी”, तालियों के कुछ जादूगर नर्तकी भेष में अर्धनग्न नृत्य कर रहे हैं, पीछे कुछ शहजादे के मित्र सीटी बजाते हुए लाल रूमाल लहरा रहे हैं। दूल्हे के मामा100 के नये नये नोट लूटा रहे हैं, गाना बदल गया है, अब “लहरिया लुट् ए राजा..” बजने लगा है, घुड़सवारों की टोली ईधर-उधर दौड़ रही है, बीच-बीच में आतिशबाजी भी हो रही है। ये जश्न इनकी रसूख़ का प्रदर्शन है।
अब इनकी सोच भी काफ़ी उन्नत है । हम मौज मना रहे हैं तो आपके बाप का क्या जाता है! मेरा पैसा, मैं कुछ भी करुँ….!!

भाई बदलाव है ये… बदलाव । और आप कहते हो यहां कुछ नहीं बदला है ?

गाम, आम और दादीमां

Posted by on May 14, 2016 in Gaam-Ghar | 0 comments

गाम, आम और दादीमां

दालान से लाइव

जुड़-शीतल ख़त्म होते ही दादीमां की दिनचर्या बदल जाती है, वैसे ये कोई नई बात नही है, मौसम के अनुसार उनका दिनचर्या सालोभर बदलते रहता है | जाड़े में ऊन-काँटा पर सूखे हाथों की झूलती नसें थिरकती है, गर्मी में आम-आचार, मुंग-अरहर-सरसो, बरसात में आलय की साफ़-सफाई, खेत से सरसो, मिर्ची आया तो नीबूं-सरसो-मिर्ची का आचार, बाड़ी से ओल-मूली निकला तो उसका आचार, दिन-दिनभर पत्थर पर नीबूं घिसकर उसका निमकी….याद है कि भूल गये ?

अभी दादीमां आम-आचार में व्यस्त हैं |

जुड़-शीतल से शुरू होता है आम की चटनी के चटकारे ! कच्चा आम और पुदीने की पत्तियों को मिलाकर दादीमां चटनी पिसती है | स्वाद तो जो खाया वही जानता है | J लंबी बीमारी से उठने के बाद जो रोगी को अरुचि हो जाता है यहाँ उसकी भी खुराक बढ़ जाती है |

टिकुला (छोटा कच्चा आम) थोड़ा बड़ा होता है तो शुरू होता है अमचूर बनना | हर दिन सुबह-सुबह आम चुनना, उसे छिलना, काटना, सुखाना…..| गाछी से चुने हुए आमों में से आचार के लिए अच्छा अच्छा आम छांटा जाता है | शीशे के अलग-अलग जार और भिन्न-भिन्न तरह के आचार | किसी में आम को पतला-पतला काटकर, किसी में पीसकर, किसी में आम के चार टुकड़े कर के, किसी में कदूकस पर घीसकर, किसी में चीनी-गुड़ के साथ, किसी में नमक-हल्दी के साथ, तरह-तरह के मसाले, कुछ भुने हुए, कुछ कच्चे… आचार का भी विन्यास होता है | फिर हिस्सा लगता है – यह दिल्ली वाली बुआ के लिए, यह लखनऊ वाले नबाब साहब के लिए, यह पटना वाले चाचा के लिए, यह मामा के लिए….यह बुचीया की शादी के लिए, यह बुआ की गोतनी की चाची की बेटी की शादी के लिए, सबका हिस्सा लगता है |

आचार का दौड़ ख़त्म होते ही शुरू होता है अमावट की तैयारियां…| मई-जून की तपती दोपहरी में दादीमां थरथराते-कांपते हाथों से खलिहान में चौकी पर आम का रस सुखाती है, हर एक घंटे पर नया रस डाल कर हाथ से मिलाना होता है, पसीने से लथ-पथ होती है, हांफती रहती है, पर चेहरे पर परेशानी की महीन सी भी लकीर नहीं | दोपहर को जब घर में सबलोग सो रहा होता है, वह बरामदे पर बैठकर कौवा-मैना भगाती रहती है | कभी मौसम का मिजाज़ बदला, बदरी छाया तो दादीमां उदास हो जाती है | पर हिम्मत नहीं हारती, चूल्हे पर आम के गुदे को खौलाकर उसे जमाती है और अमावट बनाती है | अलग-अलग किस्म के आमों का अलग-अलग अमावट | यहाँ भी हिस्सा लगता है, बुआ के लिए, चाचा के लिए, मामा के लिए…..|

और फिर अमावट के टुकरों को एक-एक कर साफ़ सूती कपड़े लपेट कर रखती है | अक्सर मैंने दादीमां को अपनी नई साड़ी को फाड़कर टुकड़ा बनाते देखा है |

यह गाँव होता है जहाँ दादीमां अपने बच्चों को तोहफे में गाम का प्रेम, स्वाद और खुशबू भेजती है | कैसा होता है दादीमां का प्रेम ? उनका दिल ?

और आजकल के शहरी आधुनिक लोग…जिनके लिए बुढियां मतलब परेशानी, समस्या, कबाब में हड्डी…..और समाधान वृद्धाआश्रम…. | सोचो एक बार | वृद्धाआश्रम भेजकर खर्चे उठाने का पैसा है तो उन्हें गाँव भेज दो, एक आदमी उनकी देखभाल के लिए रख दो, एक-दो महिना पर आकर उनसे मिलते रहो | वो आपके लिए प्यार संजोते रहेगी | कुछ लोग बूढ़े-बुढ़ियों पर चिल्लाते हैं, झुंझलाते हैं, कुछ लोग उनको गाँव में भगवान् भरोसे छोड़कर भूल जाते हैं | ऐसा नही करना प्लीज, उनका दिल मत तोड़ना, वो जो आज हैं, कल तुम भी तो होगे ! क्या बाज़ार की उस गाज़र-नीबूं वाली लाल आचार में स्वाद आता है ? क्या शहर में कभी मटर और खेसारी के कोमल पत्ते को बेसन में लपेटकर खाए हो ?

गाँव की ओर मुड़कर तो देखो कभी चाचू…यहाँ कितनी दादीमां हैं आपकी बाट जोहते | अब तो उनकी आँखें पथरा गयी है | दादीमां है तो गाम है | आपको तो आपके शहर का शमशान भी नहीं पहचानता, पर गाँव में कोई अजनबी ही नहीं मिलता | आईये गाम कभी, फिर बात करेंगे, आम-गाम और दादीमां की |

गाम और आम

Posted by on May 4, 2016 in Gaam-Ghar | 1 comment

गाम और आम

खलिहान से लाइव

कल की बरसात के बाद गाँव काफी खूबसूरत हो गया है, प्रकृति बेहद प्यासी थी, पत्तियाँ जल गयी थी, पौधे झुलस-से गये थे | कल मौसम का मिजाज बदला, रात काफी काली हो गयी, बादल गरजने लगे, बिजली कड़कने लगी, पवन की रूहानी संगीत में गुलमोहर झुमने लगा | आम-लीची प्रेम-गीत गुनगुनाने लगे | प्रकृति का रोमांस देखने लायक था, बरामदे में निकलकर प्रकृति के इस जश्न में शरीक होने की इच्छा हुई, मदमस्त ठंडी हवाओं ने इतनी शैतानी से छुआ कि पूरा बदन सिहर सा गया, रोंए कांटे की तरह-उग से गये |

सुबह टहलने निकला तो देखा वो तीन साल का जर्दालू का बच्चा मुस्कुरा रहा है, अभी-अभी कुछ नव पल्लव लगे हैं उसमें | अपनी उम्र के हिसाब से कहीं अधिक समझदार और परिपक्व है | इतनी छोटी उम्र में भी मेरे लिए ढेर सारा फल लाया है | मुझे याद है, जर्दालू एक साल का था जब बाबूजी इसे नर्सरी से लाये थे, अभी लगाये ही थे कि एक रात किसी ने इसकी सर को तोड़ दिया, काफ़ी रोया था मैं, जर्दालू भी रो रहा था, भला इस पेड़ से क्या दुश्मनी, नहीं पसंद था मुझे बताते, मैं कहीं और लगाता | काकाजी ने समझाया कि उदास मत हो, अभी जर्दालू के एक सर थे, अब ४ सर होंगे और यह खूब सारा जगह लेकर बढ़ेगा…| वही हुआ, कुछ ही दिन में नया फुनगी निकला और जर्दालू फिर से मुस्कुराने लगा |

जर्दालू के ठीक पीछे इसका बड़ा भाई गुलाबखास है, २०-२२ बरस का होगा | बाबूजी इसे बड़ी दूर से कंधे पर लादकर लाये थे | वहीं बगल में लीची भी है, पुरे बगान में कुल ३४ पेड़ हैं पर रौनक आजकल इन्हीं तीनों की जुगलबंदी से है | मेरे अहाते के द्वार पर तीनों सर झुकाए स्वागत को तैयार थे, पगडंडी गुलमोहर के पुष्प-वर्षा में लाल चादर सी लग रही थी | मैंने मुस्कुरा कर कहा- ‘राजा भी क्या इतना झुक कर रहता है ?’

उनकी ख़ामोशी में ही जबाब था | शायद मनुष्य मात्र ही ईश्वर की सबसे विकृत रचना है, अब इन पेड़-पौधों को देखो, जितना फल लगता है, उतना झुक जाते हैं और मनुष्य इसे काटने में जड़ा भी नही हिचकिचाता |

बगीचे में टहलने का अलग ही आनंद है, और आम के मौसम में बगीचे में जितनी सकारात्मक उर्जा होती है शायद आपने कहीं ऐसा एहसास नही किया होगा | एक खटिया सरकाओ और गोधूली के अँधेरे में इनकी बातों को सुनो या रात के आखिरी पहर में जागते पंछियों के चहचहाहट में इनकी अंगराइयों को देखो, आपको पक्का इनसे इश्क हो जाएगा | जून में जब हल्की सी हवा पर राजा साहब पीले-पके फल आपके सर या झुकी पीठ पर गिराते हैं तो आपकी आह पर इनकी खिलखिलाहट गजब का होता है |

पुराना वो बिज्जू बड़ा खामोश था, धूप में काला हो गया है या गुस्से में ऐसा काला लग रहा था पता नहीं | मैं थोड़ा नजदीक गया, पता चला इसकी शिकायतों की लिस्ट काफी लंबी है | लोग सिर्फ फल लेने के लिए आते हैं, बाकि वक़्त कोई ताकता भी नही है | खुद से खाना बना लो तो ठीक वरना मरो, बीमारी में भी किसी को कोई परवाह नहीं | बस फल लेना रहा तो तरह-तरह के विटामिन डालने लगे, दुश्मनों से रक्षा के नाम पर मुझे जहर से नहला-नहलाकर सारे लाल चींटी को मार दिये, अब इनका जहर तो ४ ही महीने मुझे बचाता है, बाकि समय तो वही बचाता था पर किसे फिक्र है | मनुष्य है तो स्वार्थी तो होगा ही |

बात सोलह आने सही थी | वादा किया उसकी बात को आप तक पहुँचाने का और कुछ लाल चींटी ढूंढ़कर ला दिया |

दालान की तरफ आया तो देखा बाबूजी सब्जी बाड़ी में खुरपी चला रहे हैं | बाबूजी हमेशा गाँव में ही रहे, उनके बचपन गुजरने से पहले जमींदारी जा चुकी थी, जमीन के नाम पर सिर्फ घर बचा था, कुछ ८-१० कट्ठे गिरवी थे, काकाजी को नौकरी लगी तो गिरवी छुड़ाया गया | तंगी का दौर था, ना पैसे थे ना खेत-पथार-बाग-बगीचे थे | धीरे-धीरे बाबूजी पेड़ लगाना शुरू किये, आम-लीची-कटहल और भी ढेर सारे फल | पुरे १०० पेड़ हैं आम के और किसी को रोकते नहीं हैं, जिसको फल खाना है आकर तोड़ लेता है | शायद अपना पेड़ नहीं होने पर दुसरे की नजर और दुत्कार के दर्द का एहसास है उन्हें | माँ-बाबूजी को शहर पसंद नहीं है | कई बार बुलाता हूँ पर उन्हें वहीं जंगलों के बीच सुकून मिलता है |

“मौसम को देखकर हाड़ गया था पर अब लगता है कि कुछ होगा | कद्दू-खीरा लगा देते हैं…”,
“कुछ भिन्डी और घीरा भी लगा लीजिये, सुना है इस साल काफी बारिश होगी तो बाढ़ भी आ सकता है, भिन्डी-घीरा पानी लगने पर भी सब्जी देगा |”

माँ मुस्कुरा रही थी- “इतनी फिक्र है गाम-घर की तो शहर छोड़ क्यूँ नही देते ?”

“जिस दिन जबाब मिल जाएगा, लौट आऊंगा माँ…”

इल + एक्शन = इलेक्शन

Posted by on Apr 29, 2016 in Gaam-Ghar | 0 comments

इल + एक्शन = इलेक्शन

इलेक्शन अंग्रेजी में संधि-विच्छेद करके हिंदी में मतलब बूझें तो इल (ILL) + एक्शन(ACTION) मतलब बीमार कार्य | सहमत हैं ? झूठ होगा क्योंकि आपने कभी अपने रंगीन स्क्रीन पर देखा नहीं, अख़बारों में पढ़ा नहीं….

खैर आइये बिहार…यहाँ चल रहा है पंचायत इलेक्शन मतलब पंचायत चुनाव चल रहा है | गाँव की राजनीति गर्म है | कुछ सुयोग्य, सशक्त, कर्मठ, साहित्य-कलाप्रेमी, प्रखर समाजसेवी बस्ती-बस्ती घूम-घूम नीतिश्लोक पढ़ रहे हैं, कहीं भोज हो रहा है, कहीं जागरण, कहीं जुम्मे को अन्न दान हो रहा है | हर टोले में कुछ कुम्हार हवाई चाक लेकर मुखिया, सरपंच, पंचायत समिति, वार्ड-कमिश्नर गढ़ रहे हैं | बीच-बीच में ‘सामंत की जय हो’ भी सुनाई दे रहा है | इस बार कुछ चाणक्य भी अवतार लिए हैं, पिछले चुनाव में ये चन्द्रगुप्त थे, अबकी आरक्षण ने इनको बादशाह से प्यादा बना दिया है, अब ये शतरंज के पुराने खिलाड़ी हैं तो हार तो नहीं मानेंगे, अपनी चाल आजमा रहे हैं |  कहीं समीकरण बन रहा है तो कहीं सोशल इंजीनियरिंग की कक्षाएँ चल रही है | शराबबंदी का पूरा असर है, राजनीति का बाज़ार फ़ीका है, बेहद मंदा…उधार और मंगनी से चल रहा है | दलाल और चमचे तथाकथित समर्थक और नेता पीलिया से ग्रषित लग रहे है, अब तक रात को दारु और पैसा बाँटने के नाम पर दो-चार महीने के गुजारे का इंतजाम हो जाता था | इस बार सुशासन इनका चीर–हरण कर लिया है, इनके लिए तो ये दुशासन ही है, बोलते भी हैं नितीश दुर्योधन…. | कुछ होनहार, साहसी, वीर, जांबाज़, देश के भविष्य रतजगी कर रहे हैं, आजकल खुद को फ्रीलांसर जेम्स बांड नियुक्त किये हैं | तनख्वाह का तो पता नहीं पर पूछ काफी है |

कुछ जगहों पर चुनाव हो गया है, कुछ जगहों पर अभी होना है | जिन सरकारी सेवकों को इस नेक काम को शांतिपूर्वक करवाने का जिम्मा मिला है, वो नौकरी को कोष रहे हैं | मास्टर साहब की बेबसी पर उस कोचिंग वाले अजय सर की सहानुभूतिपूर्ण मुस्कराहट थोड़ी गुदगुदी करती है |

हमारे गाँव में पिछले रविवार को ही चुनाव हो गया, चुनाव प्रचार के दौरान एक-दो दिन थोड़ा-बहुत हंगामा हुआ पर बहस एक पक्षीय हो गयी तो रक्त प्रवाह का इंतजाम बेकार व्यर्थ चला गया | पटना से गौरव लक्ज़री का टिकट मिल रहा था, पर अवकाश का अभाव था, समर्थन मन में ही कुंठित रहा |

कल हमारे कुछ कार्यक्षेत्रों में चुनाव हुआ, कुछ-कुछ सूचनाएँ आई है, कहीं सवर्णों ने दलित-महादलित टोले में मतदान में बाधा दिया तो कहीं सवर्णों के नाम की लिस्ट ही गायब कर दी गयी, कहीं-कहीं कुछ-कुछ खरीद-बिक्री का भी सुना हूँ पर जानकारी नहीं है कि इस मंडी में क्या बिकता है, कौन बिकता है और कौन खरीदता है |

चुनाव और क्रिकेट में काफ़ी समानता है, लोकसभा चुनाव टेस्ट मैच जैसा….बड़े आराम से…लंबी दूरी तय करनी है भाई | विधानसभा चुनाव वन-डे जैसा, रक्तचाप बढ़ा हुआ, दांव-पेंच चालू, अटकलों और सट्टे का बाज़ार गर्म | पंचायत चुनाव तो टी20 है भाई, रक्तचाप मधुमेह के संग….ह्रदय गति निरंतर नियमित रफ़्तार से कई अधिक माइल्स की रफ़्तार में, दांव-पेंच शतरंज की बिसात से भी अधिक खतरनाक, यहाँ सट्टा नहीं कट्टा चलता है | यहाँ गीदर भी सिंह की खाल में घूमते है |

पर, मुझे व्यक्तिगत रूप से इस चुनाव कार्य में काफी अवसर दीखता है, दो महीने की महाकुंभ में बहुतों को रोजगार मिल जाता है, बहुतों के भीत-घर पक्के हो जाते हैं, चूल्हों पर कड़ाही देर तक चढ़ी रहने लगती है | अजनबियों से युहीं परिचय हो जाता है, बात करने के लिए मुद्दे मिल जाते हैं, बस-ट्रेन का सफ़र आसान हो जाता है, सफ़र की दूरी घट जाती है | खबरीलालों का मान-सम्मान बढ़ जाता है | मुझे तो लगता है कि चुनाव हर साल होना चाहिए | चुनाव पर किताब लिखे जाने चाहिए, उसका अंग्रेजी अनुवाद होना और जरुरी है, इंग्लैण्ड-अमेरिका से लोग शोध करने आयेंगे | टूर कम्पनियां स्पेशल चुनाव पैकेज भी निकाल सकती हैं, एक यात्री के लिए यहाँ बहुत सारी यादें, क्षण सहेजने लायक होती है | यहाँ रियल लाइफ ड्रामा, सस्पेंस, फाइट, लव, रिवेंज…. सनेमा के मसाले की पेटी के सारे फोरण होते हैं | बहुत कुछ है यहाँ, ज्ञान का महासागर है, जितनी डूबकी लगाओगे, उतना पाओगे |

अगलगी में खलिहान राख

Posted by on Apr 14, 2016 in Gaam-Ghar | 0 comments

अगलगी में खलिहान राख

खलिहान से लाइव

आज खलिहान से एक बुरी खबर है | नालंदा जिले के हिलसा प्रखंड में हमारे साथ तक़रीबन ५०० किसान परिवार जुड़े हुए हैं | रबी की फसल सब की तैयार हो गयी है पर भंडारण की कोई व्यवस्था है नही तो सबका फसल अभी खलिहान में ही रखा रहता है | अधिकांश लोगों के पास अपनी जमीन नहीं है, पट्टे पर जमीन लेकर खेती करते हैं | छोटे और सीमांत किसान हैं | कल शाम सिपारा गाँव में एक खलिहान में आग लग गयी और जब तक आग पर काबू पाया जाता हमारे कुछ किसानों का गेहूं, सरसों, राय, मसूर राख हो चुका था | रात के ११ बजे रोते-बिलखते हुए अवधेश जी ने फ़ोन किया सर मैं बर्बाद हो गया…| मेरी आवाज गले में बंध गयी, कोई शब्द नही मिल रहे थे की उनको सांत्वना देता |

सुबह-सुबह हमारी टीम सिपारा तो पहुँच गयी पर उनके परिवार को ढांढस बनाने में अपना ही ढांढस टूट जा रहा है | घटना अखबारों की सुर्खियाँ बन चुकी है पर सहारे देने को फ़िलहाल कोई नही है | आज चूल्हे-चौके सब बंद है | निगाह सिर्फ खलिहान पर लगी है, यकीं नही हो रहा की जो सपने देखे थे वो आज राख हो चुका है, अब यजमान का सूद कैसे चुकायेंगे ? बेटी की पढाई का खर्चा कैसे भेजेंगे ? अगली फसल लगाने के लिए अब कर्ज कौन देगा ?

नुकसान का व्योरा इस प्रकार है-

अवधेश कुमार- ५ बीघे का गेहूँ, १० मन सरसों, ५ मन राय, २ बीघे का मसूर, एक मोटर और थ्रेशर

योगेन्द्र कुमार- ६ बीघे का गेहूँ, ५ मन सरसों, ३ मन राय

मोहन पासवान- ३ बीघे का गेहूँ, १ बीघे का सरसों, १० कट्ठे का राय

धर्मवीर यादव- ३ बीघे का गेहूँ, १ बीघा का सरसों, १० कठ्ठे का राय

जगदेव गोप- ४ बीघे का गेहूँ, २ बीघे का खेसारी, २ बीघे का सरसों, ३ बीघे का मसूर

छोटेलाल यादव- ३ बीघे का गेहूँ, १५ मन सरसों, १२ मन राय

शिशुपाल गोप- ४ बीघे का गेहूँ, १० मन सरसों, १० मन राय

सिया गोप- ३ बीघे का गेहूँ, १० मन सरसों, १० मन राय

कपिल महतो- ३ बीघे का गेहूँ, २ बीघे का मंगरैला, ५ मन राय, ५ एचपी का मोटर, थ्रेशर,

देवानंद महतो- १ बीघे का मसूर, ३ पुवाल का टाल, मेवाड़ी

जुड़-शीतल

Posted by on Apr 14, 2016 in Gaam-Ghar | 0 comments

जुड़-शीतल

जुड़-शीतल की ढेर सारी शुभकामनाएं !!

 

मिथिला में प्रकृति पूजा एक परंपरा रही है और यहाँ के गांवों में आज भी इसकी झलक आपको मिल जाएगी | यहाँ की संस्कृति में विज्ञान का सुन्दर समावेश है | जुड़-शीतल इस परंपरा में विज्ञान के समावेश को प्रदर्शित करनेवाला  अद्भुत पर्व है | आज के दिन ही राजा सलहेश का जन्म हुआ था | मिथिला में एक वर्ग विशेष में इनकी पूजा का विशेष महत्व है |

आज वैशाख का पहला दिन है, आज से मिथिला का कैलंडर शुरू होता है | आज के दिन की शुरुवात साफ़-सफाई से होती है | आज घर का चूल्हा बदला जाता है | नाला, तालाब आदि पानी संगृहण वाले जगहों की साफ़-सफाई की जाती है | आज-कल मिट्टी के चूल्हे और तालाबों की संख्या कम हो गयी है तो पर्व घरों में अब सिमट रहा है | शहर में तो ना के बराबर, पर गाँव में अभी भी तक़रीबन सभी घरों में मनाया जाता है | सुबह सूर्योदय से पहले उठकर सभी पेड़-पौधों में पानी डाला जाता है और पेड़ के हरियाली और स्वस्थता की दुआ की जाती है | बड़े-बुजुर्ग छोटों के सर पर जल से भिंगोकर आशीर्वाद देते हैं की सालोंभर मस्तिष्क ठंढा रहे | आज अन्न और जल दान करने की भी परंपरा है | सड़क किनारे पनशाला बनाकर पथिकों को चना और जल दान किया जाता है |

आज दिन में चूल्हा-चौका बंद रहता है, सत्तू ही आज का भोजन रहता है | बड़े-बुजुर्ग बताते हैं कि इस समय मौसम बदलता है, भीषण गर्मी पड़ने लगती है जिससे वायु-पित्त बढ़ जाता है और उदर व्याधि शुरू हो जाती है और वैज्ञानिक दृष्टि से चना वायुरोधक होता है और ठंढा होता है, इसीलिए आज के दिन से गर्मी में सत्तू पिने की सलाह दी जाती है | आज कच्चे आम की चटनी बनाई जाती है, बेसन का व्यंजन बनाया जाता है | और अगले दिन बासी खाना खाते हैं |

आज की दिन की एक विशेष उत्सव भी होता है जिसे धुरखेल कहते हैं, यह होली की तरह होता है, जैसे होली में रंगों से खेल होता है, इसमें मिट्टी से होता है | देवर-भाभी, जीजा-शाली कीचड़, गोबर से एक दुसरे को नहलाते हैं | पर अब यह खेल विलुप्त होने के कगार पर है | वैसे चिकनी मिट्टी से त्वचा में रौनकता भी आती है पर अब लोग मिट्टी से दूर हो रहे हैं, पैर में लगने नही देते तो गालों में कैसे लगने देंगे |

जुड़-शीतल समाज में आपसी प्रेम को बढ़ाता है, अपनी मिट्टी की खुशबू का एहसास दिलाता है, संरक्षण की जरुरत है |

फाल्गुन मास और बसंती बयार

Posted by on Mar 20, 2016 in Gaam-Ghar | 0 comments

फाल्गुन मास और बसंती बयार

खलिहान से लाइव

आकाश में लालिमा कोई तस्वीर को सुर्ख रंगों से भर रही है, अरहर की झुरमुटों में अभी भी अँधेरा है | मैं खेत-पथार घूमने निकला हूँ |

आम-लीची के मज्जर और सरसों-पलास-सेमल-कचनार के रंग-बिरंगे फूलों की पुष्प वर्षा में नव पल्लव की सेज पर कामदेव पुत्र ऋतुराज बसंत, महुआ की मादक गंध की बयार में कामातुर दीख रहा है, पंछियों की कलरव धुन पर कोयलिया के राग-बसंत में पूरा प्रकृति काम-संगीत में डूबा नज़र आ रहा है | गेहूँ-मकई-अरहर की यौवनावस्था चरम पर है, सब झूम-झूम कर इठलाती हुई नाच रही है | मैं गाम की पगडंडियों पर सर में गमछा बांधे गर्दन पर बांस की लाठी से दोनों हाथ फ़साये फगुआ का गीत गुनगुनाता जा रहा हूँ |

उधर अरहर की झुरमुटों में कोई जोड़ा उत्सव मना रहा है…मैं बड़का काका के नहर वाले खेत की पगडंडियों पर खड़ा खेत देख रहा था | यही वो खेत है जहाँ मैंने कभी गेहूँ की चार बालियों के बीच प्याज का फूल लगाकर पर घास छिलती रधिया (राधा) से प्यार का इजहार किया था…रधिया लजाकर बस इतना बोली थी- “ये फगुआ भर का प्यार तो नहीं है ना कान्हा ?”

फूलेसरा की हाक से मेरा यादों का भक टूटा…इमली के नीचें फूलेसरा गमछा बिछाकर बैठा हुक्का सुलगा रहा था |

“सुबह-सुबह शुरू हो गये…काका फेफरा में केकड़ा लग जाएगा…”

“अब कितना जियेंगे बेटा…ये हुक्का मुझे तेरी काकी सी लगती है…जब इसे होठों से लगाकर खिचता हूँ, उपर पीनी पर आग चरचराता है तो बाबा बैद्नाथ की कसम.. ऐसा लगता है जैसे मैं तेरी काकी के नाभि को चूम रहा हूँ और वो कसमसा रही हो…इसकी गरगर में तो अक्सर मुझे तेरी काकी के पेट की गरगराराहट सुनाई देती है |”

फूलेसर चुनौटी से सुरती निकाल नाक में लगाया और जोड़ से एक छीक मारी |

मेरे मुंह से अनायास ही निकल गया- “असंतृप्त प्रेतात्मा…वहशी… जीते जी कभी विदेसरा के माई को सुख नहीं दिया और आज गप्प से सुरती बना रहा है “

10-15 बसंतों के बाद गाम दूर हो गया था, पटना में चार तल्ले पर 10X12 की कोठली से कभी पता ही नही चलता था…सिर्फ खजूर के पेड़ दीखते थे | पर यहाँ भी मैं कभी कभी बसंत देख लेता था.. मैं खिड़की से उसे देखा करता था… वो बिना दुपट्टे के नहा कर कपडा सुखाने छत पर आती थी…बार-बार झुककर बाल्टी से कपड़े उठाती थी…फटकारती थी फिर डोरी पर कपड़ा डाल गर्दन झटक कर अपने गालों से बालों को बड़ी शरारत से हटाती थी, मैं उसके यौवन में बसंत देखता था…

इस बार कई सालों बाद फगुआ में गाम आया हूँ…परसों पूर्णिमा है…परसों रात में  संजय पुरोहित जी आग में होला (अधपका नव अन्न) डालकर पारंपरिक रूप से सम्मत (होलिकादहन) जलाएंगे…बचपन में सम्मत की रात पूरा गाम हम बच्चा टोली से परेशान रहता था…किसी को नही छोड़ते थे हम…किसी की लकड़ी, किसी का गोयठा, किसी का खर-पुआल…यहाँ तक की बांस की बेड़ी और मचान भी उखाड़ कर सम्मत के लिए चुराकर ले आते थे | पर आज पश्चिमी दिखावे का चलन और आधुनिकतावाद ने सामजिक परम्पराओं को पछाड़ दिया है, परम्पराओं को रुढ़िवादी विचारधारा का नाम दे दिया गया है |

बसंतोत्सव के चरमोत्कर्ष पर मनाया जानेवाला यह पर्व बहुत ही आनंददायी होता था | आज की तरह. मांस-मदिरा, लड़ाई-दंगा, अमर्यादित और अश्लीलता नहीं होती थी | सुबह से दोपहर तक रंग-गुलाल में मुख लाल-हरा-पिला करते थे, मीठे पकवान- मालपुआ, दही-बड़ा खाते थे और शाम में गाँव के सभी मर्द टोली बनाकर फाग गाने निकल पड़ते थे | लोटा भर भांग पीने के बाद फुचबा फ़ाग का सुर लगाता था | चनमा चमाड़ के ढोल की थाप आज भी मेरे कानों में गूंजती है | मुझे फाग नही आता था तो बस झाल खनकाते हुए आ-आ करते रहता था | हाँ जोगीरा गाते समय सारा-रा-रा-रा खूब करता था | बीच-बीच में बांस की लंबी पिचकारी से लोगों को भिंगाया भी करता था |

ख्यालों का दौर में चलते चलते अभी अपने अहाते में पहुंचा ही था कि अचानक

“ओह्ह्ह….भौजी….ये क्या किया आपने…? ?”

“बुरा ना मानो होली है देवर जी”

छोटकी भौजी ने भर बाल्टी गोबर-पानी मिलकर पीछे से दाल दिया था | फिर तो हमारी होली शुरू हो गयी…मिट्ठी-धुल-गोबर…नाले का कचड़ा भी…देवर-भाभी में जमकर होली हुई….| गुनगुनी धुप में भींगा बदन और अलबेली बसंती बयार भौजी को छेड़ रहा था…वह सिहर रही थी | एक पल के लिए मुझे छोटकी भौजी में रधिया दिख गयी | दादीमाँ चिल्ला रही थी- ‘बीमार पड़ोगे दोनों…जल्दी नहाओ’

पहले का रंग-गुलाल पलाश, सिंहार, तुलसी, हल्दी, चंदन, अमलतास, चुकंदर से बनता था…प्राकृतिक सुगंध से भरा | आज की तरह सिंथेटिक नही…आज तो ऐसे-ऐसे पेंट आ गया है जो चेहरे पर पुता तो चमड़ी ले कर निकलेगा…फोड़े-फुंसी तो आम बात हो गयी है |

गाँव से देशी रंगों का अभाव का एक बड़ा कारण यह भी है की अब वो देशी पेड़-पौधे भी दुर्लभ हो रहे हैं…पर गाँव को गाँव देखनेवाले हर शहरी देहाती (वो पीढ़ी जो गाँव में पैदा हुई और शहर में बस गयी) से मेरी व्यक्तिगत गुजारिश होगी की कुछ देशी पेड़ लगायें जैसे- पलाश, कचनार, कदंब, जलेबी, सेमल आदि | बसंत भी बसंत लगेगा और गाँव भी खूबसूरत होगा | फिर फगुआ में गाँव आइये, सब मिलकर रात को हल्दी की गाँठ, मेहँदी, टेसू के फूल सब पानी में फूलायेंगे और देशी रंग बनायेंगे…फिर इको फ्रेंडली होली होगा..| जोगीरा सारा-रा-रा….!!

“पिला, हरा या गेरुआ, रंग सब देशी होय

बेपरवाह गुरु कह रहो होली में बस प्रेम दिल में होय…”

“पिला, हरा या गेरुआ, रंग सब देशी होय

बेपरवाह गुरु कह रहो होली में बस प्रेम दिल में होय !!”