खलिहान से लाइव- गाम-घर के खिस्सा Dec31

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खलिहान से लाइव- गाम-घर के खिस्सा

दिसंबर के महीने में गाँव काफ़ी खूबसूरत हो जाता है | यह एक ऐसा वक़्त होता है जब चारो तरफ़ हरियाली ही हरियाली दिखाई देती है, मक्का-गेहूँ-आलू-गोभी सब मिट्टी को हरियाली से ढँक रहे होते हैं….| घने कोहरे के बीच दिन के दुसरे पहर में बड़ी मशक्कत के बाद भगवान सूर्य अलसाये से दिख पड़ते हैं | कपकपाती हाड़ दूर खेत में सिंचाई में व्यस्त होता है | कुछ प्रवाशी पक्षियाँ खेतों के उपर बिजली के तारों पर बैठी दिख पड़ती है | तालाब किनारे सर्वजाया का रंग-विरंगा फूल मनमोहक लगता है | प्राकृतिक भंगिमाएँ कैमरे में कैद करने लायक होती है, बड़ा अद्भुत् और मनोरम दृश्य होता है |

मैं आज सुबह इस अनुभूति को आत्मसाथ करने गाँव की ओर चल पड़ा | बड़ी मुश्किल से मोटरसाइकिल स्टार्ट हुआ, कान बांधा, दस्ताने पहने और हेलमेट लगाकर चल दिया | गौरतलब है की सर्दी के दिनों में हमारे यहाँ सभी लोग हेलमेट लगाते हैं | क्यूंकि कान में ठंड का एहसास काफी सर्द होता है | और अगर गलती से ये ठंड सर से पेट तक पहूंची तो पेट में तो फिर क़यामत ही आ जाती है….कभी गाढ़ा पीला द्रव्य नीचें से बिना पूछे निकल जाता है और कभी पिला-उजला द्रव्य उपर से….बेफिक्र…बेपरवाह…बिना पूछे-बताये…|

बार-बार हेलमेट के शीशे पर कोहरा जम जा रहा था, शीशा उपर उठाता था तो आँखों की पलकों पर ओस की बुँदे तैरने लगती थी….| गाँव के खरंजे पर मैंने साइकिल से ट्यूशन-कोचिंग जाते बच्चियों को देखा, एक हाथ से नाक दबाये, एक हाथ से हैंडल संभाले जल्दी-जल्दी पैडल चला रही थी….आज भी गाँव की सड़कों का किनारा खुले शौचालय के रूप में व्यवहार होता है | कुछ महादलित टोले के बच्चे सिक्के खेलते हुए देखे…कांच की गोली का खेल अब पुराना हो गया है, बच्चे अब एक-दो और पांच के सिक्कों से खेलते हैं…|
गाँव में घुसते ही देखा सत्तार चाचा चाची के घास धोने के लिए बाँस की डेक बुन रहे थे, मैंने हाल-चाल लिया और फिर आगे बढ़ गया | शिवशंकर चाचा गेहूँ की सिंचाई में परेशान थे | कुछ किसान अलाव जलाकर बैठे थे और आग के पास ‘चाय पर चर्चा’ चल रही थी | मुझे अपना गाँव याद आया जब बचपन में हम दूर खेत पर नदी किनारे पुराने बरगद के पास पिकनिक मनाने जाते थे और अलाव जलाकर उसमें आलू और शकरकंद पकाया करते थे |

सुरेश भाई के यहाँ भाभी चावल की रोटी और कोहरे की तरकारी बना रही थी, आग्रह की तो ना नहीं कह पाया, जलपान किया और फिर गंतव्य की ओर चल दिया | जाते-जाते भाभी ने रात का भी निमंत्रण दे दिया, रात के मेनू में आग में सेंकी हुई घी में डुबोयी ही लिट्टी और बैगन का चोखा साथ में प्याज के पत्तों की पकौड़ी का भी इंतजाम था |

जैसे धीरे-धीरे धूप उगने लगी लोग अपने-अपने काम में लगने लगे, कुछ ही देर में गाँव खाली-खाली सा लगने लगा | मैं भी जल्दी जल्दी अपना काम निपटाने लगा | सर्दियों में सूरज जल्दी डूब जाता है और ठंड भी बढ़ने लगती है |

सर्दियों की रातें बड़ी भयानक और लम्बी होती है | ७-८ बजते बजते गाँव में सन्नाटा छा जाता है | लोग रजाई में दुबक जाते हैं | सबसे ज्यादा तकलीफ़ तब महसूस होती है जब हर एक-दो घंटे पर जल-उत्सर्जन अंग बाहर की ठंडी हवा खाने को व्यग्र हो जाता है | बमुश्किल से ये कभी कभी कंट्रोल हो पाता है |

सर्दियों में आपका अनुभव कैसा है गाँवों का या शहरों का ?