इश्क Jan05

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इश्क

 

तूने इतना जो कहा, “सैय्याँ तू कमाल का, बातें भी कमाल का…” देख मैंने कितनी बातें कह दी…

 

“इश्क़ में शहादत को तेरी मुस्कुराहट ही काफ़ी थी कातिल…
यूँ बेपरवाह गले लगाने की जरुरत क्या है ?”

“रंजिश-ए-इश्क़ में यूँही बरबाद हुआ बेपरवाह
कसूर फ़क़त इतना सा था-
फिक्र हिज्र में था और जिक्र बेजुबाँ रहा…|“

“इश्कोहलिक आवारा बेपरवाह बंजारा इश्कजादा
तुम मिले तो पूरा…बिन तेरे वाहिद आधा….. !!”

“बेपरवाह तुम क्या जानो क़द्र मोहब्बत की !
दिन फिक्र में गुजरता है और रात फ़ितूर में !”

“बेपरवाह तेरी कलम की इतनी बेफ़िक्र रफ़्तार क्यूँ है ?
रंग स्याही का गहरा है या हिज्र जी रक्त में लिखावट सुर्ख है ??”

“रस्में वफ़ा में यूँ मशगूल हुए बेपरवाह,
बेवफ़ाई का हर नमूना मासूक की अदा-ए-इश्क़ लगी !”

“बेपरवाह बादल बरस रहा घनघोर अंधेरी रात में,
बता वाहिद बिजली की चमक पर कैसे संभालेगा पतवार मझधार में ??”

और हाँ जाते-जाते आपके लिए बाबा नागार्जुन की कविता की एक पंक्ति-
“आप क्या जानो मूंगफली खाना क्या है
कितनी बेफ़िक्री से होता है
मूंगफली खाते हुए दुनिया को देखना!”
संदर्भ समझ गयें या समझाना होगा ?