जुड़-शीतल Apr14

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जुड़-शीतल

जुड़-शीतल की ढेर सारी शुभकामनाएं !!

 

मिथिला में प्रकृति पूजा एक परंपरा रही है और यहाँ के गांवों में आज भी इसकी झलक आपको मिल जाएगी | यहाँ की संस्कृति में विज्ञान का सुन्दर समावेश है | जुड़-शीतल इस परंपरा में विज्ञान के समावेश को प्रदर्शित करनेवाला  अद्भुत पर्व है | आज के दिन ही राजा सलहेश का जन्म हुआ था | मिथिला में एक वर्ग विशेष में इनकी पूजा का विशेष महत्व है |

आज वैशाख का पहला दिन है, आज से मिथिला का कैलंडर शुरू होता है | आज के दिन की शुरुवात साफ़-सफाई से होती है | आज घर का चूल्हा बदला जाता है | नाला, तालाब आदि पानी संगृहण वाले जगहों की साफ़-सफाई की जाती है | आज-कल मिट्टी के चूल्हे और तालाबों की संख्या कम हो गयी है तो पर्व घरों में अब सिमट रहा है | शहर में तो ना के बराबर, पर गाँव में अभी भी तक़रीबन सभी घरों में मनाया जाता है | सुबह सूर्योदय से पहले उठकर सभी पेड़-पौधों में पानी डाला जाता है और पेड़ के हरियाली और स्वस्थता की दुआ की जाती है | बड़े-बुजुर्ग छोटों के सर पर जल से भिंगोकर आशीर्वाद देते हैं की सालोंभर मस्तिष्क ठंढा रहे | आज अन्न और जल दान करने की भी परंपरा है | सड़क किनारे पनशाला बनाकर पथिकों को चना और जल दान किया जाता है |

आज दिन में चूल्हा-चौका बंद रहता है, सत्तू ही आज का भोजन रहता है | बड़े-बुजुर्ग बताते हैं कि इस समय मौसम बदलता है, भीषण गर्मी पड़ने लगती है जिससे वायु-पित्त बढ़ जाता है और उदर व्याधि शुरू हो जाती है और वैज्ञानिक दृष्टि से चना वायुरोधक होता है और ठंढा होता है, इसीलिए आज के दिन से गर्मी में सत्तू पिने की सलाह दी जाती है | आज कच्चे आम की चटनी बनाई जाती है, बेसन का व्यंजन बनाया जाता है | और अगले दिन बासी खाना खाते हैं |

आज की दिन की एक विशेष उत्सव भी होता है जिसे धुरखेल कहते हैं, यह होली की तरह होता है, जैसे होली में रंगों से खेल होता है, इसमें मिट्टी से होता है | देवर-भाभी, जीजा-शाली कीचड़, गोबर से एक दुसरे को नहलाते हैं | पर अब यह खेल विलुप्त होने के कगार पर है | वैसे चिकनी मिट्टी से त्वचा में रौनकता भी आती है पर अब लोग मिट्टी से दूर हो रहे हैं, पैर में लगने नही देते तो गालों में कैसे लगने देंगे |

जुड़-शीतल समाज में आपसी प्रेम को बढ़ाता है, अपनी मिट्टी की खुशबू का एहसास दिलाता है, संरक्षण की जरुरत है |