ख़जूर May17

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ख़जूर

सूरज डूबने को है और उगते चाँद को बदरी लील गया है। शाम अंधेरी रात सी गहरा गयी है। हवाओं का रूख भी काफ़ी वहशी है। घनघोर गर्जनाओं और कड़क बिजली के संग बारिश की संभावना है।
फ़ल से लदे ख़जूर के पेड़ झूल रहे हैं, ऐसा लग रहा जैसे मानो कोई स्त्री अपने छठे-सातवें महीने में हो, क़मर पर बेटी को धरे जिसके बाल हवा में उड़ रहे हों और वो खिलखिला रही हो, माथे पर गेहूँ का बोझ संभाले खेत की मेड़ पर दौड़ी भागी जा रही हो कि जल्दी घर पहुंचना है, आंगन में सूखती अरहर भींग ना जाए। उसकी गेरुवा साड़ी लहरा रही है।
मैं खिड़की से ख़जूर को ताक रहा था, बारिश शुरु हो गयी थी। कमरे में टंगा कलेंडर खट-खट दीवाल पर सर पटक रहा था, बिन बिजली के पंखे घूम रहे थे, बारिश की बूँदें मुझे भींगा रही थी, पर मैं हवाओं की मनमानी में बेपर्द हो रहे ख़जूर के यौवन, उसके उरोज़ों को निहारने में मशगूल था।
सामने छत से कोई हाथ हिला रही थी, भक् टूटा…
“क्या है? कौन हो तुम? कितनी बेशर्मी से मुस्कुरा रहे हो…।”
वो सामने वाली छत पर अधकटी ब्लाउज पहने छत पर गेहूँ समेट रही थी, साड़ी में पिन शायद नहीं लगा था, ब्लाउज का एक हूक टूटा हुआ था, आंधी में पल्लू बार-बार कंधे से गिर जा रहा था, खुली लटें परेशान कर रही थी ।
“जी… जी.. नहीं…. मैं आपको नहीं देख रहा था, मैं.. मेरा मतलब मैं उस झूलते ख़जूर को देख रहा था ।”
वो पता नहीं क्या समझी,
“धत्..”
हसीं और शरमाकर नीचें भाग गयी। मैं भी जल्दी से खिड़की बंद किया और मोमबत्ती जलाकर बाबा नागार्जुन की बाबा बटेसरनाथ पढ़ने लगा।