Khissa

ख़ुशी – तेरे नाम एक खुला खत

Posted by on Dec 26, 2016 in Laprek | 1 comment

ख़ुशी – तेरे नाम एक खुला खत

ख़ुशी

कैसी हो ? तेरे नाम से पहले कोई विशेषण अच्छा नहीं लगता मुझे | मुझे सिर्फ तुम ‘तुम जैसी’ ही अच्छी लगती हो |

पिछले कुछ दिनों से जिस्म कि तकलीफें बढ़ गयी थी, लोग-बाग़ के साथ साथ आलमारी में लगा सीसा भी शिकायत करने लगा था | दिल कि तकलीफों को तो कोई नहीं देखता ख़ुशी पर जिस्मानी तकलीफें सब को नज़र में चुभने लगती है | अब तो हद ये है कि सीसे में भी ये नहीं दीखता, माँ-बाबूजी के बाद शायद तुम ही एक थी जिसको सबकुछ साफ़-साफ़ दीख जाता था, मुझे ‘आज’ पता होता तो ‘कल’ तुम्हें जाने नहीं देता, हरगिज नहीं जाने देता, तुम नहीं मानती तो तांत्रिक बाबा से तुम्हें सीसा बनवाकर आलमारी में लगा देता |

जानती हो डॉक्टर साहब ने ढेर सारी दवाईयां भिजवा दी है | तुझे तो पता ही है कि मुझे दवाईयों से कितनी नफरत है, और जो काम मुझे पसंद नहीं वो भूल जाने की पुरानी आदत है | तब तुम थी तो याद दिलाती रहती थी अब कौन है यहाँ जो याद दिलायेगा | बाबूजी डांटकर बोले थे कि दवा टाइम से खा लेने, वो मेरे ज्यादा परेशान थे मेरी बिमारी को लेकर | उनके लिए मैंने मोबाइल में अलार्म लगा दिया एक बार सुबह के 10 बजे का और फिर रात का 10 बजे का | अलार्म कि बात मान लेने के लिए तेरी जुबान में एक संवाद डाल दिया – “दवा खा लो बाबू” | पर जानती हो अब जब भी अलार्म के साथ मोबाइल के स्क्रीन पर “दवा खा लो बाबू” उभरता है, कसम से शब्द दिखाई नहीं देता, कानों में सिर्फ तेरी आवाज़ गूंजती है- ‘दवा खा लो बाबू’ |

ये कैसा कनेक्शन है मेरा-तेरा ख़ुशी?? मेरी कितनी चीजों में तुम समा गयी हो? इसी को प्यार कहते हैं क्या? मुझे तो ये नशा लगता है | मुझे शायद किसी नशा मुक्ति पुनर्वास केंद्र जाने की जरुरत है | तुम्हें कोई पता हो तो सूचित करना |

नाउम्मीदी पर जबाब की प्रतीक्षा…

किसका गौरव ??

तुम्हें याद है ??

Posted by on Dec 25, 2016 in Laprek | 0 comments

तुम्हें याद है ??

आज फिर से २५ दिसम्बर है, तुम्हें याद है ? मेरे लिए तो ये दिन कई मायनों में खास है, तुम्हारे लिए भी होगा पर हमारे लिए ? हमारे लिए ये वो दिन है जब हमने एक दुसरे को आखिरी बार स्पर्श किया था और फिर हमेशा के लिए अपने पतवार को अलग मोड़ लिया था |

ज़ेवियर में मोमबत्ती जलातेवक़्त हम कैसे पति-पत्नी की तरह प्रभु के सामने सर झुका रहे थे | और वो बाहर में क्रिसमस ट्री के पास तेरी कितनी सारी फोटो खिंची थी मैंने | तूने रखा है संभालकर उसे ?? मेरा वो क्रिसमस वाला तोहफा तो रखा होगा ? एक कॉफ़ी मग पर मैंने तेरे वो सारे बेहतरीन तस्वीरें जो पिछले पांच सालों में संजोया था, डिजाईन से चिपका डाला था, तुम जितनी बार उसे देखोगी हमारा साथ हर बार जी उठेगा | दुसरे मग पर वो सांता क्लॉज़ में मैं और तू….जब तूने रात को बताया कि माँ ने सांता क्लॉज़ के गेटअप में मुझे पहचान लिया तो मैं खूब हँसा था, हम खूब हँसे थे, शायद वो आखिरी बार हम साथ हँसे थे |

अच्छा सच सच बतलाना वो कॉफ़ी मग तुम्हें बहुत खास लगा था या तुम जानती थी कि अब कभी नहीं मिलना है हमें….? तेरे आँखों में नमी थी और कुछ बूंदें टपक कर गालों पर फिसल आया था | कलक्टर हाउस के सामने कितनी आकुलता और बेपरवाही से तूने अपने प्रेमगोश में भींचकर आलिंगन किया था, मुझे तो लगा था कि पुलिस अबकी पकड़कर पक्का थाने ले जाएगी | शुक्र वो ऑटो वाले का जो समय पर पहुँच गया और हम बैठकर भाग निकलें |

वो गोलघर के पास ऑटो में तुमने कितनी बेशर्मी से चूमा था, सबलोग देख रहे थे और वो लड़का कैसे मुझे देख रहा था, और क्या कहा था तुमने जाने दो, कौन सा रोज रोज हमें मिलनेवाला है ये कि इसको याद रहेगा और वैसे भी पूरा चेहरा थोड़ी देखा है | तेरे होठों की उस हठधर्मिता का एहसास आज तक मेरे अधरों पर जी रहा है | ऐसा क्यूँ होता है ख़ुशी कि इश्क में लोग आकुल हो जाते हैं और जुदाई में व्याकुल??

पीएनएम् में हमनें कोई सूप पिया था ना?? शायद…मुझे ठीक से याद नहीं आ रहा है | देख रही हो अब मैं तुम्हें थोड़ा थोड़ा भूलने लगा हूँ | पर मुझे याद है पीएनएम् मॉल की विंडो शॉपिंग और हल्का जलपान के बाद हमलोग पाटलिपुत्रा मैदान में डिजनीलैंड गये थे और तुमने वहाँ कितने गोलगप्पे खाए थे…बाप रे…कैसे तुमने उस दिन उतना गोलगप्पा खा लिया था ?  वो याद है क्या तुम्हें जब तुमने डिज्नीलैंड के पार्किंग में खड़ी बुलेट पर बैठकर फोटो खिंचवाई थी | इश्क में लोग फालतू हो जाते हैं ख़ुशी, कितनी उलजुलूल हरकतें कर लेते हैं |

और शाम में हम फिर साथ साथ बुद्धा पार्क गये थे, रास्ते भर तुम ऑटो में मुझे तंग कि थी, कभी चूमती थी, कभी कंधे पर सर रखकर सोती थी, कभी बाँहों में जकड़ती थी | पूरा ऑटो इश्कमय कर दिया था तुमने | बुद्धा पार्क का भी तो शायद ही कोई कोना छूटा होगा जहाँ तुमनें हमारे प्यार का हस्ताक्षर ना किया हो | शाम को घर जाते वक़्त तुम ऑटो में कितनी बेफिक्री से सो गयी थी, अगर मेरी भी आँख लग जाती तो शायद हम शीतला मंदिर भी जरुर घूम लेते |

और फिर तारीख बदलने से कुछ क्षण पहले तेरा वो कॉल जो हमेशा के लिए मेरी ? या तेरी ? या हमारी जिन्दगी बदल गया |

“गौरव हम अब कभी नहीं मिलेंगे, मैंने राहुल को शादी के लिए हाँ कर दिया है, घर में सबलोग खुश हैं, हमारे सिवा | तू अपना ख्याल रखना | जब तक तू जिन्दा रहेगा, मैं भी जी लूंगी | खुद को संभाल कर रखना | आई लव यू पगले |”

प्यार-व्यार

Posted by on Dec 20, 2016 in Laprek | 0 comments

प्यार-व्यार

“अदना सा तो सपना है आ ऊहो पर हंगामा है । बोलता है संतुष्ट रहो; ईहो कोई बात है, काहे रहें? है ही का हमरे पास, एगो छोटका गो कमरा, एगो अखड़ा खाट आ एगो पड़ोसी का जंगला….गाम में एगो कठही गाड़ी था ऊहो बाबूजी बेच दिए ।” मैं चौधरी जी के दुकान पर प्याज चुनते हुए बड़बड़ाये जा रहा था, ध्यान ही नहीं दिया की पीछे जंगला वाली भी तेल लेने आयी है । वो सब सुन ली थी । नाक-भौंह सिकोड़े हुए चेहरे की भंगिमा बनाकर विष्मय प्रकट की । मैं अपने ही सर पर पीछे से एक हाथ लगाया…’साला ई नौकरी के फ्रस्ट्रेशन में कहीं भी कुछो बक देता हूँ ।’

पाटलिपुत्रा में उसका घर मेरे घर के ठीक सामने था, जंगले के पास उसका स्टडी-टेबल था । मेरा कमरा भी यही था, इसी कमरे में पढ़कर मैंने मैट्रिक से लेकर बीए तक कि परीक्षा एक ही बार में पास की थी, बस ये यूपीएससी का इम्तहान है जो पास नहीं कर पा रहा था | बाबूजी के गुजरने के बाद घर कि जिम्मेदारी आ गयी थी, मुनियाँ को भी पढाना था, माँ गाँव में किसी तरह अकेले घर संभाले हुई थी | बाबूजी के ईलाज में पहले ही सारा खेत बनकी पड़ा हुआ था | जिम्मेदारी कंधे पड़ी तो कमरे के किराये का अहसास हुआ | बड़ी मुश्किल से एक वकील साहब के यहाँ कंप्यूटर ऑपरेटर का नौकरी मिला | आजकल साधारण गरीब ग्रेजुएट को कौन पूछता है | वकील साहब बड़े सनकी थे, मोवक्किलों का गुस्सा मेरे उपर उतारते रहते थे | वो तो भला हो मेरे प्यारे दोस्तों का जो कुछ-कुछ खिला-पिला भी देता था और फिर मेरा दुखड़ा बर्दाश्त भी कर लेता था |

उसके 11 वीं के दिनों से उसके बीबीए के आख़िरी सेमेस्टर तक मैं उसे देखता रहा । कभी कुछ कहने की हिम्मत नहीं हुई । समझती तो सब वो भी थी पर कभी ज्यादा भाव नहीं दिया । कभी-कभी मैं उसके पीछे पीछे भी जाया करता था ।

उसको दिखाने के लिए सब दिन भोरे उठकर छत पर सेंडो गंजी और नाड़ा वाला कच्छ पहनकर 100 बार उठक बैठक करता था, पर वो कसरती बदन को भाव ही नहीं देती थी ।

एकदिन दोस्तों के साथ वकीलबा का फ्रस्ट्रेशन उताड़ने के चक्कर में ‘दस्तखत’ सर चढ़ गया और सब बक दिया, जंगला वाला प्यार का किस्सा भी…। दोस्त तो दोस्त ही होते हैं, ‘दस्तखत’ की टंकी मेरे मुँह में लगा दी और सब कमीने भड़काकर उसके घर भेज दिया ।

होश तो था ही नहीं, पता नही ऐसा क्या बक दिया । पुरे मोहल्ले के लोग जमा हो गए, और मैं बेहोश । साले कमीने दोस्त सटक निकले ।

अब बखेड़ा तो होना ही था | अंजलि कि मम्मी पर उसके पापा चिल्ला रहे थे कि देखो बेटी आवारा हो गयी है, लड़के अब घर आकर तमाशा करते हैं | अंजली रोये जा रही थी | वो सचमुच बेगुनाह थी | अंजलि के पापा वकील साहब को जानते थे, कभी-कभी वकील साहब के यहाँ आते भी थे | उन्होंने उस रात पहचान लिया मुझे, फिर क्या था अगले दिन मेरे ऑफिस पहुँचकर वकीलबा से शिकायत करके उसे ऐसा भड़का दिया कि शाम में वकीलबा ने टर्मिनेशन-लेटर पकड़ाकर विदाई कर दिया । रास्ते भर टेम्पो में रोता रहा । भगवान आसानी से मिल जाते हैं पर नौकरी नहीं मिलती है साहब । अब तो मुझे बाट नहीं सूझ रहा था । मोहल्ले में मुँह लटकाये जा रहा था, अंजलि चौधरी जी के यहां से कुछ राशन लेकर जा रही थी ।

“आई एम् सॉरी अंजलि, मैं नशे में था, माफ़ कर दो, आई लव यू रियली यार, मेरी नौकरी क्यों छीन ली…अब कैसे गाम में बनकी खेत छुड़ाऊँगा, कैसे मुनियाँ को पढ़ाऊंगा, माँ को क्या भेजूंगा…” आँख छलक गये थे ।

अंजलि बिना बोले चली गयी । उस दिन के बाद मैंने अपना जंगला कभी नहीं खोला, पुरे सात दिन तक घर में बंद रहा, खाना मेशवाला उधारी पहुँचा जाता था ।

नौकरी जाने से उतनी तकलीफ़ नहीं होती है, जितना दिल टूटने से होती है ।

वैसे हाल उधर भी कुछ अच्छा नहीं था । लड़कियों के दिल में मोहब्बत का असली एहसास तब होता है जब उसे उसका चाहने वाला इग्नोर करता है । सात दिन से हम दोनों ने एक दूसरे को देखा नहीं था, 8 वें दिन सुबह नहा-धोकर अंजलि की यादों को आखिरी बार बाथरूम में फ्लश करके नौकरी ढूंढ़ने चल दिया ।

किस्मत अच्छी थी, ठीक-ठाक एक नौकरी मिल गयी । कल से ज्वाइन करना था । दोपहर में घर आते हुए अंजलि देख ली थी । उसे जितना अफ़सोस मेरे उस तमाशे से था उससे कहीं ज्यादा अनकही मोहब्बत से बिछुड़ने का था । अक्सर ऐसा होता है कि जब आप किसी को अचानक से तरजीह देना बंद कर देते हैं तो उसे आपकी कमी खलने लगती है | अंजली पिछले 7 दिन में मुझे एक बार भी नहीं देखी थी, और आज मैंने उसे पूरा इगनोर कर दिया था |

“तुम ??”

“आई एम् सॉरी….बस तुमसे सुलह करने आई हूँ, इसका मतलब बिल्कुल भी ये नहीं है कि तुम्हारे लिए मेरे दिल में कुछ भी है ।”

अचानक अपने दरवाजे पर उसको देखकर मैं थोड़ा घबड़ा गया था ।

“हूँ…” मैं सर हिला रहा था ।

“पहली बार तेरे घर आयी हूँ, बैठने भी नहीं बोलोगे?”

“हाँ हाँ आओ…”

घर में सिर्फ एक खाट था, जिसपर सूजनी बिछा हुआ था ।

पुराने भुलाये अरमान हिलोरें लेने लगी थी । लड़ाई-झगड़ा तो कब का भूल गया था । 5 मिनट तक वो खामोश रही फिर उठकर खड़ी हो गयी ।

“ठीक है मैं चलती हूँ, अपना नाम तो बता दो…”

“प्रभु”

अभी दो कदम दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा ही था कि पीछे पलटी और बड़े जोर से गले लगायी, उसकी आँखों में आंसू था ।

“आई लव यू प्रभु”

हम फिर से बिस्तर पर थे, जंगला बंद था, किवाड़ कब बंद हो गया पता नहीं चला ।

मेरे जिस्म की सरहदों पर उसकी उंगलियां कत्थक कर रही थी, टेप रिकार्डर में बज रहे  राग मल्हार के सिवाय कहीं कुछ सुनाई नहीं दे रहा था, अमन कायम करने आयी थी और यहां मेरा सर्जिकल स्ट्राइक कर रही थी ।

मेरे सीने पर उसके नग्न उरुजों का दस्तक और चेहरे पर उसके उनमुक्त और उदंड जुल्फों का रंगीन चादर/पर्दा मदहोश किये जा रहा था, उसकी तपन बर्दाश्त नहीं था । मैं पसीने से तर-बतर था । शिराओं में भारी अकड़न था…साँसे भी फूल रही थी..।

मेरे गर्दन पर उसके लंबे नखों का हस्ताक्षर था और उसके सभी होठों पर मेरे दाँतों का…।

ईश्क का चरमोत्कर्ष था आज ।

“तेरे उत्पात से जो रक्तपात हुआ है, खाओ इस रक्त की कसम और भर दो मेरी मांग मेरी इसी लहू से और बना लो हमेशा के लिए अपना ”

सहसा अंजलि मेरे आँखों में आँखें डालकर बोली । इश्क़ बेपरवाह होता है, उस वक़्त हम भी सभी नियम-कानून, घर-परिवार और सामजिक बंधनों से मुक्त बेपरवाह होकर एक काल्पनिक दुनियां में घर बसा रहे थे ।

 

बीबीए के बाद अंजलि एमबीए करने नोएडा चली गयी, मैंने भी अपना ट्रांसफर नोएडा ले लिया । हमलोग एक फ्लैट लेकर लिव-इन में रहने लगे । ईश्क में जिंदगी इतनी रंगीन हो जाती है कि गुजरते वक़्त का एहसास ही नहीं होता है ।

मेरी भी प्रोन्नति हो गयी थी, आमदनी बढ़ गयी थी, एक बुलेट दरवाजे पर खड़ा रहने लगा था

हम हर संडे सुबह-सुबह बुलेट से नोएडा-ग्रेटर नोएडा एक्सप्रेस हाईवे पर मॉर्निंग वॉक करने निकलते थे । सुबह को अंजलि कुछ ज्यादा ही रोमांटिक रहती थी, जैसे मैं गोधूलि में होता था । उसका कहना था परिदे को भोर पसंद होता है । पर मुझे शाम को हलके अँधेरे में कहीं उसे पीछे से पकड़कर किसी कोने में ले जाना, उसके गर्दनों से उसके होठों तक अपना नाम लिखना पसंद था ।

“परभुआ तेरे बुलेट की आवाज मुझे बहुत पसंद है….तुमने कभी गौर किया है जब तेरे-मेरे बीच कुछ नहीं होता है तो ऐसा ही एक आवाज कमरे में गूँजता है…”

अंजलि को जब मुझपर बहुत प्यार आता था तो वो मुझे प्रभु से परभुआ बना देती थी ।

“वैसे ये तेरा भारी-भरकम बुलेट और मैं 41 किलो की छरहरी छोड़ी… सब देख कर हँसते होंगे”

“41 किलो 600 ग्राम…”

“अपने मेहनत के वजन का देखकर ही हिसाब लगा लेते हो..वैसे सही ही बोले हो…6 महीने में ही 4 नंबर बढ़ गया है ।”

“ये मामूली हाथ नहीं जानेमन, एक पंडित का चाक है, सुराही गढ़ना आता है…”

“या कहीं शर्तिया ईलाज क्लिनिक में कम्पाउंडरी किये हो?”

“बड़ी आवारा लड़की है तू”

“सब प्रभु के सत्संग से कृपा आयी है ”

वक़्त के साथ प्रेम भी जवान होता है और फिर जब 4 घंटे की गुटरगूँ से 24 घंटे का साथ शुरू होता है तो प्रेम थोड़ा-थोड़ा नमकीन होने लगता है । और फिर ये आज का मॉडर्न जमाना जहाँ हर चीज में हिस्सेदारी बराबर की तय होती है, चाहे बर्तन धोने का हो या खाना बनाने का ।

और आज़ादी तो चाहिए ही । वक़्त के साथ हम भी इश्क़ में पुराने हो रहे थे । और फिर 24 घंटे का साथ इश्क को परवान चढ़ा चूका था ।

अंजलि के एमबीए होने के साथ ही हम घरवालों को रुलाकर शादी कर लिए थे । हमारी शादी सुबह के 11 बजे काले कोट वाले पंडित जी करवाये थे । दोपहर 2 बजे हमनें सुहागरात का वक़्त रखा था ।

हम थक गये थे, एहसास एवरेस्ट फतह करने से कुछ कम नहीं था…वो नहाने गयी थी और मैं लूंगी पहने सोफे पर निढाल था…कॉल बेल से मेरे बेसुध बदन में हरकत हुई ।

दरवाजे पर बेवक़्त के मेहमान कन्हैया जी तशरीफ़ लाये थे । इधर अंजलि भी नहाकर रेशमी गाउन में लिपटी बाथरूम से बाहर निकली थी ।

“नमस्ते भाभी….क्या हाल-चाल है?”

“सब बढियाँ छोटका बाबु….आज छुट्टी था तो थोड़ा घर संवार रही थी”

“सच में क्या? ”

“हाँ । तो?”

“नहीं….खंडहर बता रही है ईमारत कुछ देर पहले बुलंद थी…”

“धत्त”

अंजलि लजाकर भन्साघर चाह बनाने चली गयी । कन्हैया पलंग की हालत और घर में बिखड़े वस्त्रों से समय की गाथा का अनुमान कर लिया था ।

आज पूरे 6 साल हो गया है हमारी शादी का । हमनें एक दूसरे को जिंदगी जीने की आजादी दे रखी है । जिंदगी की भागदौड़ और भौतिकता को पाने की आंधी में प्यार अब प्यार-व्यार हो गया है । नमकीन हो रहे इश्क़ को शरबत की तरह रखने को हमने संविधान बना लिया । प्यार करने को नैतिक जिम्मेदारी बना दी और प्यार करने को भी एक रूटीन और नियम में ढाल दिया ।

प्यार तो आज भी वैसा ही दीखता है बस इतना सा बदला है कि आधुनिकता ने मौलिकता को नैतिकता में बदल दिया है ।

 

अधूरा प्रेम

Posted by on Sep 10, 2016 in Laprek | 0 comments

अधूरा प्रेम


कल रात एक कविता लिख रहा था,
“चाँद लिपटा सो रहा

बादलों की चादर में ।

आधी रात बाकी है,

घड़ी भी रूठी है।

आज फिर तेरी याद में रतजगा है ।”
कविता पूरी नहीं हुई, मैं पुराने वक़्त में खो गया । और कमाल तो देखो

आज पूरे 1051 दिन बाद सुबह-सुबह मेरी दुआ कबूल हो गयी ।

“अवि…..हे….कैसे हो?”

“अ… अ…. अ…. तुम….अरे ये तो कमाल हो गया…मैं कल शाम से ही याद कर रहा था…”

“…मुझे मालूम है, हमारा टेलीपैथी अभी भी काम करता है…।”

मेरे शब्द गले में अटक रहे थे, जबान में हकलाहट थी, दोनों गालों पर आंसू के कुछ बूंद छलक आये थे।

“कहाँ रहती हो तुम, क्या करती हो तुम मुझे तो कुछ खबर ही नहीं…सारा ठिकाना जहाँ से मैं तुझे ढूंढ सकता था, तुमने सब बदल दिए….ईमेल का पता बदल गया, नंबर बदल गया, फेसबुक, लिंकडिन सब….क्यों?”

“पर मुझे तो तेरा सब पता है….तेरी हर एक कहानी पढ़ती हूँ…उस दिन तो तुमने हद ही कर दी थी जब हमारी फोटो अपने ब्लॉग पर डाल दी थी….मैं दूर क्या हुई तू सच में बेपरवाह हो गया….तूने तो बड़ा आदमी बनने का वादा किया था….इतने मजबूत थे तुम और इतने कमजोर हो गये….? जब भी तुझे कमजोर देखा तुझे फोन करना चाहा पर सोचा तू कहीं और कमजोर होकर टूट ना जाओ….अच्छा सुनो…तोंद थोड़ा कम करो….अच्छा नही लगता…और ये फुल स्लीव की शर्ट हमेशा क्यों पहनते हो…ऑफिस के बाद टीशर्ट-जीन्स पहन सकते हो….और अब नया घडी लो, मेरी घडी अब पुरानी हो गयी है”

उसे सब याद थे, माँ-पापा-दादीमाँ-भाई सबके बारे में पूछ रही थी । उस एक पल में लग रहा था जैसे हमदोनों को ही सबकुछ मिल गया है, कहीं यह सपना तो नहीं था? सपना भी था तो इससे पहले की यह टूटे हम इतने वर्षों की सारी बातें उसी एक क्षण में बता देना चाहते थे।

“जानती हो सोना….एक दिन मॉल गया था…पहले तल्ले पर एक लड़की पर्स खरीद रही थी, पीछे से बिलकुल तेरी तरह….मेरी तो धड़कने तेज हो गयी थी, हिम्मत ही नहीं हो रहा था कि सामने से देखूं । मेरे एक दोस्त ने उसके पास जाकर मुझे पुकारा, पर वो मुड़कर नहीं देखी…फिर मुझे यकीन हुआ कि तुम नहीं हो । जानती हो कई बार घर से अकेले छुटियों के दिन तेरे घर के रास्ते में ऑटो से रास्ता नापा करता था कि कहीं तुम दिख जाओ एक बार….”

“अब तो भूल जाओ अवि…”

“अच्छा मुझे वो भूलने को कह रही है जो हर दिन मुझे गूगल में ढूँढती है”

“बिल्कुल भी नहीं बदले तुम”

“मिलोगी नही? यहां हो तो एक दिन मिलो…शक्ल तो दिखा दो।”

“नही अवि, बड़ी मुश्किल से खुद को सँभाली हूँ खुद से, मिलने पर ना तूम खुद को रोक पाओगे, ना मैं रोक पाऊँगी ।”

फ़ोन कट गया । बड़ी कोशिस की, दुबारा लगा नही ।

इतने दिनों में मैंने कभी उसे ढूँढने की कोशिस नहीं की, मुझे डर था कि कहीं मेरी ये नादानी उसके जीवन में परेशानी ना पैदा कर दे। उसका अतीत उससे दूर रहे यही कोशिस की । पर इश्क का सजा देखो, हम भी उसके बिना उसको साथ लेकर जीते हैं और वो भी ।
अब इस इश्क को क्या कहेंगे? इश्क़ में भरचुअल होना ??

TRUE LOVE NEVER DIES.

इश्क में नौटंकी‬

Posted by on Jun 13, 2016 in Laprek | 0 comments

इश्क में नौटंकी‬

“तेरी धमनियों में मेरे ही नाम का द्रव बह रहा है अंजलि, यकीन ना हो तो अपने लहू का लिटमस टेस्ट करवा के देख”
“अब इसका क्या मतलब?? ये फिर से कौन सी कह्मुकरी है कृष्णा?“
“तुझे तो हमेशा ही मेरा प्यार झूठा लगता है….खैर रहने दे…तू नहीं समझेगी कंभी….जब मैं नही रहूंगा तो याद आएगा”
“ओहो….आई लव यू ना क…क…क…क…कृष्णा….”
“हुँह…फर्जी…………..”
“मेरा छोना बाबू रूठ गया….आजा एक सेल्फी लेते हैं…चोंच निकाल…”
“♥ ♥”

ख़जूर

Posted by on May 17, 2016 in Laprek | 0 comments

ख़जूर

सूरज डूबने को है और उगते चाँद को बदरी लील गया है। शाम अंधेरी रात सी गहरा गयी है। हवाओं का रूख भी काफ़ी वहशी है। घनघोर गर्जनाओं और कड़क बिजली के संग बारिश की संभावना है।
फ़ल से लदे ख़जूर के पेड़ झूल रहे हैं, ऐसा लग रहा जैसे मानो कोई स्त्री अपने छठे-सातवें महीने में हो, क़मर पर बेटी को धरे जिसके बाल हवा में उड़ रहे हों और वो खिलखिला रही हो, माथे पर गेहूँ का बोझ संभाले खेत की मेड़ पर दौड़ी भागी जा रही हो कि जल्दी घर पहुंचना है, आंगन में सूखती अरहर भींग ना जाए। उसकी गेरुवा साड़ी लहरा रही है।
मैं खिड़की से ख़जूर को ताक रहा था, बारिश शुरु हो गयी थी। कमरे में टंगा कलेंडर खट-खट दीवाल पर सर पटक रहा था, बिन बिजली के पंखे घूम रहे थे, बारिश की बूँदें मुझे भींगा रही थी, पर मैं हवाओं की मनमानी में बेपर्द हो रहे ख़जूर के यौवन, उसके उरोज़ों को निहारने में मशगूल था।
सामने छत से कोई हाथ हिला रही थी, भक् टूटा…
“क्या है? कौन हो तुम? कितनी बेशर्मी से मुस्कुरा रहे हो…।”
वो सामने वाली छत पर अधकटी ब्लाउज पहने छत पर गेहूँ समेट रही थी, साड़ी में पिन शायद नहीं लगा था, ब्लाउज का एक हूक टूटा हुआ था, आंधी में पल्लू बार-बार कंधे से गिर जा रहा था, खुली लटें परेशान कर रही थी ।
“जी… जी.. नहीं…. मैं आपको नहीं देख रहा था, मैं.. मेरा मतलब मैं उस झूलते ख़जूर को देख रहा था ।”
वो पता नहीं क्या समझी,
“धत्..”
हसीं और शरमाकर नीचें भाग गयी। मैं भी जल्दी से खिड़की बंद किया और मोमबत्ती जलाकर बाबा नागार्जुन की बाबा बटेसरनाथ पढ़ने लगा।

पिजड़े में सुग्गा

Posted by on May 12, 2016 in Laprek | 0 comments

पिजड़े में सुग्गा

“बेपरवाह क्या हुए, पहले से ज्यादा रोमांटिक हो गये हो अरूण। इस जिंदा-दिली का राज क्या है?”
“कुछ नहीं प्रिया, पिजड़े में सुग्गा मीठा बोलती है, अंडा नहीं देती ना !”

 

 

आज़ादी जिन्दगी है

फॉस्फोरस

Posted by on May 10, 2016 in Laprek | 0 comments

फॉस्फोरस

एक बार एक गणित को रसायन से इश्क़ हो गया । बात बढ़ी तो पासपोर्ट बना, वीजा/वीसा मंगवाया….मुलाकातें हुई…मुक्कालातें हुई …। गंधयुक्त वीकर में कुछ प्रयोग हुआ, कुछ हलचल हुआ ।
एक मिसाइल संतति उत्पन्न हुआ ।
अब रोपा पेड़ बबूल का तो नीम कहां ते होई ! मिसाइल अभी से फॉस्फोरस मूतते चलता है । जिप खुली और आग बरसा ।

 

खोखली आधारहीन आधुनिकता क्यों ?

 

देहाती-गवाँर

Posted by on May 8, 2016 in Laprek | 1 comment

गांव की गोरी, “बड़े खच्चर हो तुम…”
शहर की छोड़ी, “अच्छा, मैं नमकीन हूँ? चल हट्….कमीना कहीं का…”
पटना यूनिवर्सिटी की एक हिंदी स्नातक की छात्रा, “…ओए लप्रेक्‬ समझा है क्या? पूरी उपन्यास‬ हूँ मै….”

हमारे मित्र कल से आज तक, “तुम देहाती-गवाँर लोग हमेशा आउटडेटेड ही रहोगे…”

साहब श्री कृष्ण हैं, तीनों गोपियां साहब के इश्क़ में आज दीवानी है ।

हमारी जिन्दगी…हमारी पसंद

Posted by on Apr 7, 2016 in Laprek | 0 comments

हमारी जिन्दगी…हमारी पसंद

उस दिन मोना सिनेमा के पास कार पार्क करके मैं और आशीष अंटाघाट सब्जी खरीदने गये थे | वापस आया तो देखा हमारी आल्टो के पीछे एक होंडा सिटी खड़ी थी | एक स्मार्ट सा नौजवान शायद सॉफ्टवेयर इंजिनीयर होगा, ड्राइविंग सीट पर बैठा एक-डेढ़ साल के एक बच्चे को हँसाने में लगा था |

‘ठक-ठक’

शीशा नीचें हुआ |

“भाई साहब, गाड़ी थोड़ी पीछे कर लेते तो मैं अपनी गाड़ी निकाल लेता ?”

“जरुर, आप थोड़ा मेरे बच्चे को लेकर आगे बैठ जाइये, मैं गाड़ी पीछे कर लेता हूँ, यह रो रहा था तो दीपा इसके लिए आइसक्रीम लाने गयी है “

“हाँ…हाँ..क्यों नहीं !”

दीपा? नाम तो जान-पहचाना लग रहा था | मैं होंडा सिटी की अगली सीट पर बैठ गया |

“ये सूसू तो नहीं करेगा मेरी गोद में ?”

“हा..हा..हा…”

“बड़ा प्यारा है आपका बेटा, मैं बचपन में इसी की तरह गोल-मटोल क्यूट सा था “

बच्चा मेरी गोद में काफी खुश था, अचानक हँसते हुए उछलने लगा | उसे सामने सड़क पर अपनी मम्मी दिख रही थी | मैंने दीपा को देखा, धड़कने पुराने बुलेट की तरह फक्फकाने लगी थी |

“हाय”

“हेल्लो…परेशान तो नही किया अवनीश”

“अवनीश?”

“हाँ इसका नाम अवनीश है“ “अवनीश अंकल को बाय करो”

दोनों बाय करते हुए चले गये पर मैं वक़्त से दो साल पीछे था, वहीं खड़ा अतीत में खोया |

“ओय…घर चलना है या होंडा सिटी का पीछा करना है?”

“चलो आशीष, आज ओएसिस चलते हैं ”

“अभी??”

“हाँ अभी…हमारी जिन्दगी…हमारी पसंद”