Khissa

यादों के झरोखे से पुरानी डायरी का एक पन्ना

Posted by on Apr 7, 2016 in Laprek | 0 comments

यादों के झरोखे से पुरानी डायरी का एक पन्ना

यादों के झरोखे से पुरानी डायरी का एक पन्ना

इश्क में अक्सर लोग बदल जाते हैं, आदतें बदल जाती है, पसंद-नापसंद बदल जाता है |

हमें खाने के बाद सौंफ पसंद था और उन्हें मिश्री | पर रेस्टुरेंट से निकलते वक़्त अक्सर एक-दुसरे को अपना प्यार जताने के लिए मैं मिश्री खा लेता था और वो सौंफ खा लेती थी |

कल रात दोस्तों के साथ एक रेस्टुरेंट में खाना खा रहा था | चलते समय मैंने मिश्री उठाई तो दोस्तों को थोड़ी हैरानी हुई |

“तुम मिश्री कब से…?”

“भाई अभी तो विरह के ८३३ दिन ही हुए हैं, इतनी जल्दी आदत कहाँ छूटती है…!!”

सब खामोश, गहरा सन्नाटा और इस सन्नाटे में पटना के ट्राफिक की आवाज़ भी गुम हो गयी |

बाबूजी ठीक कहते हैं- ‘मिलन अंत है सुखद प्रेम का और विरह जीवन का…’  |

गुलाबो और यक्ष प्रश्न

Posted by on Mar 3, 2016 in Laprek | 0 comments

गुलाबो और यक्ष प्रश्न

“बाबा एक यक्ष प्रश्न लेकर आई हूँ….”

“बोलो गुलाबो”

“ये बसंत के आगमन होते ही वातावरण इतना रोमांटिक क्यों हो जाता है? मेरे वात्सल्य मन में प्रेम बरसाती मेघ की तरह उमड़ने-घुमड़ने लगता है, नाक-कान-आँख-ह्रदय सब प्रेम रस पान को व्याकुल हो जाता है ”

“ये ऋतुराज हैं गुलाबो…..इनके मादक राज में तो विश्वामित्र भी अपनी हठ नहीं संभाल पाये थे…”

“और बाबा आप?”

“गुलाबो, मैं गंधर्व गृहस्थ संत हूँ….घर प्रवासी पंछी की तरह बसते-उजड़ते रहता है”

“’बाबा ?”

“गुलाबो कल चन्द्रनाथ बाबू के घर गया था, देखा एक कन्या छत पर कपड़े टांग रही है, बस मुझे पीठ दिखाई दिया और दोनों कन्धों के बीच गर्दन के नीचे पीठ की गहराई पर नज़र अटकी सी थी…तभी.”

चन्द्रनाथ बाबू आवाज़ दिए “आँगन में कोई है? शकुंतला एक चाय लाना बेटा, बाबा दुष्यंत आये हैं”

“शकुंतला जब चाय की गर्म प्याला अपने नरम हाथों में संभाले मुझे थमाई, अपनी हाथों की उंगलियों पर उसके स्पर्श की अनुभूति हुई, उनकी-मेरी पुतलियों के बीच १८० डिग्री का एक कोण बना, मुस्कुराते हुए अपने गीले बालों को एक झटके में उसने अपने गालों से जुदा कर दिया…मेरे तो रोम रोम में अग्नि का स्फुलिंग स्फुरित होने लगा….दिल ने तय कर लिया की चाहे आज हमारी चिता को मुखाग्नि चन्द्रनाथ बाबू ही क्यों न दें… पर…”

“’पर’ क्या बाबा ?“

“बस गुलाबो तुम्हारा ख्याल आ गया और….”

“सच बाबा ?”

“हाँ गुलाबो, मुझ विश्वामित्र की तुम ही मेनका हो, बस एक बार समय पर आ जाओ कि अपनी तपस्या मैं भी भंग करूं”

“बाबा…..”

“गुलाबो निसंतान को मोक्ष नहीं मिलता है |”

शादी का सिग्नल

Posted by on Mar 1, 2016 in Laprek | 0 comments

शादी का सिग्नल

“अजी सुनती हो………….?”

“अब क्या हुआ? सुबह-सुबह गला क्यों फाड़ रहे हैं?”

“तुम्हारा लाडला व्हाट्सएप्प किया है…”

“क्या लिखा है?”

“बाबूजी…कल रात फिर से कांड हो गया….शाम में ही आँख लग गयी और बिना खाना खाए ही सो गया…बाबूजी ये सब हमेशा आपके कारण होता है…आप लड़कियों से दोस्ती से मना करते हो ना…! काश मेरी भी एक गर्लफ्रेंड होती…!! कम से कम ९ बजे रात को मिस्काल देती फिर बात होती- ‘बेबी डिनर हो गया ? मेरा बाबु सो गया था क्या? उठ जा ना बेबी…रात को खाली पेट नहीं सोते…एक चिड़िया के बराबर मांस कम हो जाता है…उठ जाओ न सोना प्लीज…थोडा सा ही खा लो…’ पर बाबूजी बेपरवाह किस्मत…तन्हाई में अक्सर अस्मत लूट लेती है…नींद भी फिरकी ले लेता है….बुरे दिन आ गये हैं…मोदी अंकल भी झूठ बोल गये की अच्छा दिन आएगा…”

“चिंटू के पापा, आपका बेटा शायराना हो गया है…”

“मेरा बेटा है….रग-रंग में प्रेम भरा हुआ है….बिना लड़की दोस्त के भी इतना सटीक कल्पना किया है….खैर छोड़ो…. मोहब्बत की गहराई आप क्या जानो चिंटू की मम्मी….शब्द संबोधन और एहसास सब अलंकृत हो जाता है…”

“नालायक है आपका बेटा….कल फिर लिखेगा- ‘बाबूजी कांड हो गया फिर से..बिस्तर पर सूसू हो गया..’. शुक्र है बाथरूम से आकर आवाज़ नही लगाता है.-‘मम्मी…….धो दो….या मैं पैंट पहन लूं’..“

“तुम ही बिगाड़ी हो…”

“आप पर गया है, पतलून की नाड़ भी नहीं बाँधने आता है”

“हूंह”

“अब मेरा मुँह क्या ताक़ रहे हैं….बेटा शादी का सिग्नल दे रहा है…कुछ भी खुद से नही कर सकता…पंडित जी को फ़ोन करिये….लड़की ढूंढिए”

“भक्क, अभी बच्चा है”

“चिंटू के पापा उसकी उमर में मेरे दो बच्चे थे….जाइये….इस घर मैं ही एक मर्द हूँ…सारा काम मुझे ही करना पड़ता है….”

“तुम तो दिल पर ले लेती हो चिंटू की मम्मी….मैं इमोशनल हो जाता हूँ ना..”

पंडित जी को फ़ोन- ‘ट्रिन..ट्रिन…”

“हेल्लो”

 

डैशिंग लड़का

Posted by on Feb 14, 2016 in Laprek | 0 comments

डैशिंग लड़का

“कितना डैशिंग लड़का है विवेक…बिल्कुल शाहरुख़ खान लगता है…क्या स्टाइल से टशन में चलता है, और उसके चश्मे तो कसम से कमाल लगता है, जब भी मेरे घर आता है, मैं डीडीएलजे की काजोल सी छुपने लगती हूँ….और नॉलेज तो पूछो ही मत, कुछ भी पूछो उसे सब पता होता है”

“मुझे जलन हो रही है रश्मि”

“अरे…इसमें जलने की क्या बात है…वो तुमसे बहुत अलग है…सच कहूँ तो सबसे अलग…एकदम यूनिक और मस्त…इतनी गर्मजोशी से मुस्कुरा कर मिलता है जैसे वीर अपनी ज़ारा से मिल रहा है…उसका कॉलर ट्यून भी..’…मुझको तू मिला है जैसे बंजारे को घर..विवेक को कॉल करने के लिए धन्यवाद…’ मैं तो उसकी फ़ोन उठाने से पहले ही पागल हो जाती हूँ राजेश”

“बंद कर ये फ़िल्मी नाटक रश्मि…ऐसा क्या है उसमे जो मुझमे नही है…तुम्हे उससे कहीं ज्यादा मैं खुश रख सकता हूँ रश्मि..”

“यार राजेश यही तो तेरी प्रॉब्लम है, विवेक कभी ऐसा बोलता ही नही…कहता है आईफोन माइक्रोमेक्स के बारे में नही सोचता…”

“तुम पागल हो गयी हो रश्मि”

“नही राजेश उसमे बात है यार…कल तो मेरा चेहरा स्कार्फ़ से ढंका था फिर भी ऑटो में पहचान लिया था…बोला रश्मि ये इंस्पेक्टर स्टील का फैन है….आँखें नहीं ये सोनी के स्पेशल कैमरे हैं…”

“मैं जा रहा हूँ रश्मि”

“राजेश तुमतो मेरे अच्छे दोस्त हो ना…नाराज क्यों हो गये….मुझे लगता है शायद मुझे विवेक से प्यार हो गया है राजेश….”

गुप्तगू

Posted by on Feb 3, 2016 in Laprek | 0 comments

गुप्तगू

मैं सब देखता हूँ तुम दोनों मकई के खेत में सरसों की आड़ लेकर क्या गुप्तगू करते रहते हो….कभी आम के पेड़ पर, कभी अरहर में छुपकर….कल तो तुमने हद ही कर दी थी जब तुम गन्ने के खेत में आशिकी फरमा रहे थे….माना मैं सड़क किनारे खड़ा होकर गेहूँ की रखवाली कर रहा…पर मेरी नज़र बहुत तेज है, सब देख लेता हूँ मैं….वैसे उसके बालों जो सरसों के कुछ फूल उलझे से थे और वो खिलखिलाती हुई मेड पर दौरते हुए हाथों को फैलाये संतुलन बना रही थी… बड़ी अच्छी लग रही थी… जैसे चाँद सितारों के बीच मुस्कुरा रहा हो…कुछ गुनगुना रहा हो…दिल हल्दी-हल्दी हो गया |

तेरी याद

Posted by on Dec 25, 2015 in Laprek | 0 comments

तेरी याद

 

मैं आज भी तेरी याद में अक्सर जब तन्हा होता हूँ, रो लेता हूँ | कभी तेरी कोई तस्वीर किसी पुरानी किताब में मिल जाती है, कभी पुराने बक्से में तेरी चिट्टी, कभी तेरा कोई तोहफा मिल जाता है, सोचता हूँ कितना अच्छा वक़्त था वो………….कभी सोचा ही नही था की तुम्हारे बिना भी जिन्दगी होगी…………कहाँ चली गयी तुम? क्यों चली गयी तुम? मैं तो आज भी वही हूँ, वैसा ही हूँ……..वही खड़ा हूँ जहाँ तू छोड़कर गयी थी….वो साथ गुजारे हर एक पल आज भी एक ख्वाब से लगते हैं मुझे…..वो रात रात भर तुझे सुनना…तेरी मुस्कुराहटें……मुझे देखते ही तेरे चेहरे की वो खिलखिलाहट….वो दौड़कर मुझसे लिपट जाना…..सब कल की ही तो बातें हैं….
बेपरवाह तो मैं था, तुझे तो फिकर थी…फिर कभी आती क्यूँ नही ? आज भी वही मेरा ठिकाना है, वही पुराना फ़ोन और वही नंबर है, वही ईमेल, वही सोशल प्रोफाइल है…..कभी तो आवाज दो….कितने साल गुजर गये…..तेरी आवाज आज भी नही भूला हूँ…एक बार फिर से आवाज दो ना…..तेरी यादों को कैसे संभालूँ मैं ? जिन्दा हूँ पर जिन्दगी नहीं है, बंदा हूँ बंदगी नही है, ना मेरे लिए खुदा है न इबादत है, अधूरी आवारगी है और तिजारत है….दीवाना तेरा आज भी जब आईने में देखता है, अपनी नज़र में तेरी अक्स देखता है, फिर पूछता है- कैसी दिल्लगी थी? ये कैसी दिल्लगी है? मुझे तो तुझे सच्ची मुच्ची का इश्क हो गया रे…………………..
“दिले नादान से मत पूछो मोहब्बत ने क्या कहर ढायी है….
‘बेपरवाह’ दीवाने की ताउम्र अब रुसवाई है…”

हल्कू

Posted by on Nov 21, 2015 in Laprek | 0 comments

हल्कू

 

हल्कू मेरे जैसा ही रहा होगा ! आम जिन्दगी में कुछ भी नही बदला है, सिर्फ वक़्त और तारीख़ बदला है | वो दौर प्रेमचंद का था जहाँ पूस की सर्द रात में कपकपाती हाड़ लेकर कोई एक कुत्ते के सहारे मचान के नीचें राख़ पर रात गुज़ार लेता था | आज का दौर चेतन भगत का है, मौसम फ़िल्मी हो गया है, कहीं रातें रंगीन है कहीं बेपरवाह वाहिद खेतों-खलिहानों में अघहन की अमावस्या में इजोत ढूंढ रहा है |

जिन्दगी का रंगमंच

Posted by on Oct 25, 2015 in Laprek | 0 comments

जिन्दगी का रंगमंच

 

आज 27 के हो गये हम | विधाता लिखित नाट्य को जिन्दगी के इस रंगमंच पर मैं पिछले 9861 दिनों से अभिनय कर रहा हूँ….236664 घंटे हो गये हैं….समय के साथ अभिनय में संजीदगी बढती जा रही है….दर्शक बढ़ रहे हैं…श्रोता बढ़ रहे हैं….अभिनेता-अभिनेत्री बढ़ रहे हैं…..पर्दा गिरने और उठने में पूरा 24 घंटे का एक निश्चित समय लग जाता है…| हिंदी धारावाहिक की तरह समय समय पर किरदार बदल जाते हैं….कभी मुर्दा हो चुकी यादें पुनः जीवित होकर अधर पटल पर मुस्कान बनकर लौट आती है, कभी आह बनकर दोनों चक्षुओं से प्रवाहित होती है | पर हम तो बेपरवाह कलाकार हैं, अपना किरदार जी रहे हैं….अंत की ना तो कोई चिंता है ना परवाह…बस अपने किरदार को ऐसे जीना है की अगर हमारा पात्र छोटा भी तो आपके मानस पटल पर एक छाप हमारा भी हो…|