जवानी  Sep07

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जवानी 

​माथे की नस दुख जाती है

जवानी की गुत्थियाँ सुलझाने में ।

वो बचपन की मौज कहाँ अब,

गांव की पगडंडी और खेत की हरियाली

दोपहरिया का कच्चा आम-अमरुद,

और पोखर-भिंड पर गाछी में कंचे का खेल !

यहां अब राह पथरीली है,

कभी गर्द है, कभी सर्द है,

कभी लू में झुलसा देह का दर्द है ।

यहां अब वक़्त गुजर जाता है,

खुद को फुसलाने में…।

माथे की नस दुख जाती है,

जवानी की गुत्थियाँ सुलझाने में ।।

(First Draft)

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