हमारी जिन्दगी…हमारी पसंद Apr07

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हमारी जिन्दगी…हमारी पसंद

उस दिन मोना सिनेमा के पास कार पार्क करके मैं और आशीष अंटाघाट सब्जी खरीदने गये थे | वापस आया तो देखा हमारी आल्टो के पीछे एक होंडा सिटी खड़ी थी | एक स्मार्ट सा नौजवान शायद सॉफ्टवेयर इंजिनीयर होगा, ड्राइविंग सीट पर बैठा एक-डेढ़ साल के एक बच्चे को हँसाने में लगा था |

‘ठक-ठक’

शीशा नीचें हुआ |

“भाई साहब, गाड़ी थोड़ी पीछे कर लेते तो मैं अपनी गाड़ी निकाल लेता ?”

“जरुर, आप थोड़ा मेरे बच्चे को लेकर आगे बैठ जाइये, मैं गाड़ी पीछे कर लेता हूँ, यह रो रहा था तो दीपा इसके लिए आइसक्रीम लाने गयी है “

“हाँ…हाँ..क्यों नहीं !”

दीपा? नाम तो जान-पहचाना लग रहा था | मैं होंडा सिटी की अगली सीट पर बैठ गया |

“ये सूसू तो नहीं करेगा मेरी गोद में ?”

“हा..हा..हा…”

“बड़ा प्यारा है आपका बेटा, मैं बचपन में इसी की तरह गोल-मटोल क्यूट सा था “

बच्चा मेरी गोद में काफी खुश था, अचानक हँसते हुए उछलने लगा | उसे सामने सड़क पर अपनी मम्मी दिख रही थी | मैंने दीपा को देखा, धड़कने पुराने बुलेट की तरह फक्फकाने लगी थी |

“हाय”

“हेल्लो…परेशान तो नही किया अवनीश”

“अवनीश?”

“हाँ इसका नाम अवनीश है“ “अवनीश अंकल को बाय करो”

दोनों बाय करते हुए चले गये पर मैं वक़्त से दो साल पीछे था, वहीं खड़ा अतीत में खोया |

“ओय…घर चलना है या होंडा सिटी का पीछा करना है?”

“चलो आशीष, आज ओएसिस चलते हैं ”

“अभी??”

“हाँ अभी…हमारी जिन्दगी…हमारी पसंद”