हे मानव ! तुम इतने विचित्र क्यों हो? Mar16

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हे मानव ! तुम इतने विचित्र क्यों हो?

खलिहान से लाइव

“मैं कई दशकों ये यहाँ खड़ा हूँ…सामने की गाँव की कई पुश्तों को मैंने राख होते देखा है…पिछले पांच दशक से मैं इस बाट से गुजरने वाले हर पथिक से पूछता हूँ- ‘हे मानव ! तुम इतने विचित्र क्यों हो?’”

मैं पुराने ‘नन्हे सम्राट’ के शहजादा सलीम की तरह स्तब्ध महुआ की बातों को सुन रहा था | मुझे उस वृक्ष में कोई शापित राजकुमार दिख रहा था जो अब काफी बूढ़ा हो चुका है फिर भी अपनी झुकी कमर को सीधा कर अपने दोनों हाथों को पूरी ताकत से चमकाते हुए हर आने-जाने वाले को आवाज दे रहा है…पर कोई उसकी फ़रियाद सुनने को तैयार नही है | शायद बरसों बाद आज उसे कोई सुननेवाला मिला था, आज महुआ बेबाक था-

“यहाँ कभी हमारी वस्ती हमारा गाँव हुआ करता था, तुम्हारे पुरखों से सब उजाड़ डाला | मेरी बस्ती में अपनी गृहस्थी सजाने वाले सीधे-साधे बाघ-चीते-भालू-हिरन सब को तुम्हारे पुरखा खा गये या भगा दिए | मैं अकेला यहाँ बच गया | दुसरे टोले का एक बरगद और पीपल बचा हुआ है |”

मैं बस इतना कहा की मैं शर्मिंदा हूँ |

“तुम क्या शर्मिंदा होगे, तुम तो वो दुष्ट प्रजाति के प्राणी हो जो अपने स्वार्थ मात्र के लिए सम्पूर्ण पृथ्वी को आज जलमग्न कर नामोनिशान मिटाने को अग्रसर है | अरे मूर्ख ! हमारा पूरा समाज ही तुम्हारी खातिर को जी रहा है, अभी भी वक़्त है संभल जाओ, गमले से घर सजते हैं, इसके भरोसे कल सांस नहीं ले पाओगे…|”

महुआ काफी थका-थका सा लग रहा था, हल्की-हल्की बूंदा-बूंदी शुरू हो गयी थी | वो प्यासा था, आँखें बंद कर प्यास बुझाने लगा और मैं उसकी बंद पलकों के नीचें से दबे पाव भाग आया |