अधूरा प्रेम Sep10

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अधूरा प्रेम


कल रात एक कविता लिख रहा था,
“चाँद लिपटा सो रहा

बादलों की चादर में ।

आधी रात बाकी है,

घड़ी भी रूठी है।

आज फिर तेरी याद में रतजगा है ।”
कविता पूरी नहीं हुई, मैं पुराने वक़्त में खो गया । और कमाल तो देखो

आज पूरे 1051 दिन बाद सुबह-सुबह मेरी दुआ कबूल हो गयी ।

“अवि…..हे….कैसे हो?”

“अ… अ…. अ…. तुम….अरे ये तो कमाल हो गया…मैं कल शाम से ही याद कर रहा था…”

“…मुझे मालूम है, हमारा टेलीपैथी अभी भी काम करता है…।”

मेरे शब्द गले में अटक रहे थे, जबान में हकलाहट थी, दोनों गालों पर आंसू के कुछ बूंद छलक आये थे।

“कहाँ रहती हो तुम, क्या करती हो तुम मुझे तो कुछ खबर ही नहीं…सारा ठिकाना जहाँ से मैं तुझे ढूंढ सकता था, तुमने सब बदल दिए….ईमेल का पता बदल गया, नंबर बदल गया, फेसबुक, लिंकडिन सब….क्यों?”

“पर मुझे तो तेरा सब पता है….तेरी हर एक कहानी पढ़ती हूँ…उस दिन तो तुमने हद ही कर दी थी जब हमारी फोटो अपने ब्लॉग पर डाल दी थी….मैं दूर क्या हुई तू सच में बेपरवाह हो गया….तूने तो बड़ा आदमी बनने का वादा किया था….इतने मजबूत थे तुम और इतने कमजोर हो गये….? जब भी तुझे कमजोर देखा तुझे फोन करना चाहा पर सोचा तू कहीं और कमजोर होकर टूट ना जाओ….अच्छा सुनो…तोंद थोड़ा कम करो….अच्छा नही लगता…और ये फुल स्लीव की शर्ट हमेशा क्यों पहनते हो…ऑफिस के बाद टीशर्ट-जीन्स पहन सकते हो….और अब नया घडी लो, मेरी घडी अब पुरानी हो गयी है”

उसे सब याद थे, माँ-पापा-दादीमाँ-भाई सबके बारे में पूछ रही थी । उस एक पल में लग रहा था जैसे हमदोनों को ही सबकुछ मिल गया है, कहीं यह सपना तो नहीं था? सपना भी था तो इससे पहले की यह टूटे हम इतने वर्षों की सारी बातें उसी एक क्षण में बता देना चाहते थे।

“जानती हो सोना….एक दिन मॉल गया था…पहले तल्ले पर एक लड़की पर्स खरीद रही थी, पीछे से बिलकुल तेरी तरह….मेरी तो धड़कने तेज हो गयी थी, हिम्मत ही नहीं हो रहा था कि सामने से देखूं । मेरे एक दोस्त ने उसके पास जाकर मुझे पुकारा, पर वो मुड़कर नहीं देखी…फिर मुझे यकीन हुआ कि तुम नहीं हो । जानती हो कई बार घर से अकेले छुटियों के दिन तेरे घर के रास्ते में ऑटो से रास्ता नापा करता था कि कहीं तुम दिख जाओ एक बार….”

“अब तो भूल जाओ अवि…”

“अच्छा मुझे वो भूलने को कह रही है जो हर दिन मुझे गूगल में ढूँढती है”

“बिल्कुल भी नहीं बदले तुम”

“मिलोगी नही? यहां हो तो एक दिन मिलो…शक्ल तो दिखा दो।”

“नही अवि, बड़ी मुश्किल से खुद को सँभाली हूँ खुद से, मिलने पर ना तूम खुद को रोक पाओगे, ना मैं रोक पाऊँगी ।”

फ़ोन कट गया । बड़ी कोशिस की, दुबारा लगा नही ।

इतने दिनों में मैंने कभी उसे ढूँढने की कोशिस नहीं की, मुझे डर था कि कहीं मेरी ये नादानी उसके जीवन में परेशानी ना पैदा कर दे। उसका अतीत उससे दूर रहे यही कोशिस की । पर इश्क का सजा देखो, हम भी उसके बिना उसको साथ लेकर जीते हैं और वो भी ।
अब इस इश्क को क्या कहेंगे? इश्क़ में भरचुअल होना ??

TRUE LOVE NEVER DIES.