ग्लोबल शेपर्स कम्युनिटी के क्यूरेटर्स के वार्षिक बैठक

यूरोप ख़ूबसूरत है और यूरोपियन और भी ज्यादा | मेरे इस तजुर्बे का पहला पडाव था जिनेवा | पटना से दिल्ली, दिल्ली से जेद्दा और जेद्दा से जिनेवा | अवसर था वर्ल्ड इकनोमिक फोरम के ग्लोबल शेपर्स कम्युनिटी के क्यूरेटर्स के वार्षिक बैठक का | कई सवाल थे, झिझक थी, अनजानेपन का डर था, मैं गाँव का छोड़ा और यह युरोप का शहर, घंटों अंग्रेजी बतियाने वाले लोग…. | जब हवाईअड्डे से कदम निकाला तो भीड़ में मैं ही सिर्फ अकेला था | कई भाषाओं में लोग बतिया रहे थे और मैं हिंदी को तरस रहा था | होटल जाने के लिए १० नंबर की बस मिलेगी बस इतनी ही सूचना मैं पिछले एक घंटे में जमा कर पाया था | टिकट काटने के लिए एक मशीन थी और उसमे भाषा फ्रेन्च या शायद जर्मन | यहाँ स्विट्ज़रलैंड में बहुत सी भाषाएं है….जिनेवा के तरफ फ्रेन्च का प्रचलन है तो ज्यूरिक के तरफ जर्मन | कुछ देर काफी परेशान रहा, कोई मदद करनेवाला दिख नहीं रहा था, अंदाजे से ३ यूरो का एक जिनेवा का टिकट लिया | मशीन में टिकट काटना मेरे लिए यूरोप जितने जैसा था | उपर बस स्टॉप पर पहुँचा तो ५ शेपर्स और खड़े थे, हम फेसबुक पर तो सबसे जुड़े थे पर ना तो कभी किसी से मिले थे ना किसी की फेसबुक वाली शक्ल याद थी |

“शेपर्स…”

एक ने पूछा, परिचय हुआ और अचानक से जैसे लगा कि अपना परिवार मिल गया | पूरी दुनियाँ में हमारा अपना एक समाज है, अपना एक समुदाय है जो एक बेहतर ब्रह्मांड के निर्माण को समर्पित हैं, हम इन्हें ग्लोबल शेपर्स कम्युनिटी कहते हैं | बिहार के हमारे पटना हब में भी बहुत से शेपर्स हैं | प्रत्येक वर्ष हब में नये नेत्रित्वकर्ता का चुनाव होता है और फिर अगस्त महीने में पूरी दुनियाँ के इन नेत्रित्वकर्ताओं को वर्ल्ड इकनोमिक फोरम जिनेवा में ४ दिन के बुलाकर प्रशिक्षित करती है |

१० नंबर की बस आयी और हम ६ बस में चढ़ गये, होटल पहुँचते ही हम ६ से ६० हो गये और फिर कब कितने सैकड़ा पार कर गये पता ही नहीं चला | पहला दिन हमारा कार्यक्रम वर्ल्ड ट्रेड आर्गेनाइजेशन में था, वर्ल्ड इकॉनोमिक फोरम के संस्थापक प्रोफ़ेसर स्वाब को सुनने का सौभाग्य मिला | मनोबल बढ़ा | हमें ५-५ के समूहों में बाँट दिया गया, अब ये पांच मेरे अपने परिवार थे जिनके साथ मुझे अगले ४ दिन रहना था | शाम को बस पुनः होटल पहुँचा दिया | कमरे में गर्मी लग रही थी, यहाँ की घरों में पंखे नही होते हैं, खिड़की खोलना भी मना था | काफी थका हुआ था, आते ही बेसुध हो गया, सुबह रूम में एक और साथी को देखा, परिचय हुआ, वो बंगलादेश से आये थे, हम दोनों शेपर्स को एक ही कमरा मिला था |

बाथरूम घुसते ही झटका लगा, सिर्फ कागज़….. ! हालाँकि ये पहला ऐसा तजुर्बा नही था, हिंदुस्तान में भी अब इसका नक़ल होटल वाले करते हैं, पिछले साल दिल्ली के एक फाइव स्टार होटल में एक कार्यक्रम में गया था तो वहां पहली बार देखा पानी नही है शौच के लिए | खूब गाली दिया होटल वालों को, हाथ तो अच्छे से धो लिया था पर दिमाग की सफाई में एक सप्ताह लग गया, बड़ा अजब सा लग रहा था | पर अबकी बार एक हद तक दिमागी रूप से तैयार था तो ज्यादा आश्चर्य नही हुआ |

सुबह ६ बजे ही नाश्ता का समय मिला था, यहाँ समय के लोग बड़े पाबंद है | जल्दी जल्दी नहा/धोकर…| माफ़ कीजियेगा…..पोछकर-नहाकर नीचें रेस्तरां भागा | नाश्ता में ब्रेड, दूध-कॉर्नफ्लेक्स, सेब, सेब जैसा एक फ़ल, जूस, दही, अंगूर उपलब्ध था | 7 बजे बस आ गयी थी, आज वर्ल्ड इकनोमिक फोरम में कार्यक्रम रखा गया था | झील किनारे इतना ख़ूबसूरत ऑफिस मिल जाए तो शायद मैं तो काम ही नहीं कर पाऊंगा | सुबह सुबह कुछ लोग जिनेवा झील के किनारे टहल रहे थे, कुछ कुत्ते टहला रहे थे | यहाँ इंसानों से ज्यादा ख़ूबसूरत मुझे कुत्ते ही दिखे, अलग-अलग रंग-रूप-आकार-प्रकार….| झील से बड़ा फ़व्वारा उठ रहा था, पूरी दुनिया से लोग जिनेवा इस फ़व्वारे को देखने आते हैं |

वर्ल्ड इकनोमिक फोरम के गेट पर उसके नाम के तस्वीर लिया | अंदर कैंपस में पैर रखते ही एक मोहतरमा से नज़र मिली और…. और क्या….. ’वो’ हो गया…. मुस्कुराकर हेल्लो किया और बढ़ लिया | पिछले १६-१७ घंटे में १५-२० दोस्त बन गये थे तो अकेलापन जैसा कुछ नही था | कई शहरों का नाम पहली बार सुना था, तो उनकी कहानी सुनने को उत्साहित था |

हमारे मोबाइल में फोरम के एप्प में पूरा कार्यक्रम का जानकारी था, वहां भी बोर्ड लगा हुआ था, हम अपने अपने ट्राइब के पास पहुँच गये, हर ट्राइब के पास एक कार्टून का बना हुआ बक्सा था जिसपर ट्राइब का नंबर लिखा हुआ था | दिनभर हमें अलग अलग टीम-ग्रुप बना-बनाकर सामाजिक मूल्य, चुनौतियाँ, टीम/हब सञ्चालन और बदलाव के बारे कई तरह की गतिविधियों के माध्यम से बहुत कुछ सिखाया गया | हम सभी लोगों से ऐसे घुल-मिल गये थे कि सब अपने से ही लग रहे थे, हम एक दुसरे की परेशानियों को समझने और उसके समाधान पर बातें कर रहे थे | पूरा माहौल सकरात्मक बदलाव और रचनात्मकता से सम्पूर्ण था |

दोपहर के भोजन के बाद अर्थव्यवस्था के विकास और सामाजिक संयोजन पर एक वार्ता था | यहाँ का भोजन हमारे यहाँ से बहुत अलग है और खासकर शाकाहारी मनुष्यों के लिए तो यहाँ भोजन ही चुनौती है | खैर जो फल-सलाद मिला, खा लिया और फिर वार्ता शुरू हो गया | शाम तक फिर गतिविधियाँ चलती रही और नये-नये आईडिया, विश्व के आर्थिक और सामाजिक बदलाव के नये आयाम सीखते रहे |

शाम को हम फिर अपने ट्राइब में, अपने नये परिवार के ४ सदस्यों के साथ | दिनभर के कार्यकलापों की समीक्षा की गयी, और संक्षेप में उसे अपने ट्राइब-बॉक्स पर लिख दिया गया | 7 बजे शाम को होटल पहुँचे | जिनकी उर्जा अभी तक संरक्षित थी वो शहर घुमने चले गये, मैं फिर से रजाई में बेसुध हो गया | अगली सुबह फिर से वही होना था, उठा, जूस पिया और भाग लिया | शुरुवात फिर ट्राइब से हुई, कुछ गतिविधियाँ ट्राइब में हुई फिर अलग-अलग टीम में बांटकर अपनी अपनी रुचियों के हिसाब से नया समूह बना दिया गया और मंत्रणा शुरू हो गयी, सभी ने अपने अपने पक्ष रखे | दिनभर कार्यकलाप चलता रहा | आज दोपहर में एशिया का क्षेत्रीय भोजन था, बड़ा उत्साहित था कि कुछ तो देशी मिलेगा खाने को, पर बड़ी निराशा हुई, एक जूस और चार अलग-अलग तरह के सैंडविच | खैर खाली पेट गुल्लर भी मीठा लगता है | खाने के साथ ही सभी एशियाई शेपर्स को एक जगह बिठाकर एक साथ मिलकर आपसी भागीदारी और सहयोग से सामाजिक बदलाव की परियोजनाओं पर कार्य करने की सलाह दी गयी, विचारों का आदान-प्रदान हुआ, आईडिया साझा किये गये |

आज कई बार उनसे नज़रे मिली, हेल्लो भी हुआ पर कुछ बात बनी नहीं | पता नही क्यों पर सिर्फ उनसे ही मिलने में झिझक होती थी | खैर अभी तो वक़्त था | हर गतिविधि के बाद १५ मिनट का ब्रेक मिलता था | हम आपस में अपने क्षेत्र का तोहफे का आदान-प्रदान कर रहे थे | इसी बिच हम ग्रुप फोटो के लिए गार्डन में जा रहे थे, सिढी पर उनसे मुलाकात हुई | हम मुस्कुराये, बात किये…मैंने उन्हें अपने मिथिला की रंग और खुशबू से उकेरी हुई मिथिला पेंटिंग वाली लाल टीशर्ट भेँट की, और उन्होंने भी एक ख़ूबसूरत सा तोहफ़ा भेँट किया | फोटो खिचवाई और भागे ग्रुप फोटो के लिए | अब हम उनसे भी थोड़े घुल-मिल गये थे, बातें हुई | शाम को डिनर के वक़्त मैं प्रोफ़ेसर स्वाब से मिला और उन्हें मिथिला पेंटिंग भेँट किया, वो बड़े खुश हुए | डिनर में हमारे लिए कुछ खास नहीं था, दारु था तो सिर्फ वाइन और शायद बियर भी, जो मैं पीता नहीं | व्हिस्की मिला नहीं | खाने में वही फल-सलाद था, मांसाहारी लोगों के लिए भारत की राजनीति भी थी खाने के लिए | खैर इश्क़ में भूख-प्यास लगती कहाँ है | हम १० बजे होटल आये, आज थकान भी कम लग रही थी |

अगले दिन फिर सुबह-सुबह पोछकर-नहाकर बस में बैठ गया | आज का कार्यक्रम यूनाइटेड नेशन के जिनेवा हेडक्वाटर में था | युएन डायरेक्टर जेनरल को सुनने को मिला, फिर प्रोफ़ेसर स्वाब ने शेपर्स से वार्तालाप किये, कमोवेश सभी ट्राइब ने अपने पक्ष रखे, अपना एक्शन प्लान बताया | फिर दोपहर का लंच हुआ | खाने के बारे में फिर से बताने की जरुरत तो नही है | मैंने उन्हें खाने की ट्रे पकरायी, दोनों मुस्कुरा दिए | अचानक एक वेटर के मुंह से देशी आवाज़ सुनाई दी-

“सर ये यहाँ की खिचड़ी है, इसे खाइये, ये शाकाहारी है“

खिचड़ी वाकई बहुत बेकार था | खैर हमारा कार्यक्रम ख़त्म हो गया था, हम एक दुसरे से अलग हो रहे थे, आँखें बिछड़ने के गम में भरी हुई थी, दिमाग नये आईडिया से भरे पड़े थे, कदम आत्मविश्वास के बढ़ रहे थे, सब खुश थे कि अब ४०० से अधिक शहर में अपना एक घर है | और हम अब अकेले नहीं है….एक अपना पूरा परिवार है….ग्लोबल शेपर्स कम्युनिटी |

दोपहर भोजन के बाद हम घुमने निकल गये, पूरा शहर घूमा, खूब मस्ती की | शहर ने हमें अपना लिया और हमने शहर को | पुरे शहर को पैदल नाप लिया | शाम में जिनेवा एयरपोर्ट से ओल्टेन की ट्रेन लिया, ओल्टेन में मेरा ननिहाल है (मामा रहते हैं) | ट्रेन में भीड़ नहीं थी, रास्ते भर खिड़की से स्विट्ज़रलैंड को देख रहा था, अब समझ में आ रहा था कि यश चोपड़ा साहब को यह देश इतना पसंद क्यों था…!! यहाँ की सबसे अच्छी बात ये है कि बड़ा व्यवस्थित देश है, हर जगह जगह के नाम, रास्ते लिखें हुए हैं, यहाँ तक की बस स्टॉप पर बस नंबर भी लिखा हुआ है |

रास्ते भर ट्रेन दायें-बायें टेढ़ी-मेढ़ी होती रही और मैं खिड़की से सर टिकाये पिछले ४ दिनों में खोया था | कुछ देर बाद टीटी साहब आये, टिकट देखा और मोबाइल एप्प में देखकर ओल्टेन पहुँचने का टाइम बताया, मैंने भी एप्प का नाम पूछकर अपने मोबाइल में एप्प इनस्टॉल कर लिया |

बाहर का नज़ारा काफ़ी ख़ूबसूरत था, यहाँ के गाँव-घर बड़े ख़ूबसूरत होते हैं | कान में इयर फ़ोन लगा था, गाना बज रहा था- “….एक मुलाकात जरुरी है जिन्दगी के लिए…..” | एक मक्के की खेत दिखी तो मुस्कुरा दिया, जो अपना देशी कुछ दिख गया था | अपनी मिट्टी, अपना गाँव, अपना खेत याद आ गया |