Poetries

जवानी 

Posted by on Sep 7, 2016 in Poetry | 0 comments

जवानी 

​माथे की नस दुख जाती है

जवानी की गुत्थियाँ सुलझाने में ।

वो बचपन की मौज कहाँ अब,

गांव की पगडंडी और खेत की हरियाली

दोपहरिया का कच्चा आम-अमरुद,

और पोखर-भिंड पर गाछी में कंचे का खेल !

यहां अब राह पथरीली है,

कभी गर्द है, कभी सर्द है,

कभी लू में झुलसा देह का दर्द है ।

यहां अब वक़्त गुजर जाता है,

खुद को फुसलाने में…।

माथे की नस दुख जाती है,

जवानी की गुत्थियाँ सुलझाने में ।।

(First Draft)

सुझाव एवं टिप्पणी सादर आमंत्रित

पगली का आखिरी प्रेम-पत्र

Posted by on Apr 1, 2016 in Poetry | 0 comments

पगली का आखिरी प्रेम-पत्र

जो कभी तन्हाई में दिल उदास हो, बेचैन हो,

जो कभी भीड़ में मंजिल की डगर मुश्किल लगे,

तुम्हेँ मेरी जरुरत होगी |

पर घबराना मत,

तेरे बक्से में छुपाकर रखा था खुद को,

जब मेरी जुल्फों में उलझा था तू,

जज्बातों की कोई पुरानी पोटली खोलना,

उन खतों का हर अल्फाज़ तेरा गीत गुनगुनाएगा,

तू जरुर मुस्कुराएगा,

मुस्कुराहटों की आड़ में अश्क चुपके से तेरे गालों की चूमेगा |

कभी आजमा कर देखना,

मुझे मालूम था तेरा ये आज,

मैंने तेरे कल को देखा था |

तू रोना, खूब रोना.. फिर मुस्कुराना |

पर बेपरवाह दीवाने, तेरे पगली की कसम,

टूटना मत |

छूना, नभ को छूना,

अफ़सोस मत कर,

तुझे मिलेगा, सबकुछ मिलेगा |

तेरा हक़ है,

मुझे यकीं है |

मैं तो रूह हूँ तेरी,

तुझसे अलग कहाँ ?

तेरी पगली, तेरी ही पगली….!!

ईश्क

Posted by on Mar 31, 2016 in Poetry | 0 comments

ईश्क

मुझे यकीन है कि एक दिन ईश्क जरूर होगा

मुझे भी, तुम्हें भी

किसी से कहीं पर

बेपरवाह बेपनाह !!

एक फूल

Posted by on Mar 26, 2016 in Poetry | 0 comments

एक फूल

एक बाग, हज़ार माली

खिला एक फूल जो,

सैकड़ों पुजारी !

इस शहर में मंदिरें बहुत है,

दरगाह भी है, कब्र भी है |

जुड़ा संवारती नवयौवना भी है,

इजहारे-इश्क में मशगूल प्रेमी जोड़े भी है |

मंत्री भी है, संतरी भी है,

शैतानों की की एक वस्ती भी है |

भवरें भी हैं, प्यासा बादल भी है,

हवा की नज़र भी कुछ अच्छी नही है |

बेपरवाह सबसे, छुपाकर तुझको इश्क करता हूँ मैं |

 

उलझन

Posted by on Jan 8, 2016 in Poetry | 0 comments

उलझन

फिर से वही उलझन, वही उधेड़बुन
किंकर्तव्यविमूढ़ अपने कर्तब्य पथ पर |
मस्तिष्क में हलचल, मन विस्मित
‘लेकिन…किन्तु…परन्तु’
मैं अग्रसर जनक आपके अनुभव और वक्तव्य पर |
मूल्यहीन समाज मूक-बधिर
अर्थ विचार, अर्थ व्यव्हार,
अहम् युद्ध, विकृत संस्कार |
मैं अबोध अज्ञान निस्वार्थ अभिमन्यु,
ये कौरव चक्रव्यूह का सातवाँ द्वार |
‘बेपरवाह’ मन विकल विह्वल
पग-पग दुत्कार, हर क्षण संघर्ष,
ना दृढ़निश्चय ना आत्मविश्वास
परंच, मैं अग्रसर जनक गन्तव्य पर |
कुछ उलझन, कुछ उधेड़बुन
किंकर्तव्यविमूढ़ अपने कर्तब्य पथ पर |
थाम ऊँगली जनक बाट दिखाओ
सत्य क्या है? सन्मार्ग बताओ…
पुनः मंत्रणा आपके मंतव्य पर
मैं अग्रसर जनक आपके अनुभव और वक्तव्य पर |

इश्क

Posted by on Jan 5, 2016 in Poetry | 0 comments

इश्क

 

तूने इतना जो कहा, “सैय्याँ तू कमाल का, बातें भी कमाल का…” देख मैंने कितनी बातें कह दी…

 

“इश्क़ में शहादत को तेरी मुस्कुराहट ही काफ़ी थी कातिल…
यूँ बेपरवाह गले लगाने की जरुरत क्या है ?”

“रंजिश-ए-इश्क़ में यूँही बरबाद हुआ बेपरवाह
कसूर फ़क़त इतना सा था-
फिक्र हिज्र में था और जिक्र बेजुबाँ रहा…|“

“इश्कोहलिक आवारा बेपरवाह बंजारा इश्कजादा
तुम मिले तो पूरा…बिन तेरे वाहिद आधा….. !!”

“बेपरवाह तुम क्या जानो क़द्र मोहब्बत की !
दिन फिक्र में गुजरता है और रात फ़ितूर में !”

“बेपरवाह तेरी कलम की इतनी बेफ़िक्र रफ़्तार क्यूँ है ?
रंग स्याही का गहरा है या हिज्र जी रक्त में लिखावट सुर्ख है ??”

“रस्में वफ़ा में यूँ मशगूल हुए बेपरवाह,
बेवफ़ाई का हर नमूना मासूक की अदा-ए-इश्क़ लगी !”

“बेपरवाह बादल बरस रहा घनघोर अंधेरी रात में,
बता वाहिद बिजली की चमक पर कैसे संभालेगा पतवार मझधार में ??”

और हाँ जाते-जाते आपके लिए बाबा नागार्जुन की कविता की एक पंक्ति-
“आप क्या जानो मूंगफली खाना क्या है
कितनी बेफ़िक्री से होता है
मूंगफली खाते हुए दुनिया को देखना!”
संदर्भ समझ गयें या समझाना होगा ?

कड़वा चौथ

Posted by on Oct 30, 2015 in Poetry | 0 comments

कड़वा चौथ

अपने आशियाने में कड़वा चौथ तो बिना चाँद के फिर से कड़वा ही रही…

जिनका शक्कर रहा उनके लिए घी-शक्कर..

 

जिन्दगी शायद इसी भाग-दौड़ का नाम है

Posted by on Apr 17, 2015 in Poetry | 0 comments

जिन्दगी शायद इसी भाग-दौड़ का नाम है

ना ग़मों का बादल हटा पाया,

ना ही खुशियों की बारिश ला पाया,

पुराने चिथड़े की तरह जिन्दगी दरकती रही,

कश्मकश में मैं,

कभी सिलता रहा,

कभी ढकता रहा |

फ़क़त फिक्र-ए-ख़ुराक में उलझा ‘बेपरवाह’ वक़्त गुजर जाता है,
याद तुम भी आते हो,

याद अपना घर भी आता है,

पर सपनों की चाहत, अपनों की मुहब्बत को अक्सर बेअसर कर जाती है |

जब हर शाम थक कर घर लौटता हूँ,

सोचता हूँ तुझसे आज जी भर के बात करूंगा,

पर ना जाने कब आँख लग जाती है और फिर सूरज नज़र  आता है |

जिन्दगी शायद इसी भाग-दौड़ का नाम है,

जिस दिन ठहर जाता है, इन्सान गुजर जाता  है |

मैंने हद की हद देखी है…

Posted by on Jan 24, 2014 in Poetry | 0 comments

मैंने हद की हद देखी है…

मैंने हद की हद देखी है…
जुनुने-इश्क की सरहद देखी है |
जो डूबकर निकला दरिया से,
अब दरिया की कद देखी है…||

जो उछलती मौजों पर,
कश्ती अपनी संभाली थी,
मत पूछ ! कितना कठिन था वो !
पर, साहिल को पाने की जद देखी है ||

कभी कीचड़, कभी धूल-गर्द,
कभी तपन बहुत, कभी बहुत सर्द |
यादें हैं-
वो शिद्दत से गुजरी भयानक रातों की,
जब- अश्क नज़र और हमसफ़र दर्द !
फ़कत हयात का गद्य नहीं, मैंने छंद भरे पद देखी है ||

दूर है, चाँद भी खूब है |
अदा है, नशा है, नखरें हैं ||
कभी मिलकर तो देखो….
बेजान है…!!
मैंने चाँद की बंजर जमीं देखी है ||

चल उठ, अब ख़्वाब नहीं, ख्याल भी कर !
अनजान पथ है, अजनबी पथिक हो तुम !
क्षीतिज को छू, आसमान पर चल !
मत देख इधर-उधर !
वक़्त के संग क़दम मिला कर चल |
है मंजिले-मक़सूद करीब –
अब डर क्या, फ़िकर क्या ?
बढ़ता चल, चलता चल….
बढ़ता चल…चलता चल…||