बचपन और बरसात

आज सुबह से ही मौसम काफ़ी अच्छा था, घर से ऑफिस के लिए अभी निकला ही था कि बारिश शुरू हो गयी, सामने एक मकान था तो फटफटिया खड़ा कर छज्जे के नीचें शरण लिया, काफ़ी देर तक बारिश होती रही, रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी | रास्ते पर कुछ स्कूली बच्चे छप-छप कर रहे थे, दाहिने तरफ़ गर्ल्स हॉस्टल कि छत पर लडकियां बारिश में नहा रही थी और सामने के अपार्टमेंट कि बालकनी में एक लड़की अपने दोनों तलहथियों में बारिश कि बूंदों को समेट रही थी, कुछ बूंदें उसके मासूम गुलाबी चेहरे पर मोतियों कि तरह चमक रहे थे…फुटपाथ पर कुछ बच्चे नंग-धरंग बारिश में नाच रहे थे |

मैं अपने बचपन को इन सब में देख रहा था | आह….वो कागज कि कश्ती और बारिश का पानी…..तरह-तरह के नाव बनाता था | जब बाबूजी घर पर नहीं होते थे तो अक्सर गंजी-वंजी खोल नंग-धरंग खलिहान में उछल-कूद शुरू कर देते थे, माँ चिल्लाती रहती थी….उस समय गाँव में पक्के के मकान कम थे, सामने बस एक मंदिर था जिसका छत था और छत में लगे पानी निकासी की पाइप से मोटी धार गिरती थी, थोड़ा चोट जैसा लगता था पर बहुत मज़ा आता था | घर के दो तरफ पोखड़ा था तो बर्षा होते ही कवई मछली पोखड़ा से गाछी में चढ़ आता था, खूब पकड़ते थे |

रात को माँ पैर में लहसून-तेल पकाकर लगा देती थी कि बारिश का कोई एलर्जी ना हो | दोनों भाई खाट पर लैम्प जलाकर संस्कृत का श्लोक या अंग्रेजी का वर्ड मीनिंग याद किया करते थे तो नीचें खेत में मेढ़क अपने टर्र-टर्र से शमां बांधे रहता था, मुझे तो आज भी मेढ़क के टर्र-टर्र और झींगुर के झंकार में बड़ा बढियां नींद आती है | पर शहर में अब ये शायद ही कभी नसीब होता है | रात को बाबूजी घर के सभी किवाड़ों के नीचें जूट के खाली बोरे लगा देते थे, क्यूंकि मेढ़क के पीछे-पीछे सांप घुस आता था | बरसात में गाँव में सर्पदंश कि घटनाएँ बहुत बढ़ जाती है |

एक बार सत्यनारायण पूजा (हमारे यहाँ सत्यनारायण पूजा शाम में सूरज के अस्त होने के बाद होती है, कहीं-कहीं ये दिन में भी होती है) के बाद उनको घर पहुँचाने जा रहा था, दो जिस्म थे, चिकनी मिट्टी कि कच्ची सड़क थी और कजरी जमा हुआ था | कजरी पर अँधेरे में टोर्च कि रौशनी कम थी और हम दोनों पिछड़कर गिर गये, हम सिर्फ जमीं पर गिरे नहीं थे, प्रेम में भी फिसल गये थे, अंधरे में बिजलियों कि चमक पर ना जाने कब तक हम दोनों पंक-क्रीड़ा में मशगूल रहे, उनका तो पता नही घर में गंदे कपड़ों पर क्या टिप्पणी मिली पर मैं रास्ते में तालाब में पैंट-शर्ट निकालकर धोकर पहन लिया और घर में माँ पूछी तो बोल दिया था कि बारिश में भींग गया था, ये भी बता दिया कि एक बार तो फिसल भी गया था, डर था कि चोर कि दाढ़ी में तिनका होता है, कहीं मिटटी लगा रह गया होगा तो सवाल नहीं होगा | भोली माँ कितना यकीं करती थी |

वो हवाई चप्पल की बात तो मैं भूल ही गया, कीचड़ के छींटे पूरे पैंट पर होते थे, माँ धोते-धोते विफ़र पड़ती थी फिर बाबूजी हाट पर बरसाती चप्पल खरीद देते थे |

ज्यादा बारिश होने पर दादीमा चौके कि दीवार पर कालिख से कुछ चित्र बनाती थी, और मैं जो ननिहाल में उल्टा जन्मा था तो हमसे आँगन में माटी खोदवाकर आग गरवाती थी ताकि अब इन्द्रदेव अपना भाभट समेटें |

बाढ़ आने पर पोखड़ा से मछलियाँ निकलकर कर खेतों में आ जाती थी और फिर हमलोग बांस कि बर्छी से शिकार शुरू करते थे, कोई बुलबुला उठा या कोई पौधा हिला कि बर्छी से आक्रमण शुरू हो जाता था | बड़ा रोमांचक होता था | अगर बाढ़ का पानी ज्यादा रहा तो फिर केले की थंब से खाट बांधकर नाव बनाकर खूब घूमते थे |

इस मौसम में गाँव में शाम को प्याज कि कचड़ी खूब देखने को मिलेगी, दालान पर बैठकर किसानी बात और कचड़ी के साथ… | प्याज बस महिना भर पहले ही निकला होता है तो तक़रीबन सभी किसानों के घर में जरुर रहता है |

ये मौसम धानरोपनी का होता है | पहले गाँव में जब बारिश समय पर नही होती थी तो महिलाएँ जट-जटीन का सामूहिक नृत्य करके इन्द्रदेव को खुश करती थी | पर अब तो बिहार कि लोक संस्कृति ख़त्म ही हो गयी है | लोक संस्कृति का सिर्फ सांस्कृतिक महत्व ही नहीं इसका आध्यात्मिक महत्व भी है | समाज के निर्माण का आधार होता है लोक संस्कृति और परम्परा | और जब ये संस्कृति और परंपरा ख़त्म होती है तो इसके साथ ही विलुप्त हो जाता है उस समाज का वास्तविक स्वरुप |

हमारी लोक संस्कृति, हमारी लोक-कला, काव्य एवं संगीत, मिथिला-चित्रकला, लोक-नाट्य, भोजन, सामाजिक व्यवस्था, पारिवारिक संरचना, संस्कार, अतिथि स्वागत ही हमारी पहचान थी | जो आज हम महिला शशक्तिकरण कि बात करते हैं तो मुझे लगता है उस ज़माने में महिला अधिक शशक्त थी, परिवार के संस्कार और समृद्धि का आधार थी | बांस से डाला, सूप, बियानि, फूलडाली, सिक्की से पौती, मौनी, चंगेरी, खर पर प्लास्टिक के थैले को लपेटकर बनाई गयी मौनी, लाह की लहठी, कुश कि आसनी, मोथी का पटिया, सिंदूर का किया, सांच हमारी माँ-बहनों के कलात्मकता को प्रदर्शित करता था | पमरिया नांच, विहुला-विषहरी, झिझिया, जट-जटीन आदि लोक-नृत्य समाज को मजबूती से बांधे रखता था | पर आज सब ख़त्म | गूगल पर भी उपलब्ध नहीं है |

खैर मैं थोड़ा जज्बाती हो गया | ब से बरसात कि बात कर रहे थे हम | धान रोपनी का चर्चा शुरू किये थे | कभी कादो में हल के पीछे-पीछे खेत में घुमे हैं ? पैरों में पंक का जूता, कादो कि खुशबू और बैलों के गले में बंधे घंटी कि टन-टन…क्या उत्सव का माहौल होता है | उस वक़्त शायद मैं सातवीं-आठवीं में था, हरवाहे के लिए पनपियाई लेकर जाती हुई उसकी छोटू बहु के पायल की खनक पर मेरा पोर-पोर झनझना उठता था फिर क्या खाक पढाई में मन लगेगा, मैं भी धानरोपनी देखने पहुँच जाता था | अपने कोमल हाथों से जब वो धान रोपती थी, मैं एक टक उसे निहारा करता था, सारी महिलाएँ गाना गाते हुए धानरोपनी में व्यस्त होती थी और मैं उसे लेकर शून्य में होता था | रोपनी वो करती थी पर उसके कमर के दर्द को मैं महसूस करता था, एक दिन उसके पैर में सीसा चुभ गया था, पैर कीचड़-पानी में ऐसा सूजा था कि उसे पता भी नहीं चला, मैंने उसके पैर के पास का मटमैला पानी थोड़ा लाल सा देखा तो बोला, उसकी कलमुहीं सास तो बोली की ठेंघी लग गया होगा | पर उसका पैर काफ़ी कट गया था, वो पनपियाई कि ढकनी में से लत्ता फाड़कर उसे बांध दी और फिर से रोपनी में लग गयी | मैंने देखा था उसके नाजुक पैरों को, भखडी हुई चून-सुर्खी की दीवार की तरह पैर लग रहे थे | कमोवेश हालत आज भी बिहार में वैसा ही है, बहु-बेटियां वैसी ही रोपनी करती है, आज भी तकनीक बिहार के खेतों से नदारद है, हाँ पर कागज के पन्नों में अब अच्छा-खासा दिख जाता है |

काका तो बादल देखकर ही बारिश का हाल बता देते थे, धान के लिए बिचड़ा गिराने से पहले सब काका से पूछता था | काका कहते थे कि गर्मी के कारण जलवाष्प उपर उठता है और उपर आसमान में पहुंचकर ठंढा होकर कम तापमान कि वजह से बादल बन जाता है | बादल तीन तरह का होता है-एक होता है जो गोल होता है और बहुत ऊंचाई पर होता है, ये वर्फ के कणों से बने होते हैं | एक रुई के ढेर की तरह होता है, जब इसका रंग गहरा जाता है तो वर्षा होती है और तीसरा होता है जो पूरा फैला रहता है, पुरे आकाश को घेर लेता है, यही बादल अक्सर बरसता है, यह काफ़ी नीचें होता है | जब दो बादल टकराते हैं तो आवाज़ होती है और बिजली कड़कती है |

काका हवाओं के रुख से वर्षा का अनुमान करते थे | काका को नक्षत्र और बारिश के महत्व का पूरा ज्ञान था | काका बताते थे कि स्वाति नक्षत्र में बारिश का बड़ा महत्व है, खंजन चिड़िया स्वाति कि बूंदों पर ही भर साल कि प्यास पूरी करती है, बांस में अगर स्वाति का बूंद गिरता है तो बंसलोचन बनता है, घोंघा पीता है तो मोती, आदमी के सर गिरा तो विद्वान आदमी….मैं काका को बता कर रखता था कि स्वाति नक्षत्र आये तो बता दीजिएगा…एक बार याद है मुझे, स्वाति नक्षत्र में बारिश हुई, मैं खूब भींगा, कुछ पानी पी भी लिया, रात में पेट दर्द उठा तो डर गया कि कहीं मेरे भी पेट में मोती तो नही बन गया..|

काका कहते थे अगर सूर्य पश्चिम में हो और बादल पूरब से उठे तो शीघ्र वर्षा होगी | ऐसे ही अगर शाम में इंद्रधनुष दिखाई दिया तो समझो कि सुबह बारिश होगी | चाचा काफ़ी ज्ञानी थे, कहते थे अगर चैत में पछवा चल रहा है तो भादों में अबकी वर्षा होगी, और अगर चैत में वर्षा हो गया तो खरीफ का फसल बर्बाद गया समझो | चाचा के साथ रहकर मैं भी सिख गया कि जब अंडा लेकर चींटी अपने बिल से निकलती है तो इसका मतलब है कि वर्षा होने वाला है | कल एक किताब मिला है, ‘घाघ और भड्डरी कि कहावतें’, चाचा के ज्ञान का भंडार मुझे पता चल गया है, पढ़ रहा हूँ, आगे फिर कभी सुनाऊंगा |

वैसे आज जिस तरह से मौसम बदल रहा है, वक़्त पर बारिश नही हो रही है, पानी का स्तर गिर रहा है, ऐसे में जल का संरक्षण आवश्यक हो गया है | अनावश्यक पानी की बर्बादी जैसे मुंह धोते समय नल का खुला रहना, कपड़ा धोते समय नल का खुला रखना, टंकी भर गया फिर भी मोटर बंद नही करना…हमें इन चीजों से बचना होगा | कुवां, तालाब तो अब रहा नहीं, तो जल संचय की स्थित्ति काफ़ी बिगड़ी हुई है | हालात ऐसे ही रहे तो फिर….

बाकी तो आप सब बुझबे करते हैं |