सरसत्ती माता…विद्या दाता…. Feb10

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सरसत्ती माता…विद्या दाता….

कॉलेज से निकलते निकलते ना जाने कब सरस्वती जी का क्रेज ख़त्म हो गया और हम लक्ष्मी पूजनोत्सव के पंडित हो गये | अब तो ऐसा दिन आ गया है कि बसंत पंचमी का एहसास पड़ोस के मोहल्ले में डीजे गानों की आवाज सुनकर पता चलता है….जब पडोसी को पूछते हैं की किसी की शादी है क्या ? ‘नहीं, सरस्वती पूजा है ना आज’

स्कूल के दिनों में पुरे हर्षोल्लास के साथ मनाया करते थे…एक महीना पहले से ही तैयारी शुरू हो जाती थी…मूर्तियों में जो सबसे खूबसूरत होता था उसके लिए हम बेना के अलावा भी १०-२० रूपये कुम्हार को दे देते थे की इसको भैया किसी और को बेचना मत और अच्छे से पेंट करना…..फिर रात भर जागकर पंडाल सजाना….रंगीन कागज़ के पताके और रुई का पहाड़ तो जरुर बनाते थे… अशोक और पितौंझी के टहनियों का तो जंगल ही लगा देते थे…मानना था कि जितना अशोक और पितौंझी रहेगा माता उतनी ही खुश होगी…

वो चिकस में सांक आलू, बेर, गाज़र, केला और बुनिया मिला हुआ प्रसाद….आह….

और सबसे ज्यादा मज़ा तो विसर्जन में आता था….अबीर की होली…बच्चों की लम्बी टोली और जयकारा…

‘सरसत्ती माता…विद्या दाता….’