तजुर्बे की स्याही में कुछ श्वेत-श्याम शब्द संयोजन Jan03

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तजुर्बे की स्याही में कुछ श्वेत-श्याम शब्द संयोजन

तजुर्बे की स्याही में कुछ श्वेत-श्याम शब्द संयोजन
जिन्दगी की झंझावातों में अक्सर हमारे सपने काँच की टुकरों की तरह बिखर जाते हैं, तूफान उठता है तो जूते के नीचें की गर्द आँखों तक चली आती है | और जब आँखें बंद होती है और सैलाब आता है तो हम ऐसे बह जाते हैं की जब कभी कहीं किसी पत्थर से टकराकर किनारे लगते हैं तो पता चलता है की हमारा तो वजूद ही खो गया | जिन्दगी बंद मुट्ठी की रेत है दोस्त…तलहथी के उपर बंद मुट्ठी रखना वरना एक बार जो फिसला तो संभालना मुश्किल होगा |
रोज़ी-रोटी की खातिर हम अपनों से दूर सपनों का आशियाँ सजाने लगते हैं, और जिम्मेदारियों के बस्ते को पीठ पर लादे आसान और सीधे रास्ते पर चलने लगते हैं…. इन रास्तों में भीड़ दिखती तो है पर सन्नाटे शमशान जैसी….कदमों की आहट भी सुनाई नहीं देती….बस उम्मीदों और झूठी तसल्लियों के सहारे हम खुद को संभालते रहते हैं…जब तक एहसास होता है हम इतनी दूर आ चुके रहते हैं की लौटना मुश्किल हो जाता है, और वक़्त के साथ बस्ता भारी होता जाता है, कमर झुकती जाती है…
खुशनसीब हैं वो लोग जो अपने हुनर, अपने शौक के सहारे अपना पेट भरते हैं…सुकून मिलता है, संतुष्टि मिलती है….बंगले मिले या ना मिले खपरैल भी किसी महल से कम नहीं लगता….महत्वाकांक्षा बुरी बात नहीं पर रास्ता सोच-समझकर चुनो….हड़बड़ी में रास्ता गलत अख्तियार करके जिन्दगी नरक मत बनाओ…..भगवान् कृष्ण ने गीता में जिन्दगी का सार लिखा है, याद करलो |

“………….तू ये तय कर की चोट किसके लिए खानी है ?”