शिक्षक दिवस पर एक विचार Sep05

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शिक्षक दिवस पर एक विचार

​कभी-कभी जिंदगी और वक़्त के बारे में सोचता हूँ तो बड़ा ताज्जुब होता है । क्या है यह? कैसे संचालित होता है यह?

कहीं कोई मदारी तो नहीं जो डमरू बजाता है और हम नाचने लगते हैं ??

बंद पलकों में ये कल का ख्वाब क्या है, कैसा है? हकीकत का गणित तो कुछ और कहता है… सच क्या है, झूठ क्या है? अर्थ क्या है, अनर्थ क्या है? ज्ञान बस जीने का तजुर्बा है?

अपना क्या है? पराया भी कुछ है? ये मोह कैसा ? कोई निर्मोही भी है? मोक्ष क्या है? प्रायश्चित क्या है? धर्म क्यूँ है? हम धर्म से या धर्म हम से? इसे समझना ही जीवन जीना है ?

मन मेरा, ख़ुशी भी मेरी, गम भी मेरा फिर ये आह्लादित क्यों है, ये विचलित क्यों है? सत्य है अगर भगवत गीता तो मैं बदहवाश क्यों हूँ, विचलित क्यों हूँ ? हर तथ्य का एक सिद्धांत है, जीने का सिद्धान्त क्यों नहीं??

आकार एक तो फिर प्रकार क्यों अनेक? विचार क्यों अनेक? स्वभाव क्यों अनेक? ना जन्म वश में, ना मृत्यु वश में ,ना काल वश में , ना शरीर वश में, फिर भी अहंकार है ?
दिलचस्प होती है जिंदगी ।
और समय भी….

तजुर्बा का नाम देकर कितना कुछ सीखा जाती है…।

इस शिक्षक दिवस पर वक़्त और जिंदगी को समर्पित श्रद्धा ।