उलझन Jan08

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उलझन

फिर से वही उलझन, वही उधेड़बुन
किंकर्तव्यविमूढ़ अपने कर्तब्य पथ पर |
मस्तिष्क में हलचल, मन विस्मित
‘लेकिन…किन्तु…परन्तु’
मैं अग्रसर जनक आपके अनुभव और वक्तव्य पर |
मूल्यहीन समाज मूक-बधिर
अर्थ विचार, अर्थ व्यव्हार,
अहम् युद्ध, विकृत संस्कार |
मैं अबोध अज्ञान निस्वार्थ अभिमन्यु,
ये कौरव चक्रव्यूह का सातवाँ द्वार |
‘बेपरवाह’ मन विकल विह्वल
पग-पग दुत्कार, हर क्षण संघर्ष,
ना दृढ़निश्चय ना आत्मविश्वास
परंच, मैं अग्रसर जनक गन्तव्य पर |
कुछ उलझन, कुछ उधेड़बुन
किंकर्तव्यविमूढ़ अपने कर्तब्य पथ पर |
थाम ऊँगली जनक बाट दिखाओ
सत्य क्या है? सन्मार्ग बताओ…
पुनः मंत्रणा आपके मंतव्य पर
मैं अग्रसर जनक आपके अनुभव और वक्तव्य पर |