गाँव की बात Jul03

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गाँव की बात

खलिहान से लाइव

कल चोरमा गाँव से गुजर रहा था तो महिलाओं की टोली खेत की पगडंडियों पर सर पर छोटी-छोटी टोकरी लिए गाना गाते हुए चली आ रही थी | उत्सुकता हुई, रूककर पूछा |

“माटी लेकर आ रहे हैं साहब, इस माटी से चूल्हा बनेगा और भीत को लिपेंगे….भीत समझते हैं ना ? कच्चा घर”

आज अधिकांश घर गाँव में पक्के के हो गये हैं, फिर भी समाज के कुछ तबके में अभी भी इंदिरा आवास मिलना बाकी है तो भीतघर है | पहले जब मेरा घर भी भीत का था तो उसे ऐसे ही पोखरा से चिकनी मिट्टी मंगवाकर लिपा जाता था फिर दीवाल पर पिठार (चावल को फुलाकर सिलवट पर पीसकर बनाया जाता है) और सिंदूर से फूल, देवी, स्वास्तिक आदि का चित्र बनाया जाता था, नया चूल्हा बनाया जाता था | चूल्हा भी सबके लिए अलग-अलग; भगवती पूजा के लिए अलग, विधवा या वैष्णव के लिए अलग, और बाकी लोगों के लिए अलग | बड़े-बुजुर्ग बताते हैं कि एक ज़माने में मिथिला के हर घर कि दीवारों पर पिठार, गाय का गोबर आदि से मिथिला चित्रकला में विभिन्न देवी-देवताओं, जिव-जंतु, रीति-रिवाजों के चित्र उकेरे जाते थे |

शहर के गैस चूल्हे में बने खाने का वो स्वाद कहाँ होता है जो आज भी गाँव में माटी के चूल्हे में गोयठे की आँच पर बनता है, सौंधी-सौंधी खुशबू लिए चावल-दाल-सब्जियाँ |

एक बार की बात है, गाँव में घर पर बहुत से मेहमान लोग आये थे | माछ-भात (मछली-चावल) की तैयारी चल रही थी | मिथिला में माछ, पान और मखाना का बड़ा महत्व है | मौसी सिलवट पर मसाला पिस रही थी, चूल्हे पर अधहन खौल रहा था, माँ चावल धो रही थी, गोयठा लाल हो चूका था, चेरा (जलावन की लकड़ी) जल रहा था, पूरा आँच था | माँ ने खौलते अधहन में चावल डाला और कुछ ही देर में भात बनकर तैयार था | माँ भात पसा कर मेरी थाली लगा दी | मुझे माड़-भात-नमक-आचार बहुत पसंद था, मैं अपनी थाली लेकर चौके में ही बैठ गया | दूसरा एक कारण और था कि मेरे और दादीमा के अलावा सभी लोग सर्वहारी थे, दादीमा का एकादशी था तो सिर्फ मैं एक निरीह शाकाहारी था | गरम-गरम भात से उठते भाप और सौंधी खुशबू से पूरा आलय जैसे गमक उठा था | मामा माहौल बनाने में लगे थे |

“उसना चावल और मछली, सुनते ही मुँह पनियांने लगता है…पर ये शाक-सब्जी वाले क्या जानें…”

“हाँ मामा…”

“…चुप कर…बन्दर क्या जाने अदरक का स्वाद…”

“मामा, मुझे मुर्दे खाने का कोई शौक नहीं है, ये तो चील-कौवे-गीदड़ भी खाते हैं…तड़पती हुई मछली या हलाल होते बकरी और मुर्गे को देखा है कभी…?”

मैं थोड़ा तल्ख़ बोल दिया था, सारा माहौल ख़राब कर दिया था |

“तुम कौन दूध के धुले हो… ?” मामा का जबाब पर मैं चुप था |

बचपन में मैं भी 5-6 वर्ष की उम्र तक खाता था पर गाँव में कोई बाबा आये थे, मष्तिस्क स्वच्छता अभियान चलाया था, जाते-जाते मुझे भी पवित्र करते गये |

आज वर्षो बाद बातें याद आ रही है, अब गाँव से बहुत कुछ विलुप्त सा हो गया है, सरकार भी नगर पंचायत बना-बनाकर गाँवों को शहर बना रही है | पहले शहरी बच्चे पिकनिक मनाने गाँव जाते थे पर आजकल के माँ-बाप को अपने बच्चों से अधिक प्यार है, वो उन्हें दुनियाँ से छुपाकर रखना चाहते हैं, बेटा एक चौथाई उम्र पार कर जाता है और कभी दुसरे शहर भी अकेला नहीं गया होता है | बैट-बौल में बेटे को चोट लग जाएगा तो बाबूजी घर में ही काउच पर बेटे के साथ विडियो गेम खेला करते हैं |

उम्मीद है आने वाले वर्षो में गाँव जैसा कृत्रिम गाँव जरुर बसाया जाएगा | मन में एक व्यापारिक ख्याल आया है कि एक २५-३० एकड़ में कृत्रिम गाँव बसाया जाय, टूरिस्टों को आकर्षण का केंद्र होगा | ५००-१०००/- रूपये का टिकट रख देंगे | भीत का घर रहेगा, झोपड़ी रहेगी, अन्दर से वातानुकूलित बनाकर उसे टूरिस्टों के रहने  के लिए भी बना देंगे | परियोजना पर  विचार कर  रहा हूँ | क्या आप इस परियोजना में हमसे जुड़ना चाहेंगे ? किस प्रकार से जुड़ेंगे ? फ़िलहाल मैं अपने इस गाँव संरक्षण अभियान को अल्प विराम देता हूँ | गाँव घूम रहा हूँ, तो अभी बहुत कुछ सुनाने को है | पूर्णविराम अभी बाकी है मेरे दोस्त | तब तक मुस्कुराते रहिये |