बेतिया, पश्चिमी चंपारण Jun30

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बेतिया, पश्चिमी चंपारण

खलिहान से लाइव

इस वक़्त मैं पश्चिमी चंपारण के खेत-खलिहानों में घूम रहा हूँ | पश्चिमी चंपारण में गन्ने कि खेती सर्वाधिक होती है, चीनी मिलें भी है | किसानों को इससे अच्छी आमदनी हो जाती है, हालांकि झुण्ड के झुण्ड नीलगायों के आक्रमण की वजह से किसानों को काफ़ी नुकसान होता है | गन्ने के अलावा यहाँ किसान धान और गेहूँ भी करते हैं, कुछ क्षेत्रों में मक्के की खेती प्रचुर मात्रा में होती है | तक़रीबन सभी किसान दलहन भी करते हैं, मसूर और मूंग खास कर के | दलहन कि उत्पादकता काफ़ी कम है, साथ ही जानकारी और कृषि सुविधा का बहुत अभाव है तो इनका उत्पादन बहुत छोटे स्तर पर होता है | अपनी खपत भर के लिए | अधवारा समूह की नदियाँ बहती है, मुख्य नदी गंडक है, गंडक के दोनों तरफ के क्षेत्र में मसूर और मूंग प्रचुर मात्रा में होता है | इन क्षेत्रों में बलुई-दोमट मिटटी है | अरहर अभी भी खेत की मेड़ो पर ही दिखती है | किसानों में जागरूकता का अभाव लगा | सूचना एवं तकनीक से अभी काफ़ी दूर हैं | गन्ने के अलावा किसी भी फ़सल का स्थायी बाज़ार या भण्डारण की सुविधाएं नहीं है | बाज़ार समिति रहने के कारण आम की बिक्री में अधिक परेशानी नहीं होती है |

बेतिया में जिला मुख्यालय है | काफ़ी प्रगति देखने को मिली | शहर की सड़कें अच्छी है, बस-स्टैंड, रेलवे-स्टेशन काफ़ी साफ़-सुथरा है, यहाँ गौरतलब है कि शहर के अन्दर सड़कें अच्छी है, पर मोतिहारी से बेतिया तक रास्ता दुर्गम है, गड्ढो में कहीं-कहीं बर्षों पहले बिछी अलकतरे के टुकड़े देखने को मिलती हैं, 47 किलोमीटर की दूरी तय करने में दो से ढाई घंटे लगते हैं, शुक्र है कि वातानुकूलित बसें चलती है वरना शहीद होने को एक सफ़र काफ़ी है | शहर में बड़े-बड़े ५-५ मंजिलों वाले घर भी देखने को मिलता है | कुछ ब्रांडेड कम्पनियों की बड़े बाज़ार भी देखने को मिलता है, जैसे- रिलायंस ट्रेंड, V2, V-मार्ट, विशाल मेगा मार्ट आदि | बिग बाज़ार को छोड़कर तक़रीबन सभी ब्रांड जो छोटे शहरों में होता है, है | बड़े-बड़े साफ़-सुथरे होटल सब है | होटलों की टैरिफ राजधानी जैसा है, २०००-४०००/- प्रति दिन का भी है और ५००/- प्रतिदिन का भी है | पर सुविधाएं अच्छी है, रातभर बिजली थी, बस एक फ़ोन करने पर खाने-पीने कि तमाम चीजें मेरे कमरे में पहुँच जाता था | होटल स्टाफ काफ़ी अच्छे लगे | अपने कार्यों के प्रति ईमानदार लगे | सुबह-सुबह अखबार कमरे में आ गया था, 6 बजे चाय भी आ गया | पर मुझे थोड़ा मंहगा शहर लगा |

सरकारी कार्यालयों की स्थिति काफ़ी बदतर लगी, तकनीक और सुविधाओं से दूर छोटे-छोटे मकानों में कार्यालय है |

लोग मिलनसार है, भाषा मैथिलि-भोजपुरी मिक्स है | लोगों से बातचीत में पता चला कि यहाँ का आम काफ़ी प्रसिद्ध है | यहाँ ‘जर्दा’ आम प्रचुर होता है | जर्दा १५ मई के बाद पकना शुरू होता है और काफ़ी स्वादिष्ट होता है | अभी अब ख़त्म हो गया है फिर एक किसान के पेड़ में कुछ बचा था तो चखने का मौका मिला |

पश्चिमी चंपारण कि कुछ सीमाएं नेपाल से मिलती है | सीमावर्ती क्षेत्रों में ट्राइबल लोग काफ़ी हैं, कुछ अच्छी संस्थाएं उनलोगों के सामाजिक उत्थान के लिए कार्य कर रही है | यहाँ घूमने-फिरने के लिए काफ़ी सारी जगहें हैं | जैसे बाल्मीकि नगर जहाँ गंडक के उपर डैम बना हुआ है, यहाँ रामायण वाले महर्षि वाल्मीकि का आश्रम भी है, त्रिवेणी का किनारा मनमोहक है, गज-ग्राह की लड़ाई यहीं शुरू हुई थी | कभी इधर आयें तो रामनगर में सुमेश्वर घुमने लायक है, बाघा में ५२ किला ५३ बाज़ार भी जरुर जायें | बाल्मीकि बाघ अभयारण्य का नाम तो आप सुने ही होंगे | प्रकृति की सुन्दर छटाओं का आनंद लेना हो तो पश्चिमी चंपारण जरुर आइये | बाकी जो रह गया अगली बार फिर कभी आऊंगा तो बताऊंगा | J